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Friday, September 4, 2026

कोरे कागज़ कहीं नहीं जाते। मगर चंद शब्द लिखे कागज़?

कोरे कागज़ कहीं नहीं जाते 

वो अकसर कोरे ही रह जाते हैं? 

फिर उन्हें आप 

नाव बना 

किसी के घर की तरफ बहा 

पानी में चलाएँ? 

या पेपर प्लेन बना 

पड़ोस वाली लड़की के 

बारजे की तरफ़ उड़ाएँ। 


मगर 

इन्हीं पेपरों पर लिखे 

चंद शब्द 

मामूली से दिखने वाले 

वो चंद शब्द 

तख़्त हिलाते हैं 

बड़े बड़े तानशाहों के 


डरते हैं 

बड़े बड़े तानाशाह भी उनसे 

और हड़बड़ी में 

वो ऐसे ऐसे 

चंद शब्दों वाले पेपरों को 

जनता के सामने आने से डरते हैं 


वो ऐसे ऐसे पेपरों पर लिखी 

किताबों पर पाबन्दियाँ लगाते हैं 

चाहे वो लिखी हों 

किसी मामूली सी लड़की ने 

वो डरते हैं 

उनमें लिखे 

उन तानशाहों की 

असलियत के उजागर होने से 


वो उस लड़की को 

अपने so called अफसरों द्वारा 

ड्रामा करवा 

उसका अपहरण करवाते हैं 

एक बिलकुल खाली जगह से 

एक ऐसे ATM से 

जहाँ छुट्टी वाले दिन 

शायद ही कोई जाता हो

 

रात के अँधेरे में 

सुन ए रिया (SUNARIYA)

नामक जेल में डाल देते हैं 

और जाने उसे वहाँ 

क्या क्या सुनाते 

या दिखाते या समझाते हैं। 


तारीख भी ऐसी चुनते हैं 

जब आगे कोई और छुट्टी हों 

ताकी कोर्ट को भी 

बेल देने में वक़्त लगे 


इमरजेंसी के नाम पर 

वो उस पर देश द्रोह ठुकवाते हैं 

ताकी 

उसको देश से बाहर जाने से 

कम से कम कुछ साल 

रोका जा सके 


क्यूँकि 

उसने ऐसा कुछ किया तो हुआ नहीं 

की देश द्रोह ठोका जाता 

हाँ 

केस को

थोड़ा ज़्यादा वक़्त घसीटा जा सकता है 


कुछ वक़्त ख़राब करवा 

वो देश द्रोह 

so called जनसुवाई में जाता है 

देशद्रोह और जनसुवाई? 

और कोई मामूली सी 

स्टम्प के साथ 

स्वाहा हो जाता है?  

ऐसा ही?

या गलत लिख दिया कुछ?


किसी समाज के अनुसार 

इतनी मामूली सी स्टम्प? 

और 

इतना बड़ा मुकदमा ठोकना?   

और 

किसी समाज के अनुसार 

आगे और ईलाज करेंगे तेरा?  

समझ अपनी अपनी?


वो कागज पर उतरे कुछ शब्द 

जो भारत में कुछ साल 

बिलकुल बँध रहे 

जनता की निगाहों से  

वो भी गुंडागर्दी से 

किसी न्यायलय के आदेश से नहीं 


पता चलता है 

जाने किन पतों के सहारे 

US और UK में 

धड़ले से बीके?   

वो भी लिखने वाले की 

जानकारी ना होते हुए। 


कोरे कागज़ कहीं नहीं जाते 

वो अकसर कोरे ही रह जाते हैं? 

फिर उन्हें आप 

नाव बना 

किसी के घर की तरफ बहा 

पानी में चलाएँ? 

या पेपर प्लेन बना 

पड़ोस वाली लड़की के 

बारजे की तरफ़ उड़ाएँ। 


हाँ 

उन पर लिखे चंद शब्द 

और भी बहुत कुछ करते हैं। 

जाने आगे और क्या क्या करते हैं?

Thursday, September 3, 2026

Designer World Art and Craft

Media Culture and Difference Between Life and Death? 

Or healthy living and long life? 


क्या हो? 

