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Academic Journey?

Current Position Media Culture Lab (Independent Research and Writing),  June 2021 - Continue Experiential Learning, Research and Communicati...

Tuesday, July 28, 2026

Universal Media Culture Lab 3

 सोच और खोज?


मगर उससे पहले 

Conflict of Interest की राजनीती को समझना बहुत जरुरी है। 


Conflict of Interest की राजनीती

सिर्फ़ रिश्तों में दरार पैदा नहीं करती 

वो रिश्ते ही खा जाती है 

रिश्तों का बिगाड़ इस स्तर तक कर देती है 

की कोई स्तर ही ना बचे 

उनकी "माँ बहन" करने लगे। 


अपमानकर्त्ताओं की इस मानसिक गिरावट को 

आप सिर्फ़ राजनितिक रैलियों या भाषणों में ही नहीं 

बल्की, 

आम बोलचाल के शब्दों 

पहनाओं, वस्त्रों  

खाने पीने की वस्तुओं 

हवा, पानी की गुणवत्ता 

पढ़ने लिखने के संसाधनों 

खेलने, वर्ज़िश करने 

या स्वास्थ्य के संसाधनों 

आवागमन-यातायात, खेत-खलिहानों 

अपने मकानों या दुकानों के नामो 

या पतों से लेकर   

गली मौहल्ले की पहचानों 

रीती रिवाज़ों के तौर तरीकों 

या यूँ कहो की 

जो कुछ भी आप 

देख, सुन, समझ और सोच सकते हैं 

उन सबमें घुला मिला हुआ देख सकते हैं। 


और 

ये सब आपका और आपके घर का 

आसपास का और गली मौहल्ले का 

गाँव, शहर, राज्य या देश का स्तर बताते हैं।   

इन्हे सुधारा भी जा सकता है 

और ज्यादा बिगाड़ा भी। 

सब आप पर और आपके आसपास पर, 

समाज पर निर्भर करता है। 


और इस सबको, 

Conflict of Interest की राजनीती ने 

मकड़ी के जाले-सा गूँथा हुआ है। 

उधेड़ने की कोशिश करें 

उस मकड़ी के जाले को?


जैसे जैसे 

उस Conflict of Interest की राजनीती से निकलोगे 

वैसे वैसे, बहुत कुछ अपने आप सुधरता जाएगा 

जितना अपने अपने के चक्कर में उसमें घुसते जाओगे 

उतना ही ना सिर्फ खुद ज्यादा उलझते जाओगे 

बल्की,

अपनी आगे की पीढ़ियों को भी उलझाते जाओगे।   

Universal Media Culture Lab 2

एक निग़ाह उस तरफ 


स्वस्थ, हट्टा-कट्टा शरीर?

हँसता-खेलता आँगन?  

आगे बढ़ते लोग? 

पीछे रहते लोग? 

तरक़्क़ी या पिछड़ापन?

अमीरी या गरीबी? 


या कुछ भी जो आप पाना चाहते हैं 

बस एक निग़ाह उस तरफ 

जो आप पाना चाहते हैं 

और एक निगाह उनकी तरफ 

जिनके पास वो सब है 

या जो वो सब पा चुके हैं 


बस इतने से में ही 

फर्क समझ आ जाएगा 

और ये भी 

की आप वो पा सकते हैं या नहीं?

कितने वक़्त में? 

या कितना पा सकते हैं?

और कितना नहीं?

और क्यों?


हो सकता है 

आपकी और उनकी सोच में फर्क हो? 

जो वो करते हैं 

वो आप नहीं करना चाहते?

आपके interest ही अलग हैं?  

या वो आप नहीं कर सकते?

शायद सोच का फ़र्क? 


या शायद कोशिश ही नहीं की कभी?

या ऐसे तो कभी सोचा ही नहीं?

ऐसे भी संभव है?

या शायद उनसे अलग तरीक़े अपनाकर भी?

हो सकता है वो उनसे भी बेहतर हो? 


Universal Media Culture Lab

Universal तो है 

और तरीक़े किसी भी काम को करने के? 

या कोई भी परिणाम लाने के हज़ारों?

तो ये जानना तो जरुरी है 

की सामने वाले ने क्या तरीका अपनाया है?

क्या वो आपके हिसाब-किताब से सही है?  

या आप कोई और अपना सकते हैं?  


कई बार हो सकता है 

सामने वाले का तरीका बेहतर हो 

मगर 

आपके Media Culture के Ingredients 

हो सकता है उस पर फिट ना बैठ रहे हों?

और उन Ingredients में ज्यादा हेरफेर,

आप कर नहीं सकते?

