Featured Post

Academic Journey?

Current Position June 2021-Continue,  Media Culture Lab (Independent Research and Writing) Experiential Learning, Research and Communication...

Friday, July 24, 2026

सिस्टम और कोड 16

उफ़ इत्ते रोड़े !

क्या किया इतने रोड़ों का?


थोड़ा स्क्रिबल 

थोड़ा रैंट वेंट 

थोड़ा कंस्ट्रक्ट 

थोड़ा स्ट्रक्चर 

थोड़ा आर्किटेक्चर 

थोड़ा डिज़ाइन 

थोड़ा पेंट 

थोड़ा प्रोसेस  


काफी सारी फाइल्स 

काफी सारे केस स्टडी 

काफी सारे लिंक्स 

ये ईधर, वो उधर 

ये वाला इधर 

वो वाला उधर 

उफ़ Too Much 

Too भेजा फ्राई 

और आवाज़ आई 

और फाइल्स 

और 

केस स्टडी चाहिएँ?


नहीं 

अब मैं दिए गए 

या किए गए 

प्र्शन के जाल में नहीं  उलझती 

वो ऐसे लगते हैं 

जैसे मीडिया कल्चर के हेरफेर 


जैसे मीडिया का प्रोपगैंडा 

इस पार्टी का या उस पार्टी का 

जैसे हकीकत को गोलमाल कर 

सामने वाले के सवालों को 

मुद्दों को दरकिनार कर 


सामने वाले की जरुरतों को 

हक़ीक़तों को धुँधलकार 

अपने ही जाले बिछाना जैसे 

इसलिए 

अब मैं हर ऐसे प्र्शन पर 

प्रशनचिन्ह लगाती हूँ 

हर ऐसे प्रोपगैंडा को 

अपने तर्क वितर्क की कसौटी पर रखती हूँ 


हर न्यूज़ के पीछे छिपे 

या छिपाने की कोशिश करते 

सवालों 

या मुद्दों को देखती समझती हूँ 

उनमें मेरा अपना 

या मेरे अपनों का 

या आम आदमी का 

कितना भला या बुरा है? 

उस तथ्य को दिमाग़ में रख 

उसे न्यूज़ या एब्यूज?  

केटेगरी के हवाले कर देती हूँ 


और उसके लिए मेरी अपनी 

Culture Media Lab है।   

सिस्टम और कोड 15

Oversurveilled and Overpaying?

Why?

Social Simulations? Or Emulations?

And Human Robotics?


A Designed and Engineered World

Not the natural one 

Oversurveilled and Overpaying?

आम या साधारण कैमरों की कहानी नहीं है 

ये आम लोगों की समझ से बहुत  दूर 

आज की टेक्नोलॉजी  के प्रयोग और दुरुपयोग की कहानी है। 


ये  इंसान को रोबोट बना लेने की कहानी है 

ये इंसान को एक्सपेरिमेंटल प्राणी समझ 

उसपर उसकी जानकारी और पर्मिशन के बिना 

भद्दे और घटिया एक्सपेरिमेंट्स की कहानी है 

जानकारी के बाद विरोध करने  पर 

ख़त्म करने पर तूल जाने की कहानी है। 


ये इंसान को उसके अपने संसाधनों से 

खदेड़ने की  कहानी है 

ये Infodemics, Misinformation 

Selected Information 

और Information Block की कहानी है 

ये सिंथेसिस और सिंथेटिक जहाँ की कहानी है। 

जहाँ हर तरह का साम, दाम, दंड, भेद  जायज़ है?   


ये किसी एक इंसान की नहीं 

संसार में जाने कितने ही लोगों की यही कहानी है। 

इसलिए आदमी का बच्चा आदमी तो बनेगा 

मगर  ऐसे जहाँ में 

वो कैसा आदमी बनेगा

ये वो जानने की कहानी है।  


ये कुछ कुछ ऐसे है 

जैसे इन्होंने मांगे को उठा दिया 

और उन्होंने माँगे की बहु को 

मगर 

ये कुछ कुछ ऐसा है 

जैसे अश्व्थामा मारा गया। 


ये मांगे कोई और था 

कहीं और 

वो माँगे की बहु 

किसी और माँगे की बहु

कहीं और 


क्या हो अगर ये 

एक दूसरे को कहने लगें 

तुमने हमारा आदमी मारा? 

ये कुछ कुछ बॉन्ड्स की कहानी है 

मगर कौन से और कैसे बॉन्ड्स की?

Wednesday, July 22, 2026

सिस्टम और कोड 14

 बॉन्ड्स की कहानी, बॉन्ड्स की ही जुबानी? 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 


कैसे कैसे बॉन्ड हैं?

ऐसे वैसे बॉन्ड हैं?

जीव की उत्पत्ति 

बॉन्ड्स की कहानी?

जीव का जीवन 

बॉन्ड्स की कहानी?


सिस्टम की उत्पत्ति?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का सरल या जटिल होना?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का संतुलित या असंतुलित होना?

सिस्टम के जीवों का संतुलित या असंतुलित होना?

 

जीव के बॉन्ड्स का संतुलन?

अच्छे जीवन की कहानी?

जीव के बॉन्ड्स का असंतुलन?

उतार चढ़ावों की रवानी?

जैसे घर या मौहल्ले का 

संतुलित या असंतुलित होना?

वहाँ के जीवों के 

संतुलित या असंतुलित होने की कहानी?


ऐसे ही शरीर का है 

वो जैसी जैसी किस्मों के सिस्टम में रहता है 

वैसा वैसा सा ही उसका स्वास्थ्य होता है  

एकदम कॉपी करता सा जैसे?


कुछ कुछ ऐसे, जैसे?

