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Sunday, July 19, 2026

सिस्टम और कोड 11

 सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती। 

इसे जानने से पहले थोड़ा समाज को समझने की कोशिश करते हैं। 


दो अलग अलग समाजों को देखना 

सुनना, पढ़ना, समझना 

और उसका हिस्सा होना 

उनमें ज़िंदगी का एक खास हिस्सा गुजारना 

अपने आप जैसे बहुत कुछ दिखा देता है 

सुना देता है या समझा देता है 

या उसके माध्यम से आपकी ज़िंदगी गुजार देता है   


एक?

अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा समाज 

समाज के उस आखिरी 

या मध्यम या उससे थोड़ा नीचे समाज वाला हिस्सा 

हुलिया, देहाती या खिचड़ीनुमा?

ज़ुबान खड़ी हरयाणवीं, अखड्ड, गवाँरु?

बद्जुबाँ? 

और गाली गलौच तो जैसे? 

बात बात पे झड़ती हों फुलझड़ियाँ?

तीखा तेवर, ऊँचे बोल 

हर बात पे कटाक्ष 

काँटों से भरे झाड़ झाड़ी जैसे कोई?


दूसरा,

दिखने में साफ़ सुथरा, शालीन 

दाग रहित, एकदम नए नए जैसे 

खास फ़िटिंग और शरीर पर आकर्षक लगते कपडे 

जैसे एकदम पॉलिशड, निखरा निखरा सा 

जुबान में भी ऐसे ही मिठास, शालीनता 

हर शब्द जैसे सोच समझकर बोला हुआ 

हर बात पर खिलते हों फूल जैसे?


ये सिर्फ औकात का फर्क है? 

या थोड़े से प्रयासों का भी?

और काफी हद तक माहौल के तड़के?


एक तरफ,

आपने अभी अभी बर्तन साफ़ किए हैं 

और आपका भाई, बाप या घर का कोई पुरुष 

आपका बनाया हुआ खाना खाकर 

बर्तन ऐसे ही छोड़ जाता है 

वो भी अब आपको ही साफ़ करने हैं? 

ठीक ऐसे ही, जैसे घर की साफ़ सफाई?

या कपड़े धोने जैसे काम भी आपके ही हैं?


और आप बड़बड़ करते हैं? 

कम से कम भाई पर या शायद पति पर? 

या बेटे पर? 

अपने बर्तन खुद साफ़ किया कर 

या खाना एक बनाएगा तो बर्तन दूसरा साफ़ करेगा 

वो सुनता है क्या?


अरे?

हमारे यहाँ ये काम लड़कों के कहाँ होते हैं?

ये तो लड़कियों के काम होते हैं 

बचपन से ही आपको किसी ने सिखाया नहीं क्या?

या ज्यादा पढ़ गयी?

या जुबान बहुत चलती है तुम्हारी?

और भी कितना कुछ सुन लेते होंगे?

या सुनने से आगे भी कितना कुछ सह लेते होंगे?

अच्छा है, रिश्ते बने रहते हैं?

इतना सा तो रिश्ता बने रहने के लिए कर देना चाहिए?

ऐसी छोटी छोटी बातों पर भी क्या कीच कीच?      


दूसरी तरफ,

ये सब काम करने के लिए कोई सहायक है?

शायद कहीं कहीं तो कई सहायक होते हैं 

आदमी के रुप में या मशीने?

तो ऐसे मुद्दे ही कहाँ होंगे? 

या शायद वहाँ भी ऐसे ऐसे मुद्दे होते हैं?

या जाने कैसे कैसे मुद्दे होते हैं?  


जहाँ सहायक नहीं हैं?

वहाँ मिलजुलकर कर लेते हैं?

रिश्ते या घर कभी भी एक तरफ़ा नहीं चलते?

मिलजुलकर ही निभते हैं?

फिर वक़्त से कदम मिलाना भी जरुरी है 

खासकर, अगर दोनों बाहर काम करते हैं तो?

इतनी छोटी छोटी बातों पर भी क्या तकरार?


यहाँ सिर्फ समाज का हिस्सा ही नहीं बदल गया 

सोच का तरीका ही बदल गया 

सिस्टम ही बदल गया 

और उसके साथ उसके कोड भी 

जहाँ नहीं बदलते?

वहाँ तलाक़ ज्यादा होते हैं? 