ऐसा करने पर शायद नुकसान ज्यादा हो?

और भी कितने ही कारण हो सकते हैं 

खासकर, 

बात जब इंसानो की ज़िंदगियों की हो?     


या शायद, 

बहुत ही थोड़े से हेरफेर से ही वो सँभव हो?

मगर, 

आपको अभी तक वो तरीका पता ना हो?   

Universal Media Culture Lab 1

Prevention is Better Than Cure


कितनी ही बार सुना होगा ये सब तो?

और जाने कहाँ कहाँ?

और कैसे कैसे विषयों पर?   


ईलाज से रोकथाम बेहतर?

ये तकरीबन हर विषय पर लागू होता है 

और हमेशा बेहतर

और हर सिस्टम पर लागू 


वो सिस्टम आपका कोई एक अंग हो 

या शरीर ही 

वो आपके घर का कोई एक कमरा 

या घर ही 


ये शरीर के सिस्टम पर लागू होता है 

और घर के सिस्टम पर भी

किसी एक रिश्ते पर लागू होता है 

और बाकी सब रिश्तों पर भी 


ये जैसे घर पर लागू होता है 

ऐसे ही आसपड़ोस पर भी 

गली मौहल्ले पर भी 

गाँव, शहर राज्य और देश पर भी 

और देशों के आपसी रिश्तों पर भी 


ये जैसे शरीर नाम की मशीन पर लागू होता है 

ऐसे ही बाकी सब मशीनों पर भी। 


ये उस बाग़ की तरह है 

उस लॉन या पार्क की तरह है 

उस खेत खलिहान की तरह है 

जिस पर एक नज़र डालते ही 

पता चल जाता है 

उस पर कितनी मेहनत हुई है 

कितना दिमाग लगा है 

या कितनी ही तरह के और संसांधन। 


किसी भी सिस्टम में मोटे तौर पर 

कोई अलग जंतर मंतर काम नहीं करता

कोई अलग सिद्धांत या जादू काम नहीं करता 

Universal Media Culture Lab के जैसे। 

Friday, July 24, 2026

सिस्टम और कोड 16

उफ़ इत्ते रोड़े !

क्या किया इतने रोड़ों का?


थोड़ा स्क्रिबल 

थोड़ा रैंट वेंट 

थोड़ा कंस्ट्रक्ट 

थोड़ा स्ट्रक्चर 

थोड़ा आर्किटेक्चर 

थोड़ा डिज़ाइन 

थोड़ा पेंट 

थोड़ा प्रोसेस  


काफी सारी फाइल्स 

काफी सारे केस स्टडी 

काफी सारे लिंक्स 

ये ईधर, वो उधर 

ये वाला इधर 

वो वाला उधर 

उफ़ Too Much 

Too भेजा फ्राई 

और आवाज़ आई 

और फाइल्स 

और 

केस स्टडी चाहिएँ?


नहीं 

अब मैं दिए गए 

या किए गए 

प्र्शन के जाल में नहीं  उलझती 

वो ऐसे लगते हैं 

जैसे मीडिया कल्चर के हेरफेर 


जैसे मीडिया का प्रोपगैंडा 

इस पार्टी का या उस पार्टी का 

जैसे हकीकत को गोलमाल कर 

सामने वाले के सवालों को 

मुद्दों को दरकिनार कर 


सामने वाले की जरुरतों को 

हक़ीक़तों को धुँधलकार 

अपने ही जाले बिछाना जैसे 

इसलिए 

अब मैं हर ऐसे प्र्शन पर 

प्रशनचिन्ह लगाती हूँ 

हर ऐसे प्रोपगैंडा को 

अपने तर्क वितर्क की कसौटी पर रखती हूँ 


हर न्यूज़ के पीछे छिपे 

या छिपाने की कोशिश करते 

सवालों 

या मुद्दों को देखती समझती हूँ 

उनमें मेरा अपना 

या मेरे अपनों का 

या आम आदमी का 

कितना भला या बुरा है? 

उस तथ्य को दिमाग़ में रख 

उसे न्यूज़ या एब्यूज?  

केटेगरी के हवाले कर देती हूँ 


और उसके लिए मेरी अपनी 

Culture Media Lab है।   

सिस्टम और कोड 15

Oversurveilled and Overpaying?

Why?

Social Simulations? Or Emulations?

And Human Robotics?


A Designed and Engineered World

Not the natural one 

Oversurveilled and Overpaying?