किसान का बच्चा, किसान?

बनिए का बच्चा, बनिया?

अध्यापक का बच्चा, अध्यापक?

टीचर का बच्चा, टीचर?

और फ़टीचर का बच्चा, फ़टीचर?


वकील का बच्चा, वकील?

डॉक्टर का बच्चा, डॉक्टर?

राजनेता का बच्चा, राजनेता?

एक्टर का बच्चा, एक्टर?

वैध का बच्चा, वैध?

 झाड़फूँक वाले का बच्चा, झाड़फूँक वाला?


ठेकेदार का बच्चा, ठेकेदार?

ऐसे तो?

राम का बच्चा, राम?

रावण का बच्चा, रावण?

शरीफ़ का बच्चा, शरीफ़?

कबाड़ी का बच्चा, कबाड़ी?


गरीब का बच्चा, गरीब?

अमीर का बच्चा, अमीर?

नौकर का बच्चा, नौकर?

साहब का बच्चा, साहब?


कुत्ते का बच्चा, कुत्ता?

भैस का बच्चा, भैंस?

गाय का बच्चा, गाएं

चिड़िया का बच्चा, चिड़िया 

साँप का बच्चा, साँप 

सूअर का बच्चा, सूअर

गधे का बच्चा, गधा 

घोड़े का बच्चा, घोड़ा 

हाथी का बच्चा, हाथी        

तो आदमी का बच्चा?

क्या होगा?     


इस आखिरी वाले पैराग्राफ 

और ऊप्पर वालों में थोड़ा फर्क है?

बुझो तो जाने?

आगे पोस्ट में 

सिस्टम और कोड 13

A Small Global Hub? Oversurveilled and Overpaying? 


गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?   


और इसे थोड़ा और जानो समझोगे तो पता चलेगा 

ये Oversurveilled तो सारा जहाँ है 

जहाँ कदम कदम पर कैमरे हैं 

कदम कदम पर रिकॉर्डिंग है 

हर कदम पर डाटा है 

और हर कदम की कहानी है 

जो यहाँ या वहाँ के विष्लेषण की ज़ुबानी है 


कितनी ही तरह के बॉन्ड हैं 

कितनी ही तरह की फोर्सेज हैं 

कुछ ईधर घसीटते हैं 

तो कुछ उधर घसीटते हैं 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 

सिस्टम और कोड 12

सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती

आम आदमी से कैसे खेलती है?

और कैसे उसे अपना रोबॉट या गुलाम बनाती है?


ऑफिस से उदहारण लें या घर और आसपास से?

दोनों से लेते हैं एक एक करके  


ऑफिस 

9-10 सालों में कोई शिकायत नहीं 

मगर?

2014 में BJP के आते ही 

इस कमिटी से निकाला और उस कमिटी से 

तकरीबन अचानक 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।    

क्लॉस में रोड़े, लैब्स में रोड़े 

घर पर रोड़े, रोड़ पर रोड़े 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।   


और आप यहाँ वहाँ शिकायत करने लगते हैं 

मगर 

ये शिकायतों का दौर तो 2012 में ही नहीं शुरु हो गया था?

BJP उसके बाद ही आई है, 2014 में 

क्लॉस और लैब्स के रोड़ों से आप पहले ही तंग नहीं हो चुके थे?

सेक्रेटरी का इलेक्शन उसके बाद ही लड़ा था 

की चलो यहाँ कुछ नहीं हो रहा 

तो एडमिंस्ट्रेशन का रास्ता ही सही 

वरना, 

बचपन से ही राजनीती से नफरत करने वाला इंसान 

और राजनीती में एंट्री?


शायद ये सोचकर 

की Higher Education System है 

यहाँ तो ऐसा क्या होता होगा? 

ये भूलकर,

लैब्स और क्लासेज में क्या हो रहा था?

और क्यों?

वो पता ही नहीं था। 


Reflection का सबसे बड़ा फ़ायदा?

उसने यही बताया है 

कोई भी समस्या, 

शायद ही कभी अचानक आती है 

उसके सब लक्षण पहले से धरे होते हैं 

हमारे आसपास ही। 

मगर 

हम अपनी भागदौड़ की ज़िंदगी में 

उनकी तरफ देखते ही नहीं 

उन पर सोचना समझना 

या आत्म विष्लेषण करना तो कहाँ?


भागदौड़ की ज़िंदगी वालों को 

शायद इसीलिए सुकुन नहीं होता?

क्यूँकि, 

वो अक्सर ज़िंदगी को ढो रहे होते हैं 

ज़्यादा, ज़्यादा और ज़्यादा की चाह?

इंसान को गधा बना देती है?

अगर 

2017 तक की कहानी ढंग से समझी होती 

तो यूनिवर्सिटी के बुलाने पर वापस शायद ही जाती। 


पर सुना है 

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं 

उस दौबारा जॉइनिंग के बाद जो फाइल्स मिली 

अगर वो ना मिलती?

तो Campus Crime Series कहाँ लिखी होती?


और 2022 में अगर वापस गाँव न आती?   

कोशिश तो बहुत की, 

मगर राजनीती वालों ने चलने दी क्या?

ये भी इसी दौरान समझ आया 

यूनिवर्सिटी एक नहीं है 

कई धड़े हैं, कई पार्टियाँ हैं 

और उनमें आपस में खिंचतान

और राजनितिक कुर्सियों की मारामारी। 


सबसे बड़ी बात 

आप कहीं भी रहो 

कहीं भी जाओ 

ये समझकर कभी मत जाना 

वहाँ सब सही मिलेगा 

हो सकता है, 

वहाँ, यहाँ वाली समस्या ना हो 

या कम हों 

मगर 

वहाँ की अपनी ही तरह की समस्या होँगी 

यही राजनीती सारे  सँसार में है। 

 

गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?   