क्यूँकि, उस सिस्टम में 

लड़कियाँ पराया धन या किसी की अमानत नहीं होती  

बराबर होती हैं। 


दोयम दर्जे की नागरिक नहीं होती 

उन्हें अपने घर ऐसा नहीं सुनना पड़ता 

ये काम लड़कियों के हैं और ये लड़कों के 

वो लड़कों की तरह ही पढ़ती हैं 

और उन्ही की तरह नौकरी भी करती हैं 

उनके अपने कमाए पैसे तो अपने होते ही हैं 

उनको अपने पैदाइशी घर से भी मिलता है 

भीख नहीं, हिस्सा, वो भी बिना माँगे 

उसके लिए उन्हें कोर्ट के धक्के नहीं खाने पड़ते? 

ठीक ऐसे, जैसे लड़कों को मिलता है पैदाइशी? 

वो किसी ससुराल के सहारे पर भी नहीं पलती 

आत्मनिर्भर होती हैं

बराबर की साझीदार होती हैं, घर चलाने में?    


इनके बीच में भी हज़ारों तरह की खिचड़ियाँ हैं 

आप भी ऐसे ही किसी खिचड़ी समाज का हिस्सा हैं?

खासकर, भारत जैसे देश में?

कहीं पैदाइशी घर के हाल बुरे हैं 

तो कहीं, ससुराल के?

जहाँ दोनों के बुरे हों?

वहाँ तो अब कहना ही क्या? 

 

सुना है, इन खिचड़ी समाजों में 

खिचड़ी सिस्टम के कोड काम करते हैं। 

जिनमें Conflict of Interest बहुत ज्यादा होते हैं 

वहाँ का सिस्टम बनाने वालों के 

इसलिए, वो इनको बदलना ही नहीं चाहते 

ये जैसे हैं, उसी में उनका भला है?


आगे जानते हैं 

ऐसे Conflict of Interest की राजनीती वाले समाज को 

और उसके कोडों को  

जिसमें वो घर के एक सदस्य को ही 

घर के दूसरे सदस्य के खिलाफ दुरुपयोग करते हैं? 

और ऐसे ही आसपास को भी? 

सिस्टम और कोड 10

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 


भाषा 

बहुत बड़ा जरिया है 

ज़िंदगी बनाने और बिगाड़ने का 

ये जितना इन कुछ सालों में समझ आया 

ऐसा, पहले कभी नहीं 


भला ऐसा भी क्या? 

एक माँ बाप या भाई बहन 

अपने लायक 

बेटा बेटी या भाई बहन को बोलता है 

तुम तो बहुत नालायक हो 

तुम तो ये हो, वो हो 

तुमने ज़िंदगी में भला किया ही क्या?


और कौन बोलता है ये?

वो जो खुद नालायक़ है?

या शायद 

उनका ज़िंदगी को देखने और समझने का ज़रिया 

बहुत ही संकुचित और कुएँ के मेंढक-सा है?


क्यूँकि, 

वो किसी कुएँ के मेढंक से सर्कल में रहते हैं।  

ऐसे इंसान अक्सर खुद भी डूबते हैं 

और साथ वाले को भी ले डूबते हैं   

अगर 

आप उनकी उस समझ से थोड़ा परे नहीं रहे तो 


एक टाइप ये भी है 

अपने महानालायक बच्चों को भी 

या भाई बहन को भी ऐसे बोलते हैं 

जैसे वो तो पता नहीं कितने महान हैं 

चाहे वो खुनी ही क्यों ना हों ?

चाहे उन्होंने खुद को 

ऐसे किसी केस से बचने के लिए 

घर रिस्वत के यहाँ ही क्यों न ढो दिया हो?


और परिणाम?

नालायक भी उभरने  हैं 

और लायक भी डूबने? 

कितना सच है इसमें और ऐसा कैसे?  


आपकी जुबान एक कोड है 

आप जैसा बोलते हैं 

आपके आसपास का सिस्टम 

वैसे ही रिस्पांस करता है 

या बेहतर है की उनकी सुने 

जो कहते हैं 

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 

 

वो जब कहते हैं 

"आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठती है

जो भी बोलो, सोच समझ कर ही बोलो 

कहीं सच ना हो जाए 

वो उसी, उनके द्वारा बनाए गए 

सिस्टम के कोड की तरफ ईशारा होता है 


ऐसे ऐसे से कितने ही कोडों के इशारे 

अक्सर ऐसे ही छुपे बैठे होते हैं 

एक तो साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है 

और दूसरा?