आम या साधारण कैमरों की कहानी नहीं है 

ये आम लोगों की समझ से बहुत  दूर 

आज की टेक्नोलॉजी  के प्रयोग और दुरुपयोग की कहानी है। 


ये  इंसान को रोबोट बना लेने की कहानी है 

ये इंसान को एक्सपेरिमेंटल प्राणी समझ 

उसपर उसकी जानकारी और पर्मिशन के बिना 

भद्दे और घटिया एक्सपेरिमेंट्स की कहानी है 

जानकारी के बाद विरोध करने  पर 

ख़त्म करने पर तूल जाने की कहानी है। 


ये इंसान को उसके अपने संसाधनों से 

खदेड़ने की  कहानी है 

ये Infodemics, Misinformation 

Selected Information 

और Information Block की कहानी है 

ये सिंथेसिस और सिंथेटिक जहाँ की कहानी है। 

जहाँ हर तरह का साम, दाम, दंड, भेद  जायज़ है?   


ये किसी एक इंसान की नहीं 

संसार में जाने कितने ही लोगों की यही कहानी है। 

इसलिए आदमी का बच्चा आदमी तो बनेगा 

मगर  ऐसे जहाँ में 

वो कैसा आदमी बनेगा

ये वो जानने की कहानी है।  


ये कुछ कुछ ऐसे है 

जैसे इन्होंने मांगे को उठा दिया 

और उन्होंने माँगे की बहु को 

मगर 

ये कुछ कुछ ऐसा है 

जैसे अश्व्थामा मारा गया। 


ये मांगे कोई और था 

कहीं और 

वो माँगे की बहु 

किसी और माँगे की बहु

कहीं और 


क्या हो अगर ये 

एक दूसरे को कहने लगें 

तुमने हमारा आदमी मारा? 

ये कुछ कुछ बॉन्ड्स की कहानी है 

मगर कौन से और कैसे बॉन्ड्स की?

Wednesday, July 22, 2026

सिस्टम और कोड 14

 बॉन्ड्स की कहानी, बॉन्ड्स की ही जुबानी? 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 


कैसे कैसे बॉन्ड हैं?

ऐसे वैसे बॉन्ड हैं?

जीव की उत्पत्ति 

बॉन्ड्स की कहानी?

जीव का जीवन 

बॉन्ड्स की कहानी?


सिस्टम की उत्पत्ति?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का सरल या जटिल होना?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का संतुलित या असंतुलित होना?

सिस्टम के जीवों का संतुलित या असंतुलित होना?

 

जीव के बॉन्ड्स का संतुलन?

अच्छे जीवन की कहानी?

जीव के बॉन्ड्स का असंतुलन?

उतार चढ़ावों की रवानी?

जैसे घर या मौहल्ले का 

संतुलित या असंतुलित होना?

वहाँ के जीवों के 

संतुलित या असंतुलित होने की कहानी?


ऐसे ही शरीर का है 

वो जैसी जैसी किस्मों के सिस्टम में रहता है 

वैसा वैसा सा ही उसका स्वास्थ्य होता है  

एकदम कॉपी करता सा जैसे?


कुछ कुछ ऐसे, जैसे?

किसान का बच्चा, किसान?

बनिए का बच्चा, बनिया?

अध्यापक का बच्चा, अध्यापक?

टीचर का बच्चा, टीचर?

और फ़टीचर का बच्चा, फ़टीचर?


वकील का बच्चा, वकील?

डॉक्टर का बच्चा, डॉक्टर?

राजनेता का बच्चा, राजनेता?

एक्टर का बच्चा, एक्टर?

वैध का बच्चा, वैध?

 झाड़फूँक वाले का बच्चा, झाड़फूँक वाला?


ठेकेदार का बच्चा, ठेकेदार?

ऐसे तो?

राम का बच्चा, राम?

रावण का बच्चा, रावण?

शरीफ़ का बच्चा, शरीफ़?

कबाड़ी का बच्चा, कबाड़ी?


गरीब का बच्चा, गरीब?

अमीर का बच्चा, अमीर?

नौकर का बच्चा, नौकर?

साहब का बच्चा, साहब?


कुत्ते का बच्चा, कुत्ता?

भैस का बच्चा, भैंस?

गाय का बच्चा, गाएं

चिड़िया का बच्चा, चिड़िया 

साँप का बच्चा, साँप 

सूअर का बच्चा, सूअर

गधे का बच्चा, गधा 

घोड़े का बच्चा, घोड़ा 

हाथी का बच्चा, हाथी        

तो आदमी का बच्चा?

क्या होगा?     


इस आखिरी वाले पैराग्राफ 

और ऊप्पर वालों में थोड़ा फर्क है?