Sunday, July 19, 2026

सिस्टम और कोड 11

 सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती। 

इसे जानने से पहले थोड़ा समाज को समझने की कोशिश करते हैं। 


दो अलग अलग समाजों को देखना 

सुनना, पढ़ना, समझना 

और उसका हिस्सा होना 

उनमें ज़िंदगी का एक खास हिस्सा गुजारना 

अपने आप जैसे बहुत कुछ दिखा देता है 

सुना देता है या समझा देता है 

या उसके माध्यम से आपकी ज़िंदगी गुजार देता है   


एक?

अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा समाज 

समाज के उस आखिरी 

या मध्यम या उससे थोड़ा नीचे समाज वाला हिस्सा 

हुलिया, देहाती या खिचड़ीनुमा?

ज़ुबान खड़ी हरयाणवीं, अखड्ड, गवाँरु?

बद्जुबाँ? 

और गाली गलौच तो जैसे? 

बात बात पे झड़ती हों फुलझड़ियाँ?

तीखा तेवर, ऊँचे बोल 

हर बात पे कटाक्ष 

काँटों से भरे झाड़ झाड़ी जैसे कोई?


दूसरा,

दिखने में साफ़ सुथरा, शालीन 

दाग रहित, एकदम नए नए जैसे 

खास फ़िटिंग और शरीर पर आकर्षक लगते कपडे 

जैसे एकदम पॉलिशड, निखरा निखरा सा 

जुबान में भी ऐसे ही मिठास, शालीनता 

हर शब्द जैसे सोच समझकर बोला हुआ 

हर बात पर खिलते हों फूल जैसे?


ये सिर्फ औकात का फर्क है? 

या थोड़े से प्रयासों का भी?

और काफी हद तक माहौल के तड़के?


एक तरफ,

आपने अभी अभी बर्तन साफ़ किए हैं 

और आपका भाई, बाप या घर का कोई पुरुष 

आपका बनाया हुआ खाना खाकर 

बर्तन ऐसे ही छोड़ जाता है 

वो भी अब आपको ही साफ़ करने हैं? 

ठीक ऐसे ही, जैसे घर की साफ़ सफाई?

या कपड़े धोने जैसे काम भी आपके ही हैं?


और आप बड़बड़ करते हैं? 

कम से कम भाई पर या शायद पति पर? 

या बेटे पर? 

अपने बर्तन खुद साफ़ किया कर 

या खाना एक बनाएगा तो बर्तन दूसरा साफ़ करेगा 

वो सुनता है क्या?


अरे?

हमारे यहाँ ये काम लड़कों के कहाँ होते हैं?

ये तो लड़कियों के काम होते हैं 

बचपन से ही आपको किसी ने सिखाया नहीं क्या?

या ज्यादा पढ़ गयी?

या जुबान बहुत चलती है तुम्हारी?

और भी कितना कुछ सुन लेते होंगे?

या सुनने से आगे भी कितना कुछ सह लेते होंगे?

अच्छा है, रिश्ते बने रहते हैं?

इतना सा तो रिश्ता बने रहने के लिए कर देना चाहिए?

ऐसी छोटी छोटी बातों पर भी क्या कीच कीच?      


दूसरी तरफ,

ये सब काम करने के लिए कोई सहायक है?

शायद कहीं कहीं तो कई सहायक होते हैं 

आदमी के रुप में या मशीने?

तो ऐसे मुद्दे ही कहाँ होंगे? 

या शायद वहाँ भी ऐसे ऐसे मुद्दे होते हैं?

या जाने कैसे कैसे मुद्दे होते हैं?  


जहाँ सहायक नहीं हैं?

वहाँ मिलजुलकर कर लेते हैं?

रिश्ते या घर कभी भी एक तरफ़ा नहीं चलते?

मिलजुलकर ही निभते हैं?

फिर वक़्त से कदम मिलाना भी जरुरी है 

खासकर, अगर दोनों बाहर काम करते हैं तो?

इतनी छोटी छोटी बातों पर भी क्या तकरार?


यहाँ सिर्फ समाज का हिस्सा ही नहीं बदल गया 

सोच का तरीका ही बदल गया 

सिस्टम ही बदल गया 

और उसके साथ उसके कोड भी 

जहाँ नहीं बदलते?

वहाँ तलाक़ ज्यादा होते हैं? 

क्यूँकि, उस सिस्टम में 

लड़कियाँ पराया धन या किसी की अमानत नहीं होती  

बराबर होती हैं। 


दोयम दर्जे की नागरिक नहीं होती 

उन्हें अपने घर ऐसा नहीं सुनना पड़ता 

ये काम लड़कियों के हैं और ये लड़कों के 

वो लड़कों की तरह ही पढ़ती हैं 

और उन्ही की तरह नौकरी भी करती हैं 

उनके अपने कमाए पैसे तो अपने होते ही हैं 

उनको अपने पैदाइशी घर से भी मिलता है 

भीख नहीं, हिस्सा, वो भी बिना माँगे 

उसके लिए उन्हें कोर्ट के धक्के नहीं खाने पड़ते? 

ठीक ऐसे, जैसे लड़कों को मिलता है पैदाइशी? 

वो किसी ससुराल के सहारे पर भी नहीं पलती 

आत्मनिर्भर होती हैं

बराबर की साझीदार होती हैं, घर चलाने में?    


इनके बीच में भी हज़ारों तरह की खिचड़ियाँ हैं 

आप भी ऐसे ही किसी खिचड़ी समाज का हिस्सा हैं?

खासकर, भारत जैसे देश में?