जब सामने वाले को मालूम ना हो 

जो कुछ वो 

किसी और के साथ कर रहे हैं 

उसका बिगड़ा रुप 

या कहीं ज्यादा बढ़ा चढ़ा 

कहीं न कहीं 

उनके अपने साथ 

या 

उनकी अपनी बहन, बेटियों 

बेटों, माँ, बाप, पति, बीवी  

या 

घर के किसी और 

सदस्य के साथ हो रहा है? 


कौन कर रहा है?

या कर रहे हैं?

वो भी गुप्त तरीके से?

कौन खेलता है ये गुप्त गुप्त?

ज़्यादातर 

भले लोग तो शायद खेलते नहीं?


जहाँ कहीं आपसे

जिस किसी द्वारा कुछ भी 

गुप्त कुछ करने को कहा जाए

तो थोड़ा दूर हो जाएँ 

थोड़ा वक़्त लें और सोचें?

गुप्त क्यों?

सीधे सीधे क्यों नहीं?   


राजनितिक पार्टियाँ ऐसा ज़्यादातर 

सामान्तर घड़ाईयाँ घड़ने के लिए करती हैं 

ये सामान्तर घड़ाईयाँ ही 

मानव को रोबोट की तरह प्रयोग 

या दुरुपयोग करने का काम करती हैं 

गुप्त रुप से रिमोट कंट्रोल हैं। 


इन गुप्त से डिज़ाइनों का 

आपकी 

या आपके अपनों की IDs से 

कैसा नाता है?  

या किस तरह का असर?   


करते हैं कोशिश जानने की 

इमारतों को 

घरों की और उनके आसपास के  

स्कूलों, अस्पतालों, ऑफिसों के  

डिज़ाइनों को

जो उतार दिए गए हैं    

खिड़की, दरवाजों 

बैडरूम, बाथरूमों 

अंदर बाहर के गेटों 

यहाँ, वहाँ, जहाँ, तहाँ।  


जानने की कोशिश करते हैं 

वाहनों को, दुकानों को? 

गलियों को, उनपे लगे खमभों को 

और तरह तरह के डिज़ाइनों को


या शायद घर के कोने कोने को 

इस हिस्से और उस हिस्से को 

स्टोर, रसोई, बैडरूम, बाथरुम 

आँगन, ड्राईंग रूम वैगरह को?    


क्या कुछ लिखा है? 

या छपा है? 

किस चीज़ के बने हैं वो?

कब लिखा या छपा वो सब?

किसने लिखा या छापा?  

या कहाँ से आया या लाया गया? 

और कौन कौन रहता है वहाँ?


उस या उन रहने वालों पर 

कैसा असर है उन सबका?

जो जितना पास उतना ही 

असर अच्छा या बुरा? 

अच्छे को कैसे बढ़ा सकते हैं?

और बुरे को कैसे कम सकते हैं?


इतना सब मुझे कैसे मालूम?

मुझे सिर्फ़ लिखना है 

जो कुछ पढ़ा, देखा या समझा 

आगे ऐसा है या नहीं 

ये तो आपको तय करना है।     

 


Designer World Art and Craft 

ये अगली किताब की शुरुवात। मोटा सा आईडिया, यहाँ वहाँ पहले पोस्ट में आ चुका। ये उन्हीं यहाँ वहाँ की पोस्ट को उठाकर किताब में पिरोने की कोशिश है। 

मगर इससे पहले?

सिस्टम, कोड, निहित स्वार्थ और राजनितिक हितों के टकराव लाइन में लगी है। 

System, Code and Conflict of Interests

सिस्टम, कोड, निहित स्वार्थ और राजनितिक हितों के टकराव

सिस्टम, कोड, निहित स्वार्थ और राजनितिक हितों के टकराव   

System, Code and Conflict of Interests

Campus Crime Series के बाद ये अगली सीरीज शुरु। मगर, यहाँ मैं केसों की फाइल्स नहीं उठाए खड़ी। 

आम आदमी की ज़िंदगी और उसकी ज़िंदगी के आसपास जो कुछ होता है या जैसे जैसे होता है, उन कोड, सिस्टम या निहित स्वार्थ और हितों के टकराव की बातें हैं। और उनके आसपास की ज़िंदगी पर असर की। 

राजनीती के फूट डालो और राज करो के खेल को थोड़ा और खोलना है। जो कुछ इस ब्लॉग से हट चुका, वो ज़्यादातर पब्लिश होने वाली फाइल्स के हवाले हो चुका।