बुझो तो जाने?

आगे पोस्ट में 

सिस्टम और कोड 13

A Small Global Hub? Oversurveilled and Overpaying? 


गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?   


और इसे थोड़ा और जानो समझोगे तो पता चलेगा 

ये Oversurveilled तो सारा जहाँ है 

जहाँ कदम कदम पर कैमरे हैं 

कदम कदम पर रिकॉर्डिंग है 

हर कदम पर डाटा है 

और हर कदम की कहानी है 

जो यहाँ या वहाँ के विष्लेषण की ज़ुबानी है 


कितनी ही तरह के बॉन्ड हैं 

कितनी ही तरह की फोर्सेज हैं 

कुछ ईधर घसीटते हैं 

तो कुछ उधर घसीटते हैं 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 

सिस्टम और कोड 12

सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती

आम आदमी से कैसे खेलती है?

और कैसे उसे अपना रोबॉट या गुलाम बनाती है?


ऑफिस से उदहारण लें या घर और आसपास से?

दोनों से लेते हैं एक एक करके  


ऑफिस 

9-10 सालों में कोई शिकायत नहीं 

मगर?

2014 में BJP के आते ही 

इस कमिटी से निकाला और उस कमिटी से 

तकरीबन अचानक 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।    

क्लॉस में रोड़े, लैब्स में रोड़े 

घर पर रोड़े, रोड़ पर रोड़े 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।   


और आप यहाँ वहाँ शिकायत करने लगते हैं 

मगर 

ये शिकायतों का दौर तो 2012 में ही नहीं शुरु हो गया था?

BJP उसके बाद ही आई है, 2014 में 

क्लॉस और लैब्स के रोड़ों से आप पहले ही तंग नहीं हो चुके थे?

सेक्रेटरी का इलेक्शन उसके बाद ही लड़ा था 

की चलो यहाँ कुछ नहीं हो रहा 

तो एडमिंस्ट्रेशन का रास्ता ही सही 

वरना, 

बचपन से ही राजनीती से नफरत करने वाला इंसान 

और राजनीती में एंट्री?


शायद ये सोचकर 

की Higher Education System है 

यहाँ तो ऐसा क्या होता होगा? 

ये भूलकर,

लैब्स और क्लासेज में क्या हो रहा था?

और क्यों?

वो पता ही नहीं था। 


Reflection का सबसे बड़ा फ़ायदा?

उसने यही बताया है 

कोई भी समस्या, 

शायद ही कभी अचानक आती है 

उसके सब लक्षण पहले से धरे होते हैं 

हमारे आसपास ही। 

मगर 

हम अपनी भागदौड़ की ज़िंदगी में 

उनकी तरफ देखते ही नहीं 

उन पर सोचना समझना 

या आत्म विष्लेषण करना तो कहाँ?


भागदौड़ की ज़िंदगी वालों को 

शायद इसीलिए सुकुन नहीं होता?

क्यूँकि, 

वो अक्सर ज़िंदगी को ढो रहे होते हैं 

ज़्यादा, ज़्यादा और ज़्यादा की चाह?

इंसान को गधा बना देती है?

अगर 

2017 तक की कहानी ढंग से समझी होती 

तो यूनिवर्सिटी के बुलाने पर वापस शायद ही जाती। 


पर सुना है 

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं 

उस दौबारा जॉइनिंग के बाद जो फाइल्स मिली 

अगर वो ना मिलती?

तो Campus Crime Series कहाँ लिखी होती?


और 2022 में अगर वापस गाँव न आती?   

कोशिश तो बहुत की, 

मगर राजनीती वालों ने चलने दी क्या?

ये भी इसी दौरान समझ आया 

यूनिवर्सिटी एक नहीं है 

कई धड़े हैं, कई पार्टियाँ हैं 

और उनमें आपस में खिंचतान

और राजनितिक कुर्सियों की मारामारी। 


सबसे बड़ी बात 

आप कहीं भी रहो 

कहीं भी जाओ 

ये समझकर कभी मत जाना 

वहाँ सब सही मिलेगा 

हो सकता है, 

वहाँ, यहाँ वाली समस्या ना हो 

या कम हों 

मगर 

वहाँ की अपनी ही तरह की समस्या होँगी 

यही राजनीती सारे  सँसार में है। 

 

गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?   