कहीं पैदाइशी घर के हाल बुरे हैं 

तो कहीं, ससुराल के?

जहाँ दोनों के बुरे हों?

वहाँ तो अब कहना ही क्या? 

 

सुना है, इन खिचड़ी समाजों में 

खिचड़ी सिस्टम के कोड काम करते हैं। 

जिनमें Conflict of Interest बहुत ज्यादा होते हैं 

वहाँ का सिस्टम बनाने वालों के 

इसलिए, वो इनको बदलना ही नहीं चाहते 

ये जैसे हैं, उसी में उनका भला है?


आगे जानते हैं 

ऐसे Conflict of Interest की राजनीती वाले समाज को 

और उसके कोडों को  

जिसमें वो घर के एक सदस्य को ही 

घर के दूसरे सदस्य के खिलाफ दुरुपयोग करते हैं? 

और ऐसे ही आसपास को भी? 

सिस्टम और कोड 10

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 


भाषा 

बहुत बड़ा जरिया है 

ज़िंदगी बनाने और बिगाड़ने का 

ये जितना इन कुछ सालों में समझ आया 

ऐसा, पहले कभी नहीं 


भला ऐसा भी क्या? 

एक माँ बाप या भाई बहन 

अपने लायक 

बेटा बेटी या भाई बहन को बोलता है 

तुम तो बहुत नालायक हो 

तुम तो ये हो, वो हो 

तुमने ज़िंदगी में भला किया ही क्या?


और कौन बोलता है ये?

वो जो खुद नालायक़ है?

या शायद 

उनका ज़िंदगी को देखने और समझने का ज़रिया 

बहुत ही संकुचित और कुएँ के मेंढक-सा है?


क्यूँकि, 

वो किसी कुएँ के मेढंक से सर्कल में रहते हैं।  

ऐसे इंसान अक्सर खुद भी डूबते हैं 

और साथ वाले को भी ले डूबते हैं   

अगर 

आप उनकी उस समझ से थोड़ा परे नहीं रहे तो 


एक टाइप ये भी है 

अपने महानालायक बच्चों को भी 

या भाई बहन को भी ऐसे बोलते हैं 

जैसे वो तो पता नहीं कितने महान हैं 

चाहे वो खुनी ही क्यों ना हों ?

चाहे उन्होंने खुद को 

ऐसे किसी केस से बचने के लिए 

घर रिस्वत के यहाँ ही क्यों न ढो दिया हो?


और परिणाम?

नालायक भी उभरने लगते  हैं? 

और लायक भी डूबने? 

कितना सच है इसमें और ऐसा कैसे?  


आपकी जुबान एक कोड है 

आप जैसा बोलते हैं 

आपके आसपास का सिस्टम 

वैसे ही रिस्पांस करता है 

या बेहतर है की उनकी सुने 

जो कहते हैं 

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 

 

वो जब कहते हैं 

"आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठती है

जो भी बोलो, सोच समझ कर ही बोलो 

कहीं सच ना हो जाए 

वो उसी, उनके द्वारा बनाए गए 

सिस्टम के कोड की तरफ ईशारा होता है 


ऐसे ऐसे से कितने ही कोडों के इशारे 

अक्सर ऐसे ही छुपे बैठे होते हैं 

एक तो साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है 

और दूसरा?

गुप्त सिस्टम हर बात को, हर इशारे को 

अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग या दुरुपयोग करता है।  

जिस किसी में, जिस किसी पार्टी का भला होता है 

वो उन्हीं बातों या कामों को 

बढ़ाचढ़ा कर या घुमाफिरा कर पेश करते हैं।

चाहे वो सच हो या ना हो 

चाहे वो सच के एकदम विपरीत ही क्यों ना हो 

जिसके ढेरों उदाहरण एक निगाह दौड़ाने पर 

आपके अपने आसपास भरे पड़े मिलेंगे   


एक बोलता है 

मेरे बेटा बेटी का या भाई बहन का 

अपना घर होगा 

जहाँ उसका अपना राज पाट होगा 

और अक्सर ऐसा ही होता है। 

क्यूँकि,

वो ऐसे सिर्फ़ बोल नहीं रहे होते 

बल्की, 

हक़ीक़त को उस तरफ धकेल रहे होते हैं

खुद अपने बेटा या बेटी की सहायता कर रहे होते हैं 

जितनी और जहाँ तक कर सकें।  


दूसरा बोलता है 

अब तू पराई हुई 

तेरा घर, तेरे पति का घर ही है 

जो तेरा है, वो सब उनका है 

थोड़ी बहुत खटपट हुई 

और अपनी लड़की को कुछ वक़्त घर बिठा 

वापस भेझ देते हैं 

उसी जुबान और विचार के साथ 

सिर्फ और सिर्फ ठेकेदारी का काम? 


सहायता के नाम पर?

उनके पास ना अपना दिमाग और ना धेला? 

अक्सर जो लड़की के पास होता है 

वो भी ऐसे ऐसे लोगों को दान करवा देते हैं? 

या खुद ही कर देते हैं? 

आखिर वो सब उसका ही तो है?  


उनके दिमाग में ये दूर दूर तक नहीं 

उसका अपना घर होगा तो?

रोज रोज के लड़ाई झगड़ों से मुक्ती भी? 

थोड़ा दूर दूर रहने पर 

छोटी मोटी खामखाँ सी टकराहटें 

अपने आप ख़त्म हो जाती हैं 

वो रोज रोज की चिक चिक ख़त्म? 

तो रिश्ते भी थोड़े बेहतर होने लगते हैं?

पास रहकर कड़वा रहने या लड़ने झगड़ने से 

दूर रहकर थोड़ा मीठा होना बेहतर? 


