धर्म? शाला? अपमानजनक (Pejorative)? या धर्मशाला?
या राजनीती के कोढ़ के अनुसार दोनों एक ही बात हैं?
चलो, कुछ आपके हमारे आसपास से ही जानने की कोशिश करते हैं
दारु पीने वाले, ड्रग्स लेने वाले अक्सर घर से बाहर कर दिए जाते हैं? अक्सर, खाने की कमी या देखभाल की कमी की वज़ह से जल्दी ही दुनियाँ छोड़ जाते हैं? हाँ? मगर कहाँ? ज़्यादातर गरीब तबकों में?
खाते पीते घरों में या शायद कहना चाहिए या देखभाल करने वाले घरों में? क्यूँकि, जहाँ कहीं देखभाल सही से होती है, वहाँ पहली बात तो ऐसे केस ही नहीं होते। और हों भी, तो उनकी ज़िंदगी कम देखभाल वालों से ज्यादा ही लम्बी होती है। और ये सिर्फ दारु या ड्रग्स वाले केसों में नहीं होता, बल्की, हर तरह की बिमारी पर लागू होता है। अक्सर देखा है की देखभाल वाले घरों में ज़िंदगी अक्सर लम्बी, सेहत वाली और खुशहाल होती है। मगर जहाँ कहीं देखभाल कम हो, किसी भी तरह की, वहीँ ज़िंदगी छोटी और बदहाल हो जाती है। मतलब, पैसा अहमियत रखता है, मगर, एक हद तक ही। देखभाल उससे कहीं ज्यादा अहमियत रखती है।
अब इसका धर्म से या धर्म शाला से भला क्या लेना देना? सोचो। आते हैं इस पर भी।
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