Sunday, July 19, 2026

सिस्टम और कोड 11

 सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती। 

इसे जानने से पहले थोड़ा समाज को समझने की कोशिश करते हैं। 


दो अलग अलग समाजों को देखना 

सुनना, पढ़ना, समझना 

और उसका हिस्सा होना 

उनमें ज़िंदगी का एक खास हिस्सा गुजारना 

अपने आप जैसे बहुत कुछ दिखा देता है 

सुना देता है या समझा देता है 

या उसके माध्यम से आपकी ज़िंदगी गुजार देता है   


एक?

अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा समाज 

समाज के उस आखिरी 

या मध्यम या उससे थोड़ा नीचे समाज वाला हिस्सा 

हुलिया, देहाती या खिचड़ीनुमा?

ज़ुबान खड़ी हरयाणवीं, अखड्ड, गवाँरु?

बद्जुबाँ? 

और गाली गलौच तो जैसे? 

बात बात पे झड़ती हों फुलझड़ियाँ?

तीखा तेवर, ऊँचे बोल 

हर बात पे कटाक्ष 

काँटों से भरे झाड़ झाड़ी जैसे कोई?


दूसरा,

दिखने में साफ़ सुथरा, शालीन 

दाग रहित, एकदम नए नए जैसे 

खास फ़िटिंग और शरीर पर आकर्षक लगते कपडे 

जैसे एकदम पॉलिशड, निखरा निखरा सा 

जुबान में भी ऐसे ही मिठास, शालीनता 

हर शब्द जैसे सोच समझकर बोला हुआ 

हर बात पर खिलते हों फूल जैसे?


ये सिर्फ औकात का फर्क है? 

या थोड़े से प्रयासों का भी?

और काफी हद तक माहौल के तड़के?


एक तरफ,

आपने अभी अभी बर्तन साफ़ किए हैं 

और आपका भाई, बाप या घर का कोई पुरुष 

आपका बनाया हुआ खाना खाकर 

बर्तन ऐसे ही छोड़ जाता है 

वो भी अब आपको ही साफ़ करने हैं? 

ठीक ऐसे ही, जैसे घर की साफ़ सफाई?

या कपड़े धोने जैसे काम भी आपके ही हैं?


और आप बड़बड़ करते हैं? 

कम से कम भाई पर या शायद पति पर? 

या बेटे पर? 

अपने बर्तन खुद साफ़ किया कर 

या खाना एक बनाएगा तो बर्तन दूसरा साफ़ करेगा 

वो सुनता है क्या?


अरे?

हमारे यहाँ ये काम लड़कों के कहाँ होते हैं?

ये तो लड़कियों के काम होते हैं 

बचपन से ही आपको किसी ने सिखाया नहीं क्या?

या ज्यादा पढ़ गयी?

या जुबान बहुत चलती है तुम्हारी?

और भी कितना कुछ सुन लेते होंगे?

या सुनने से आगे भी कितना कुछ सह लेते होंगे?

अच्छा है, रिश्ते बने रहते हैं?

इतना सा तो रिश्ता बने रहने के लिए कर देना चाहिए?

ऐसी छोटी छोटी बातों पर भी क्या कीच कीच?      


दूसरी तरफ,

ये सब काम करने के लिए कोई सहायक है?

शायद कहीं कहीं तो कई सहायक होते हैं 

आदमी के रुप में या मशीने?

तो ऐसे मुद्दे ही कहाँ होंगे? 

या शायद वहाँ भी ऐसे ऐसे मुद्दे होते हैं?

या जाने कैसे कैसे मुद्दे होते हैं?  


जहाँ सहायक नहीं हैं?

वहाँ मिलजुलकर कर लेते हैं?

रिश्ते या घर कभी भी एक तरफ़ा नहीं चलते?

मिलजुलकर ही निभते हैं?

फिर वक़्त से कदम मिलाना भी जरुरी है 

खासकर, अगर दोनों बाहर काम करते हैं तो?

इतनी छोटी छोटी बातों पर भी क्या तकरार?


यहाँ सिर्फ समाज का हिस्सा ही नहीं बदल गया 

सोच का तरीका ही बदल गया 

सिस्टम ही बदल गया 

और उसके साथ उसके कोड भी 

जहाँ नहीं बदलते?

वहाँ तलाक़ ज्यादा होते हैं? 

क्यूँकि, उस सिस्टम में 

लड़कियाँ पराया धन या किसी की अमानत नहीं होती  

बराबर होती हैं। 


दोयम दर्जे की नागरिक नहीं होती 

उन्हें अपने घर ऐसा नहीं सुनना पड़ता 

ये काम लड़कियों के हैं और ये लड़कों के 

वो लड़कों की तरह ही पढ़ती हैं 

और उन्ही की तरह नौकरी भी करती हैं 

उनके अपने कमाए पैसे तो अपने होते ही हैं 

उनको अपने पैदाइशी घर से भी मिलता है 

भीख नहीं, हिस्सा, वो भी बिना माँगे 

उसके लिए उन्हें कोर्ट के धक्के नहीं खाने पड़ते? 