पर नहीं, 

आख़िर वो घर तुम्हारा ही है? 

क्या हुआ, अगर कहने भर को?

जैसे वो कहावत है ना 

"बहु सब तेरा है,

बस दबा-ढका मत छेड़िये"  

ऐसे घरों में अक्सर 

हर बात पे बक बक और 

हर बात पर कंट्रोल की कोशिश रहती हैं। 


और ऐसे माहौल में ज़िंदगियाँ?

दुनियाँदारी के दिखावे के लिए सब सही? 

मगर हकीकत?

घुट घुट, कुढ़ कुढ़ जीती ज़िंदगियाँ?


और इन कुछ सालों में ही समझ आया 

की ये सिर्फ़ ससुराल पे ही लागू नहीं होता?

ऐसे लोगों के यहाँ 

अगर उनकी अपनी लड़की भी घर बैठ जाए 

तो उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है ?

घर तुम्हारा अपना है 

मगर?

ये अगर-मगर क्या होता है?


अपना तो अपना ही होता है 

वहाँ अगर मगर नहीं होता। 

ऐसे लोग, अपने बच्चों को कभी बड़ा नहीं होने देते। 

अक्सर उनका अपने बच्चों की ही ज़िंदगियों में 

सकारात्मक की बजाय, नकारात्मक असर होता है। 


कई जगह तो लगता है 

ऐसे लोग अपनी लड़कियों को 

ना इधर का छोड़ते और ना उधर का 

अकड़ में घर भी बिठा लेंगे 

और फिर ज़ीना भी हराम कर देंगे? 


ऐसे लोगों के यहाँ अक्सर 

ऐसी लड़कियों के फैसले भी यही ठेकेदार लेते हैं? 

क्यूँकि, लड़कियों को तो समझ नहीं होती 

चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो जाएँ? 

चाहे ऐसा कहने या समझने वालों को 

खुद धेला अकल ना हो? 


क्यूँकि, 

ऐसे लोगों ने अक्सर खुद अपनी कमाई से 

अपने घर नहीं बनाए होते   

उन्होंने या तो पुरखों के घर में 

खुद ऐसी कीच कीच वाली ज़िंदगी गुजारी होती है ?

या जैसे तैसे पुरखों की ही ज़मीन 

या घर के रोड़ों को ईधर उधर कर घर बनाए होते हैं? 

जैसा देखा, सुना और समझा, वैसा ही किया? 


इससे बाहर ना दुनिया देखी, ना सुनी और ना समझी ?

देखते, सुनते या समझते, तो ऐसा होता ही नहीं ?

ऐसे लोग खुद अपने बच्चों की भी नहीं सुनते ?

वक़्त ही नहीं होता उनकी बकवास सुनने का ? 

तो वो बच्चे भी, ऐसे ऐसे अपनों से नफरत करने लगते हैं ?

और 

उन्हें अक्सर ऐसे ऐसे अपनों को रोते सुना जा सकता है ?

खुद कुछ किया नहीं, हमें करने नहीं देंगे ?

खुद भड़ भड़ कर ज़िंदगी निकाल दी ?

ये हमें क्या देंगे?


या तो खुद शंकर बनेंगे? 

या किसी शंकर के हवाले करने की कोशिश करेंगे? 

माँ बाप शंकर को मानने वाले हैं 

और बच्चे?

ऐसे ऐसे शंकरों को तिरस्कार की नजर से देखते हैं ?

शंकर? 

जो या तो खुद लड़की मारते हैं? 

या ऐसे-ऐसे शंकरों के घर या अड़ोस पड़ोस वाले?    

अब कैसे कैसे तो लोगों ने भगवान पाल रखे हैं? 

कैसे शांती रहेगी ऐसे घरों में?

कैसे आगे बढ़ेंगे ऐसे घर या ऐसे घरों के बच्चे?    


और भी रौचक तथ्य,

ये सिर्फ़ लड़कियों पर लागू नहीं होता 

बहुत बार किसी भी वजह से कमजोर पड़े 

लड़कों पर भी लागू होता है। 

ऐसे कमजोर लोगों को so-called अपने भी खाते हैं ?

और बाहर वाले भी?


और ये सिर्फ युवाओं पर ही लागू नहीं होता 

अक्सर, बुजर्गों के और भी बुरे हाल होते हैं 

कहीं उन्हें अपने ही घर में "लोग क्या कहेंगे" 

के चक्कर में अकेले नहीं रहने दिया जाता? 

चाहे वहाँ उनका मन लगे या ना लगे 

चाहे वहाँ वो,

ज्यादा टेंशन में ही क्यों न रहने लग जाएँ ?


और कहीं? 

बेटे (?) बड़े होकर यही नहीं पूछते 

की माँ-बाप पड़े कहाँ हैं और कैसे हैं?

चाहे वो 70-80 की उम्र के ही क्यों ना हों? 

चलना-फिरना तक मुश्किल होता हो?

ऐसे लोगों के पास ऐसा करने के हज़ारों बहाने होते हैं। 

वो ये तक भूल जाते हैं 

की अगर तुम्हे ना पाला पोषा गया होता 

तो आज ज़िंदा होते क्या? 

बचपन और बुढ़ापा एक जैसा सा है 

दोनों को सहारा चाहिए।  

 

ठीक वैसे ही, कुछ ऐसे भी होते हैं 

जैसे, कितना भी लड़ाई झगड़ा होने के बावज़ूद 

कुछ के पास अपने माँ बाप की सेवा के लिए 

कम से कम इस उम्र में तो, हज़ार बहाने निकल आते हैं। 

 

सुना है, यहाँ भी कोई कोड काम करता है? 