गुप्त सिस्टम हर बात को, हर इशारे को 

अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग या दुरुपयोग करता है।  

जिस किसी में, जिस किसी पार्टी का भला होता है 

वो उन्हीं बातों या कामों को 

बढ़ाचढ़ा कर या घुमाफिरा कर पेश करते हैं।

चाहे वो सच हो या ना हो 

चाहे वो सच के एकदम विपरीत ही क्यों ना हो 

जिसके ढेरों उदाहरण एक निगाह दौड़ाने पर 

आपके अपने आसपास भरे पड़े मिलेंगे   


एक बोलता है 

मेरे बेटा बेटी का या भाई बहन का 

अपना घर होगा 

जहाँ उसका अपना राज पाट होगा 

और अक्सर ऐसा ही होता है। 

क्यूँकि,

वो ऐसे सिर्फ़ बोल नहीं रहे होते 

बल्की, 

हक़ीक़त को उस तरफ धकेल रहे होते हैं

खुद अपने बेटा या बेटी की सहायता कर रहे होते हैं 

जितनी और जहाँ तक कर सकें।  


दूसरा बोलता है 

अब तू पराई हुई 

तेरा घर, तेरे पति का घर ही है 

जो तेरा है, वो सब उनका है 

थोड़ी बहुत खटपट हुई 

और अपनी लड़की को कुछ वक़्त घर बिठा 

वापस भेझ देते हैं 

उसी जुबान और विचार के साथ 

सिर्फ और सिर्फ ठेकेदारी का काम। 


सहायता के नाम पर?

उनके पास ना अपना दिमाग और ना धेला 

अक्सर जो लड़की के पास होता है 

वो भी ऐसे ऐसे लोगों को दान करवा देते हैं 

या खुद ही कर देते हैं 

आखिर वो सब उसका ही तो है?  


उनके दिमाग में ये दूर दूर तक नहीं 

की उसका अपना घर होगा तो

रोज रोज के लड़ाई झगड़ों से मुक्ती भी 

थोड़ा दूर दूर रहने पर 

छोटी मोटी खामखाँ सी टकराहटें 

अपने आप ख़त्म हो जाती हैं 

वो रोज रोज की चिक चिक ख़त्म 

तो रिश्ते भी थोड़े बेहतर होने लगते हैं 

पास रहकर कड़वा रहने या लड़ने झगड़ने से 

दूर रहकर थोड़ा मीठा होना बेहतर। 


पर नहीं, 

आख़िर वो घर तुम्हारा ही है 

क्या हुआ अगर कहने भर को?

जैसे वो कहावत है ना 

"बहु सब तेरा है,

बस दबा-ढका मत छेड़िये"  

ऐसे घरों में अक्सर 

हर बात पे बक बक और 

हर बात पर कंट्रोल की कोशिश रहती हैं। 


और ऐसे माहौल में ज़िंदगियाँ?

दुनियाँदारी के दिखावे के लिए सब सही? 

मगर हकीकत?

घुट घुट, कुढ़ कुढ़ जीती ज़िंदगियाँ?


और इन कुछ सालों में ही समझ आया 

की ये सिर्फ़ ससुराल पे ही लागू नहीं होता 

ऐसे लोगों के यहाँ 

अगर उनकी अपनी लड़की भी घर बैठ जाए 

तो उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है 

घर तुम्हारा अपना है 

मगर?

ये अगर-मगर क्या होता है?