ठीक ऐसे, जैसे लड़कों को मिलता है पैदाइशी? 

वो किसी ससुराल के सहारे पर भी नहीं पलती 

आत्मनिर्भर होती हैं

बराबर की साझीदार होती हैं, घर चलाने में?    


इनके बीच में भी हज़ारों तरह की खिचड़ियाँ हैं 

आप भी ऐसे ही किसी खिचड़ी समाज का हिस्सा हैं?

खासकर, भारत जैसे देश में?

कहीं पैदाइशी घर के हाल बुरे हैं 

तो कहीं, ससुराल के?

जहाँ दोनों के बुरे हों?

वहाँ तो अब कहना ही क्या? 

 

सुना है, इन खिचड़ी समाजों में 

खिचड़ी सिस्टम के कोड काम करते हैं। 

जिनमें Conflict of Interest बहुत ज्यादा होते हैं 

वहाँ का सिस्टम बनाने वालों के 

इसलिए, वो इनको बदलना ही नहीं चाहते 

ये जैसे हैं, उसी में उनका भला है?


आगे जानते हैं 

ऐसे Conflict of Interest की राजनीती वाले समाज को 

और उसके कोडों को  

जिसमें वो घर के एक सदस्य को ही 

घर के दूसरे सदस्य के खिलाफ दुरुपयोग करते हैं? 

और ऐसे ही आसपास को भी? 

सिस्टम और कोड 10

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 


भाषा 

बहुत बड़ा जरिया है 

ज़िंदगी बनाने और बिगाड़ने का 

ये जितना इन कुछ सालों में समझ आया 

ऐसा, पहले कभी नहीं 


भला ऐसा भी क्या? 

एक माँ बाप या भाई बहन 

अपने लायक 

बेटा बेटी या भाई बहन को बोलता है 

तुम तो बहुत नालायक हो 

तुम तो ये हो, वो हो 

तुमने ज़िंदगी में भला किया ही क्या?


और कौन बोलता है ये?

वो जो खुद नालायक़ है?

या शायद 

उनका ज़िंदगी को देखने और समझने का ज़रिया 

बहुत ही संकुचित और कुएँ के मेंढक-सा है?


क्यूँकि, 

वो किसी कुएँ के मेढंक से सर्कल में रहते हैं।  

ऐसे इंसान अक्सर खुद भी डूबते हैं 

और साथ वाले को भी ले डूबते हैं   

अगर 

आप उनकी उस समझ से थोड़ा परे नहीं रहे तो 


एक टाइप ये भी है 

अपने महानालायक बच्चों को भी 

या भाई बहन को भी ऐसे बोलते हैं 

जैसे वो तो पता नहीं कितने महान हैं 

चाहे वो खुनी ही क्यों ना हों ?

चाहे उन्होंने खुद को 

ऐसे किसी केस से बचने के लिए 

घर रिस्वत के यहाँ ही क्यों न ढो दिया हो?


और परिणाम?

नालायक भी उभरने लगते  हैं? 

और लायक भी डूबने? 

कितना सच है इसमें और ऐसा कैसे?  


आपकी जुबान एक कोड है 

आप जैसा बोलते हैं 

आपके आसपास का सिस्टम 

वैसे ही रिस्पांस करता है 

या बेहतर है की उनकी सुने 

जो कहते हैं 

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 

 

वो जब कहते हैं 

"आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठती है

जो भी बोलो, सोच समझ कर ही बोलो 

कहीं सच ना हो जाए 

वो उसी, उनके द्वारा बनाए गए 

सिस्टम के कोड की तरफ ईशारा होता है 


ऐसे ऐसे से कितने ही कोडों के इशारे 

अक्सर ऐसे ही छुपे बैठे होते हैं 

एक तो साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है 

और दूसरा?