सिस्टम इन लोगों को ऐसे धकेलता है 

और उस सिस्टम के कोड 

हर जगह अपने होने की गवाही दे रहे होते हैं 

कह रहे हों जैसे 

खेल सब सिस्टम बनाने वालों के किए धरे हैं 

बाकी सब तो किसी रोबॉट से 

उनके इशारों पर नाच रहे हैं 

वो भी बगैर उनकी जानकारी के 

अब उसे कोड कहें या कोढ़?


वो जैसे सरस्वती को आपकी जुबानों पर बिठा देते हैं 

ऐसे ही शंकर, हनुमान, माता, शेरा वाली, काली 

और भी पता नहीं क्या क्या 

और ठीक ऐसे ही स्वास्थ्य या बीमारियाँ भी  

डिग्री और नौकरी भी 

धन दौलत और गरीबी भी 

शादी या बर्बादी भी 

बच्चे या सिर्फ एक बच्चा भी 

या कहीं कहीं एक भी नहीं 

सहायक, सहायता या लाचारी भी  

और बाकी वो सब भी 

जो कुछ आप देख, सुन, समझ या महसूस कर सकते हैं। 


तो ऐसे सिस्टम को 

आपके अपने सिस्टम को 

या अपने आसपास के सिस्टम को 

आपको समझना नहीं चाहिए?

 खुद अपनी भलाई के लिए 

और अपने आसपास की भलाई के लिए?


पढ़ते रहिए 

जानने की कोशिश करते हैं आगे उस सिस्टम को 

की कैसे बनाते हैं उसे ये पढ़े लिखे और कढ़े लोग? 

Thursday, July 16, 2026

सिस्टम और कोड 9

आप कहाँ है?

और आपका सिस्टम कहाँ?

कितना आसपास और कितना दूर?

उस सिस्टम को चलाने वाली पार्टियाँ 

उनके द्वारा चलाया जा रहा सिस्टम 

या कहो की कोड 

कितने आपके अपने सिस्टम से मिलते जुलते हैं?

और कितने नहीं?

पता करें?


अपने से ही शुरु करूँ?

मान लो,

आप 12-13 साल की यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़कर 

वापस अपने गाँव आकर रहने लगे 

जो एक छोटा सा ब्रेक भर था 

मगर, वो थोड़ा लम्बा हो गया 

या कहो की इस या उस पार्टी ने कर दिया 

या वहाँ के हालातों ने कर दिया 

आप वहाँ कुछ अपनों को ऐसे में अकेले नहीं छोड़ना चाहते 


इससे पहले आप वहाँ दशवीं तक रहे। 

एमएससी तक छुटियों में भी 

मगर, पीएचडी में ना के बराबर 

जैसा अक्सर लाइफ साइंस वालों के साथ होता है 

उन्हें 12 में से 13 महीने हॉस्टल चाहिए होता है 


नौकरी के बाद तो जैसे गाँव छूट ही गया था। 

नौकरी के बाद वापस आना खास परिस्थितियोँ में हुआ 

और ये भी तय हुआ 

की ये मेरी बड़ी लैब का एक छोटा सा हिस्सा है 

अब मेरी लैब किसी के कब्ज़े में नहीं   

तो सीधी-सी बात 

अपना लिखने-पढ़ने का उस हिसाब से एक स्पेस भी चाहिए 


Media Culture Lab का उदय 

नौकरी छोड़ने का बड़ा कारण भी रहा 

ये शुरु तो 2018 में ही हो गई थी 

VC Office की एक खास मिटिंग के बाद 

जिसके बाद दिल्ली में जजों की कोई खास कांफ्रेंस हुई 

और फिर तो रोज-रोज ऐसे से Code Decode होने लगे थे। 


तो आपको क्या लगता है, की मैं कहाँ हूँ?

Code Decode वाली Media Culture Lab में? 

उसका Head? Brain? Writer? Author? 

Science Communicator? या?


अभी तक 10th pass?  

12th Pass? 

BSc? MSc.? PhD?

या अभी तक Assistant Professor in Biotech?


या शायद निर्भर करता है?

जिससे बात हो रही है 

वो सिस्टम कहाँ है?

उसका खुद का सिस्टम किस स्तर का है?  

या उसे आपसे क्या चाहिए? 

आप सामने वाले से,

उसके सिस्टम के हिसाब से बात करोगे? 

या उससे ऊप्पर या नीचे फ़ेंकोगे?

तो कितनी बात बनेगी?  

यही हर किसी पर लागू होता है।  


आप खुद एक छोटा सा सिस्टम हैं 

और आपके सामने अनेकों सिस्टम, इकोसिस्टम 

 छोटे, बड़े, और बड़े, और बहुत बड़े  

पास, दूर, और दूर, और बहुत दूर  

उनसे जितना आपके अपने सिस्टम की बनेगी 

ख़ासकर, पास वाले सिस्टम्स से 

उतना ही आपका ये सिस्टम सही चलेगा 

वहाँ बीमारियाँ, दुख तकलीफें ना के बराबर होंगी 

और ज़िंदगी खुशहाली की तरफ़ बढ़ेगी 


मगर, 

जितना ज़्यादा इन सिस्टम्स से टकराव रहेगा 

उतना ही ज़्यादा 

बीमारियाँ, झगड़े और बदहाली रहेगी।   

तो पहली बात तो है 

ऐसे सिस्टम में रहना

या कम से कम अपने घर 

आसपास का ऐसा सिस्टम बनाना 

जहाँ टकराव कम से कम हो।  

कितना मुस्किल है?