अपना तो अपना ही होता है 

वहाँ अगर मगर नहीं होता। 

ऐसे लोग, अपने बच्चों को कभी बड़ा नहीं होने देते। 

अक्सर उनका अपने बच्चों की ही ज़िंदगियों में 

सकारात्मक की बजाय, नकारात्मक असर होता है। 


कई जगह तो लगता है 

ऐसे लोग अपनी लड़कियों को 

ना इधर का छोड़ते और ना उधर का 

अकड़ में घर भी बिठा लेंगे 

और फिर ज़ीना भी हराम कर देंगे। 


ऐसे लोगों के यहाँ अक्सर 

ऐसी लड़कियों के फैसले भी यही ठेकेदार लेते हैं 

क्यूँकि, लड़कियों को तो समझ नहीं होती 

चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो जाएँ 

चाहे ऐसा कहने या समझने वालों को 

खुद धेला अकल ना हो 


क्यूँकि, 

ऐसे लोगों ने अक्सर खुद अपनी कमाई से 

अपने घर नहीं बनाए होते   

उन्होंने या तो पुरखों के घर में 

खुद ऐसी कीच कीच वाली ज़िंदगी गुजारी होती है 

या जैसे तैसे पुरखों की ही ज़मीन 

या घर के रोड़ों को ईधर उधर कर घर बनाए होते हैं 

जैसा देखा, सुना और समझा, वैसा ही किया 


इससे बाहर ना दुनिया देखी, ना सुनी और ना समझी 

देखते, सुनते या समझते, तो ऐसा होता ही नहीं 

ऐसे लोग खुद अपने बच्चों की भी नहीं सुनते 

वक़्त ही नहीं होता उनकी बकवास सुनने का 

तो वो बच्चे भी, ऐसे ऐसे अपनों से नफरत करने लगते हैं 

और उन्हें अक्सर ऐसे ऐसे अपनों को रोते सुना जा सकता है 

खुद कुछ किया नहीं, हमें करने नहीं देंगे 

खुद भड़ भड़ कर ज़िंदगी निकाल दी 

ये हमें क्या देंगे?


या तो खुद शंकर बनेंगे? 

या किसी शंकर के हवाले करने की कोशिश करेंगे? 

माँ बाप शंकर को मानने वाले हैं 

और बच्चे?

ऐसे ऐसे शंकरों को तिरस्कार की नजर से देखते हैं 

शंकर? 

जो या तो खुद लड़की मारते हैं? 

या ऐसे-ऐसे शंकरों के घर या अड़ोस पड़ोस वाले?    

अब कैसे कैसे तो लोगों ने भगवान पाल रखे हैं? 

कैसे शांती रहेगी ऐसे घरों में?

कैसे आगे बढ़ेंगे ऐसे घर या ऐसे घरों के बच्चे?    


और भी रौचक तथ्य,

ये सिर्फ़ लड़कियों पर लागू नहीं होता 

बहुत बार किसी भी वजह से कमजोर पड़े 

लड़कों पर भी लागू होता है। 

ऐसे कमजोर लोगों को so-called अपने भी खाते हैं 

और बाहर वाले भी। 


और ये सिर्फ युवाओं पर ही लागू नहीं होता 

अक्सर, बुजर्गों के और भी बुरे हाल होते हैं 

कहीं उन्हें अपने ही घर में "लोग क्या कहेंगे" 

के चक्कर में अकेले नहीं रहने दिया जाता 

चाहे वहाँ उनका मन लगे या ना लगे 

चाहे वहाँ वो,

ज्यादा टेंशन में ही क्यों न रहने लग जाएँ ?


और कहीं? 

बेटे (?) बड़े होकर यही नहीं पूछते 

की माँ-बाप पड़े कहाँ हैं और कैसे हैं?

चाहे वो 70-80 की उम्र के ही क्यों ना हों? 

चलना-फिरना तक मुश्किल होता हो?

ऐसे लोगों के पास ऐसा करने के हज़ारों बहाने होते हैं। 

वो ये तक भूल जाते हैं 

की अगर तुम्हे ना पाला पोषा गया होता 

तो आज ज़िंदा तक ना होते 

बचपन और बुढ़ापा एक जैसा सा है 

दोनों को सहारा चाहिए 

 

ठीक वैसे ही कुछ ऐसे भी होते हैं 

जैसे कितना भी लड़ाई झगड़ा होने के बावज़ूद 

कुछ के पास अपने माँ बाप की सेवा के लिए 

कम से कम इस उम्र में तो, हज़ार बहाने निकल आते हैं। 

 

सुना है, यहाँ भी कोई कोड काम करता है? 

सिस्टम इन लोगों को ऐसे धकेलता है 

और उस सिस्टम के कोड 

हर जगह अपने होने की गवाही दे रहे होते हैं 

कह रहे हों जैसे 

खेल सब सिस्टम बनाने वालों के किए धरे हैं 

बाकी सब तो किसी रोबॉट से 

उनके इशारों पर नाच रहे हैं 

वो भी बगैर उनकी जानकारी के 

अब उसे कोड कहें या कोढ़?