गुप्त सिस्टम हर बात को, हर इशारे को 

अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग या दुरुपयोग करता है।  

जिस किसी में, जिस किसी पार्टी का भला होता है 

वो उन्हीं बातों या कामों को 

बढ़ाचढ़ा कर या घुमाफिरा कर पेश करते हैं।

चाहे वो सच हो या ना हो 

चाहे वो सच के एकदम विपरीत ही क्यों ना हो 

जिसके ढेरों उदाहरण एक निगाह दौड़ाने पर 

आपके अपने आसपास भरे पड़े मिलेंगे   


एक बोलता है 

मेरे बेटा बेटी का या भाई बहन का 

अपना घर होगा 

जहाँ उसका अपना राज पाट होगा 

और अक्सर ऐसा ही होता है। 

क्यूँकि,

वो ऐसे सिर्फ़ बोल नहीं रहे होते 

बल्की, 

हक़ीक़त को उस तरफ धकेल रहे होते हैं

खुद अपने बेटा या बेटी की सहायता कर रहे होते हैं 

जितनी और जहाँ तक कर सकें।  


दूसरा बोलता है 

अब तू पराई हुई 

तेरा घर, तेरे पति का घर ही है 

जो तेरा है, वो सब उनका है 

थोड़ी बहुत खटपट हुई 

और अपनी लड़की को कुछ वक़्त घर बिठा 

वापस भेझ देते हैं 

उसी जुबान और विचार के साथ 

सिर्फ और सिर्फ ठेकेदारी का काम? 


सहायता के नाम पर?

उनके पास ना अपना दिमाग और ना धेला? 

अक्सर जो लड़की के पास होता है 

वो भी ऐसे ऐसे लोगों को दान करवा देते हैं? 

या खुद ही कर देते हैं? 

आखिर वो सब उसका ही तो है?  


उनके दिमाग में ये दूर दूर तक नहीं 

उसका अपना घर होगा तो?

रोज रोज के लड़ाई झगड़ों से मुक्ती भी? 

थोड़ा दूर दूर रहने पर 

छोटी मोटी खामखाँ सी टकराहटें 

अपने आप ख़त्म हो जाती हैं 

वो रोज रोज की चिक चिक ख़त्म? 

तो रिश्ते भी थोड़े बेहतर होने लगते हैं?

पास रहकर कड़वा रहने या लड़ने झगड़ने से 

दूर रहकर थोड़ा मीठा होना बेहतर? 


पर नहीं, 

आख़िर वो घर तुम्हारा ही है? 

क्या हुआ, अगर कहने भर को?

जैसे वो कहावत है ना 

"बहु सब तेरा है,

बस दबा-ढका मत छेड़िये"  

ऐसे घरों में अक्सर 

हर बात पे बक बक और 

हर बात पर कंट्रोल की कोशिश रहती हैं। 


और ऐसे माहौल में ज़िंदगियाँ?

दुनियाँदारी के दिखावे के लिए सब सही? 

मगर हकीकत?

घुट घुट, कुढ़ कुढ़ जीती ज़िंदगियाँ?


और इन कुछ सालों में ही समझ आया 

की ये सिर्फ़ ससुराल पे ही लागू नहीं होता?

ऐसे लोगों के यहाँ 

अगर उनकी अपनी लड़की भी घर बैठ जाए 

तो उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है ?

घर तुम्हारा अपना है 

मगर?

ये अगर-मगर क्या होता है?


अपना तो अपना ही होता है 

वहाँ अगर मगर नहीं होता। 

ऐसे लोग, अपने बच्चों को कभी बड़ा नहीं होने देते। 

अक्सर उनका अपने बच्चों की ही ज़िंदगियों में 

सकारात्मक की बजाय, नकारात्मक असर होता है। 


कई जगह तो लगता है 

ऐसे लोग अपनी लड़कियों को 

ना इधर का छोड़ते और ना उधर का 

अकड़ में घर भी बिठा लेंगे 

और फिर ज़ीना भी हराम कर देंगे? 


ऐसे लोगों के यहाँ अक्सर 

ऐसी लड़कियों के फैसले भी यही ठेकेदार लेते हैं? 

क्यूँकि, लड़कियों को तो समझ नहीं होती 

चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो जाएँ? 

चाहे ऐसा कहने या समझने वालों को 

खुद धेला अकल ना हो? 


क्यूँकि, 

ऐसे लोगों ने अक्सर खुद अपनी कमाई से 

अपने घर नहीं बनाए होते   

उन्होंने या तो पुरखों के घर में 

खुद ऐसी कीच कीच वाली ज़िंदगी गुजारी होती है ?

या जैसे तैसे पुरखों की ही ज़मीन 

या घर के रोड़ों को ईधर उधर कर घर बनाए होते हैं? 

जैसा देखा, सुना और समझा, वैसा ही किया? 


इससे बाहर ना दुनिया देखी, ना सुनी और ना समझी ?

देखते, सुनते या समझते, तो ऐसा होता ही नहीं ?

ऐसे लोग खुद अपने बच्चों की भी नहीं सुनते ?

वक़्त ही नहीं होता उनकी बकवास सुनने का ? 