ज़िंदगी भी उतनी ही मुस्किल या आसान है। 

Wednesday, July 15, 2026

सिस्टम और कोड 8

आपका नाम, आपकी सबसे बड़ी ID है 

आपका जन्मदिन, आपकी एक अहम ID है 

उसके बाद 

या कहीं-कहीं इनसे भी अहम 

आपके घर का पता है 

उसकी Location है 

उसके नंबर हैं या कोड हैं 

वो जिस ज़मीन पर बना है, वो है। 


वो किसकी थी?

वहाँ पहले कौन रहता था?

उसका अब असर?  

मगर क्यों?

अब तो वो आपका है? 

ख़ासकर, 

जबसे आपने उसपर घर बनाया है? 

या उसे खरीदा है? 


मगर, कुछ ऐसे भी हैं 

जिनके पास अपना घर ही नहीं है 

कोई रिफ्यूजी जैसे से रह रहे हैं 

और कोई रैंट पर 

और कोई शायद रोड पर या टैंट पर 


किसी के पास एक घर है जन्म से ही 

तो किसी के पास कई-कई भी 

किसी के पास जन्म से ही नहीं हैं 

तो किसी को एक वक़्त बाद मिला 

किसी के पास जो भी, जैसा भी है

अपना कमाया हुआ 


तो किसी को,

एक वक़्त के बाद धकाया हुआ है 

असर तो उस लोकेशन का भी है 

शायद अपना घर होने से भी कहीं ज्यादा?

क्यूँकि, 

अपने घर में बहुत कुछ अपने हिसाब से होता है 

मगर, किसी और के घर में वो सुविधा नहीं रहती।   


किसी भी जगह का, 

उसकी लोकेशन से बड़ा गहरा रिश्ता है 

शायद, किसी एक पार्टी के अनुसार वो सही है? 

मगर, किसी और पार्टी के नंबरों पर सही नहीं है 

या शायद, बाकी पार्टियों के नंबरों पर। 


या शायद,

उसकी location ही अजीबोग़रीब है? 

अहम गली पर,

मगर, भिड़ी गली से गुजरता हुआ? 

जैसे चारों तरफ़ से घिरा हुआ सा? 

आगे के नहीं, 

पीछे के हिस्से पर बना मकान?

या शायद ईधर या उधर खाली मकान? 

या प्लॉट कोई? 

  

या शायद, 

कोई आलीशान मकान 

या खँडहर कोई किसी गुजरे ज़माने का?

या आपका बनाया या खरीदा ना होकर 

आपके बाप, दादा का बनाया या खरीदा हुआ?

कभी भरा-भरा और हँसता खेलता आँगन? 


पहले उस जमीन पर कोई हादसा हुआ हो?

जैसे यूनिवर्सिटी के किसी मकान की कहानी? 

कोई हादसे वाला मकान?    

या कितनी ही ऐसी-सी गाँवों के मकानों की कहानियाँ? 

या शायद, 

ख़ासकर गाँवों में, वो पहले कभी 

पशुओं के रहने की जगह रही हो?

जहाँ उन्हें पीटा भी जाता हो?

और हो सकता है,

इंजेक्शन देकर दूध निकाला जाता हो?

या ऐसे conceive करवाया जाता हो?  


मगर, कल की किसी ऐसी कहानी का 

आज पर भला असर क्या और क्यों? 

वो सब आपने तो किया नहीं 

आप शायद उस वक़्त पैदा भी ना हुए हो? 


कोई भी राजनितिक पार्टी जब Reverse Gear लेती है 

और ऐसा कोई नंबर उसके लिए अहम हो 

तो उस कोड वाली जगह भी शांती कम रहती है 

या हादसे ज्यादा होते हैं 

या मारपिटाई ज्यादा ही रहती है 

ख़ासकर, 

जब वो पार्टी उस नंबर पर भारी हो 

या ऐसी किसी कोड वाली जगह। 


किसी वक़्त पर, किसी पार्टी के लिए 

कोई खास नंबर ज्यादा ही अहम हो?

तो वो वहाँ का सिस्टम बदलने लगते हैं  

अपने नंबर लाने के लिए, 

फाइलों के द्वारा, पॉलिसी के नाम पर 

या गुप्त तरीकों से 

या जबरदस्ती, गुंडागर्दी के जरिए। 

या साम, दाम, दंड, भेद कुछ भी करके 


ऐसे में उस सिस्टम के वो सब कोड 

सीधे-सीधे या गुप्त रुप से मार झेलते हैं। 

जिसके पास जितने कम सँसाधन होते हैं 

वो उतनी ही ज़्यादा झेलते हैं। 

और अगर आप थोड़े बहुत सँसाधन वाले हैं 

उस पार्टी की नजरों में 

तो मार ज्यादातर उन संसाधनों पर ही होती है। 

ताकी आपको काबू किया जा सके।     

 

इसे राजनीती की गुप्त भाषा में  

Time Travel कहते हैं

और, विज्ञान की भाषा में?

Reverse Engineering?

इसलिए, जहाँ आप रह रहे हैं 

कम से कम वहाँ के, 

राजनितिक सिस्टम को जानना बहुत जरुरी है।


मुझे इतने सालों बाद वापस गाँव धकाने के प्लान में  

यही Reverse Engineering थी 

Reverse Engineering में हर नंबर, हर नाम 

हर तारीख़, महीना और साल अहम होता है। 

जैसे किसी भी process या methodology में हर step 

हर chemical, organism, inoculation, और वक़्त वगैरह होता है 

या कहो की हर तरह का ingredient और उसकी मात्रा होती है। 


ख़ास तारीखों को, खास तरह के ड्रामे  

खास तरह के नामों या कोढ़ों का प्रयोग या दुरुपयोग 

ख़ास तरह के जीवों का प्रयोग या दुरुपयोग 

जो, जो मुझे हो रहा था या किया जा रहा था 

उसका बढ़ा, चढ़ा या बिगड़ा रुप, 

आसपास कुछ दिखा रहा था। 


कौन पार्टी किस तरह के बढे-चढ़े 

या बिगड़े, उस रुप के पीछे थी या है? 