वो जैसे सरस्वती को आपकी जुबानों पर बिठा देते हैं 

ऐसे ही शंकर, हनुमान, माता, शेरा वाली, काली 

और भी पता नहीं क्या क्या 

और ठीक ऐसे ही स्वास्थ्य या बीमारियाँ भी  

डिग्री और नौकरी भी 

धन दौलत और गरीबी भी 

शादी या बर्बादी भी 

बच्चे या सिर्फ एक बच्चा भी 

या कहीं कहीं एक भी नहीं 

सहायक, सहायता या लाचारी भी  

और बाकी वो सब भी 

जो कुछ आप देख, सुन, समझ या महसूस कर सकते हैं। 


तो ऐसे सिस्टम को 

आपके अपने सिस्टम को 

या अपने आसपास के सिस्टम को 

आपको समझना नहीं चाहिए?

 खुद अपनी भलाई के लिए 

और अपने आसपास की भलाई के लिए?


पढ़ते रहिए 

जानने की कोशिश करते हैं आगे उस सिस्टम को 

की कैसे बनाते हैं उसे ये पढ़े लिखे और कढ़े लोग? 

Thursday, July 16, 2026

सिस्टम और कोड 9

आप कहाँ है?

और आपका सिस्टम कहाँ?

कितना आसपास और कितना दूर?

उस सिस्टम को चलाने वाली पार्टियाँ 

उनके द्वारा चलाया जा रहा सिस्टम 

या कहो की कोड 

कितने आपके अपने सिस्टम से मिलते जुलते हैं?

और कितने नहीं?

पता करें?


अपने से ही शुरु करूँ?

मान लो,

आप 12-13 साल की यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़कर 

वापस अपने गाँव आकर रहने लगे 

जो एक छोटा सा ब्रेक भर था 

मगर, वो थोड़ा लम्बा हो गया 

या कहो की इस या उस पार्टी ने कर दिया 

या वहाँ के हालातों ने कर दिया 

आप वहाँ कुछ अपनों को ऐसे में अकेले नहीं छोड़ना चाहते 


इससे पहले आप वहाँ दशवीं तक रहे। 

एमएससी तक छुटियों में भी 

मगर, पीएचडी में ना के बराबर 

जैसा अक्सर लाइफ साइंस वालों के साथ होता है 

उन्हें 12 में से 13 महीने हॉस्टल चाहिए होता है 


नौकरी के बाद तो जैसे गाँव छूट ही गया था। 

नौकरी के बाद वापस आना खास परिस्थितियोँ में हुआ 

और ये भी तय हुआ 

की ये मेरी बड़ी लैब का एक छोटा सा हिस्सा है 

अब मेरी लैब किसी के कब्ज़े में नहीं   

तो सीधी-सी बात 

अपना लिखने-पढ़ने का उस हिसाब से एक स्पेस भी चाहिए 


Media Culture Lab का उदय 

नौकरी छोड़ने का बड़ा कारण भी रहा 

ये शुरु तो 2018 में ही हो गई थी 

VC Office की एक खास मिटिंग के बाद 

जिसके बाद दिल्ली में जजों की कोई खास कांफ्रेंस हुई 

और फिर तो रोज-रोज ऐसे से Code Decode होने लगे थे। 


तो आपको क्या लगता है, की मैं कहाँ हूँ?

Code Decode वाली Media Culture Lab में? 

उसका Head? Brain? Writer? Author? 

Science Communicator? या?


अभी तक 10th pass?  

12th Pass? 

BSc? MSc.? PhD?

या अभी तक Assistant Professor in Biotech?


या शायद निर्भर करता है?

जिससे बात हो रही है 

वो सिस्टम कहाँ है?

उसका खुद का सिस्टम किस स्तर का है?  

या उसे आपसे क्या चाहिए? 

आप सामने वाले से,

उसके सिस्टम के हिसाब से बात करोगे? 

या उससे ऊप्पर या नीचे फ़ेंकोगे?

तो कितनी बात बनेगी?  