तो वो बच्चे भी, ऐसे ऐसे अपनों से नफरत करने लगते हैं ?

और 

उन्हें अक्सर ऐसे ऐसे अपनों को रोते सुना जा सकता है ?

खुद कुछ किया नहीं, हमें करने नहीं देंगे ?

खुद भड़ भड़ कर ज़िंदगी निकाल दी ?

ये हमें क्या देंगे?


या तो खुद शंकर बनेंगे? 

या किसी शंकर के हवाले करने की कोशिश करेंगे? 

माँ बाप शंकर को मानने वाले हैं 

और बच्चे?

ऐसे ऐसे शंकरों को तिरस्कार की नजर से देखते हैं ?

शंकर? 

जो या तो खुद लड़की मारते हैं? 

या ऐसे-ऐसे शंकरों के घर या अड़ोस पड़ोस वाले?    

अब कैसे कैसे तो लोगों ने भगवान पाल रखे हैं? 

कैसे शांती रहेगी ऐसे घरों में?

कैसे आगे बढ़ेंगे ऐसे घर या ऐसे घरों के बच्चे?    


और भी रौचक तथ्य,

ये सिर्फ़ लड़कियों पर लागू नहीं होता 

बहुत बार किसी भी वजह से कमजोर पड़े 

लड़कों पर भी लागू होता है। 

ऐसे कमजोर लोगों को so-called अपने भी खाते हैं ?

और बाहर वाले भी?


और ये सिर्फ युवाओं पर ही लागू नहीं होता 

अक्सर, बुजर्गों के और भी बुरे हाल होते हैं 

कहीं उन्हें अपने ही घर में "लोग क्या कहेंगे" 

के चक्कर में अकेले नहीं रहने दिया जाता? 

चाहे वहाँ उनका मन लगे या ना लगे 

चाहे वहाँ वो,

ज्यादा टेंशन में ही क्यों न रहने लग जाएँ ?


और कहीं? 

बेटे (?) बड़े होकर यही नहीं पूछते 

की माँ-बाप पड़े कहाँ हैं और कैसे हैं?

चाहे वो 70-80 की उम्र के ही क्यों ना हों? 

चलना-फिरना तक मुश्किल होता हो?

ऐसे लोगों के पास ऐसा करने के हज़ारों बहाने होते हैं। 

वो ये तक भूल जाते हैं 

की अगर तुम्हे ना पाला पोषा गया होता 

तो आज ज़िंदा होते क्या? 

बचपन और बुढ़ापा एक जैसा सा है 

दोनों को सहारा चाहिए।  

 

ठीक वैसे ही, कुछ ऐसे भी होते हैं 

जैसे, कितना भी लड़ाई झगड़ा होने के बावज़ूद 

कुछ के पास अपने माँ बाप की सेवा के लिए 

कम से कम इस उम्र में तो, हज़ार बहाने निकल आते हैं। 

 

सुना है, यहाँ भी कोई कोड काम करता है? 

सिस्टम इन लोगों को ऐसे धकेलता है 

और उस सिस्टम के कोड 

हर जगह अपने होने की गवाही दे रहे होते हैं 

कह रहे हों जैसे 

खेल सब सिस्टम बनाने वालों के किए धरे हैं 

बाकी सब तो किसी रोबॉट से 

उनके इशारों पर नाच रहे हैं 

वो भी बगैर उनकी जानकारी के 

अब उसे कोड कहें या कोढ़?


वो जैसे सरस्वती को आपकी जुबानों पर बिठा देते हैं 

ऐसे ही शंकर, हनुमान, माता, शेरा वाली, काली 

और भी पता नहीं क्या क्या 

और ठीक ऐसे ही स्वास्थ्य या बीमारियाँ भी  

डिग्री और नौकरी भी 

धन दौलत और गरीबी भी 

शादी या बर्बादी भी 

बच्चे या सिर्फ एक बच्चा भी 

या कहीं कहीं एक भी नहीं 

सहायक, सहायता या लाचारी भी  

और बाकी वो सब भी 

जो कुछ आप देख, सुन, समझ या महसूस कर सकते हैं। 


तो ऐसे सिस्टम को 

आपके अपने सिस्टम को 

या अपने आसपास के सिस्टम को 

आपको समझना नहीं चाहिए?

 खुद अपनी भलाई के लिए 

और अपने आसपास की भलाई के लिए?


पढ़ते रहिए 

जानने की कोशिश करते हैं आगे उस सिस्टम को 

की कैसे बनाते हैं उसे ये पढ़े लिखे और कढ़े लोग?