ये कहीं-कहीं साफ़ नजर आ रहा था 

और कहीं-कहीं सब गोलमाल जैसे। 


इनमें कहीं Stone Diseases थी 

तो कहीं चौराहे पै पाहं आ ग्या?

कहीं लकवे थे, तो कहीं कैंसर 

कहीं शुगर, तो कहीं BP problems 

अब इतना कुछ,

किसी एक इंसान से जुड़ा तो हो नहीं सकता 

फिर?


Data और Code और System के ताने-बाने 

कई पार्टियाँ हैं, तो सबके अपने-अपने, ताने-बाने 

और लड़ाई कुर्सियों की। 

जैसे साँड़ों की लड़ाई में झाड़ों का खो 

जिसे बड़े लोग, 

Collateral damage मात्र कह कर टाल जाते हैं 


मतलब?

Data, Code और System?

Programming जैसे कोई? 

कहीं फाइल्स में अप्लाई हुई 

या कंप्यूटर या फ़ोन पर 

और?

समाज के उस आख़िरी हिस्से तक को असर गया? 


कुछ हद तक शायद?

जितना जहाँ-जहाँ सिस्टम automation पर है। 

बाकी? 

Enforced या धकाया हुआ या भकाया हुआ।

जबरदस्ती, डर, साइको और misinformation के तड़के। 


मतलब,

जन्म, मरण, पढ़ाई, नौकरी, शादी, बच्चे 

बीमारी, ईलाज या मौत या so-called पुनर्जन्म 

कहीं के भी सिस्टम कोड से पढ़े जा सकते हैं 

और पढ़ाए भी जा सकते हैं?

कहीं की भी ज़्यादातर समस्याएँ

ज़्यादातर,

वहाँ के सिस्टम या इकोसिस्टम की देन हैं 


इस सिस्टम के मीडिया कल्चर को 

वहाँ की राजनितिक पार्टियाँ 

अपनी-अपनी सुविधानुसार 

भले या बुरे के तड़के लगाती रहती हैं।  

और इन तड़कों में 

भावनाएँ, आस्था, विश्वास, भगवान 

वहाँ की कल्चर के साथ मिलकर 

और भी न जाने क्या-क्या रचते हैं? 

जैसे, Cult Politics?  

Monday, July 13, 2026

सिस्टम और कोड 7

Demo cracies and demo graphies?

De limitations and constituency creations?


मान लो, घर के दो हिस्से हों 

Lower House और Upper House 

Lower house मतलब Ground Floor ?

Upper House मतलब First  Floor? 

या Second Floor?


निर्भर करता है, कोड कहाँ का है?

अमेरिकन है या ब्रिटिश?

Uni T ED  States (US) या King D OM (UK)?

President या PM प्रधान Parliamentary House?

AM Vs PM?


रहते कहाँ हैं ये?

Official Residence ID?

White House या 10 Downing Street?

ऐसे ही और भी देश हैं 

और भी Parliament और House 

और

कितनी ही तरह के तरीके उन्हें बनाने और चलाने के।   


अब आपके घर का या आपका इन सबसे क्या लेना देना?

इनके बनने या हंग हो जाने से क्या रिस्ता?

इनके बनने या बनाने के तौर तरीकों से क्या हानी या लाभ?

इनके Floor Test या Cross Test का आपके घर से कैसा नाता?


इनके झगड़े आपके या आपके झगड़े इनके?

इनके झगड़े कहीं आपकी बिमारियाँ तो नहीं?

इनका De limitation का तरीका 

नए constituency या state या district 

या किसी भी तरह की division या divide का 

आपके रिश्ते नातों या बिमारियों से क्या लेना देना?

या शायद मौत तक से?


जो ऊप्पर हो रहा है, वही नीचे हो रहा है?

ऊप्पर सबसे पहले फाइल्स में चलता है 

वही चल फिरकर आप तक आता है 

ठीक उसी वक़्त जब वहाँ चल रहा होता है 

ठीक उसी वक़्त शादी होती हैं या कोर्ट केस 


ठीक उसी वक़्त, बच्चे conceive होते हैं 

या बच्चे व्यस्क अवस्था की तरफ

ठीक उसी वक़्त, बच्चों के puberty के sign आते हैं 

ठीक उनकी तारीख, महीने और साल के अनुसार 

लड़कियों के period शुरु होते हैं 

या कहीं बच्चे गिरते हैं, बिना पैदा हुए 


ठीक उसी वक़्त, 

बीमारी का कोई लक्षण दिखता है 

या आगे बढ़ता है 

ठीक उसी वक़्त, एक्सीडेंट होते हैं 

हाथ, पैर टूटते हैं 

कहीं सीधे-सीधे जुड़ते हैं 

और कहीं?

उल्टे-सीधे?

ये सब होने वालों के नाम, जन्मदिन 

ये सब होने की जगह, 

डॉक्टर, हॉस्पिटल का नाम 

उस हॉस्पिटल का एड्रेस 

और दवाईयों के नाम तक 

या ऑपरेशन के तरीक़े 

और तारीख़ और समय तक 

सब आपके राजनितिक सिस्टम के अनुसार होता है। 


थोड़ा ज्यादा ही लग रहा है ना?

ये कम है 

अभी इससे आगे भी बहुत कुछ है 

Reverse और Future Engineering 

Synthesis और Synthetic Engineering 

Built in और Artificial Engineering 

और भी