यही हर किसी पर लागू होता है।  


आप खुद एक छोटा सा सिस्टम हैं 

और आपके सामने अनेकों सिस्टम, इकोसिस्टम 

 छोटे, बड़े, और बड़े, और बहुत बड़े  

पास, दूर, और दूर, और बहुत दूर  

उनसे जितना आपके अपने सिस्टम की बनेगी 

ख़ासकर, पास वाले सिस्टम्स से 

उतना ही आपका ये सिस्टम सही चलेगा 

वहाँ बीमारियाँ, दुख तकलीफें ना के बराबर होंगी 

और ज़िंदगी खुशहाली की तरफ़ बढ़ेगी 


मगर, 

जितना ज़्यादा इन सिस्टम्स से टकराव रहेगा 

उतना ही ज़्यादा 

बीमारियाँ, झगड़े और बदहाली रहेगी।   

तो पहली बात तो है 

ऐसे सिस्टम में रहना

या कम से कम अपने घर 

आसपास का ऐसा सिस्टम बनाना 

जहाँ टकराव कम से कम हो।  

कितना मुस्किल है?

ज़िंदगी भी उतनी ही मुस्किल या आसान है। 

Wednesday, July 15, 2026

सिस्टम और कोड 8

आपका नाम, आपकी सबसे बड़ी ID है 

आपका जन्मदिन, आपकी एक अहम ID है 

उसके बाद 

या कहीं-कहीं इनसे भी अहम 

आपके घर का पता है 

उसकी Location है 

उसके नंबर हैं या कोड हैं 

वो जिस ज़मीन पर बना है, वो है। 


वो किसकी थी?

वहाँ पहले कौन रहता था?

उसका अब असर?  

मगर क्यों?

अब तो वो आपका है? 

ख़ासकर, 

जबसे आपने उसपर घर बनाया है? 

या उसे खरीदा है? 


मगर, कुछ ऐसे भी हैं 

जिनके पास अपना घर ही नहीं है 

कोई रिफ्यूजी जैसे से रह रहे हैं 

और कोई रैंट पर 

और कोई शायद रोड पर या टैंट पर 


किसी के पास एक घर है जन्म से ही 

तो किसी के पास कई-कई भी 

किसी के पास जन्म से ही नहीं हैं 

तो किसी को एक वक़्त बाद मिला 

किसी के पास जो भी, जैसा भी है

अपना कमाया हुआ 


तो किसी को,

एक वक़्त के बाद धकाया हुआ है 

असर तो उस लोकेशन का भी है 

शायद अपना घर होने से भी कहीं ज्यादा?

क्यूँकि, 

अपने घर में बहुत कुछ अपने हिसाब से होता है 

मगर, किसी और के घर में वो सुविधा नहीं रहती।   


किसी भी जगह का, 

उसकी लोकेशन से बड़ा गहरा रिश्ता है 

शायद, किसी एक पार्टी के अनुसार वो सही है? 

मगर, किसी और पार्टी के नंबरों पर सही नहीं है 

या शायद, बाकी पार्टियों के नंबरों पर। 


या शायद,

उसकी location ही अजीबोग़रीब है? 

अहम गली पर,

मगर, भिड़ी गली से गुजरता हुआ? 

जैसे चारों तरफ़ से घिरा हुआ सा? 

आगे के नहीं, 

पीछे के हिस्से पर बना मकान?

या शायद ईधर या उधर खाली मकान? 

या प्लॉट कोई? 

  

या शायद, 

कोई आलीशान मकान 

या खँडहर कोई किसी गुजरे ज़माने का?

या आपका बनाया या खरीदा ना होकर 

आपके बाप, दादा का बनाया या खरीदा हुआ?

कभी भरा-भरा और हँसता खेलता आँगन? 


पहले उस जमीन पर कोई हादसा हुआ हो?

जैसे यूनिवर्सिटी के किसी मकान की कहानी? 

कोई हादसे वाला मकान?    

या कितनी ही ऐसी-सी गाँवों के मकानों की कहानियाँ? 

या शायद, 

ख़ासकर गाँवों में, वो पहले कभी 

पशुओं के रहने की जगह रही हो?

जहाँ उन्हें पीटा भी जाता हो?

और हो सकता है,

इंजेक्शन देकर दूध निकाला जाता हो?

या ऐसे conceive करवाया जाता हो?  


मगर, कल की किसी ऐसी कहानी का 

आज पर भला असर क्या और क्यों? 

वो सब आपने तो किया नहीं 

आप शायद उस वक़्त पैदा भी ना हुए हो? 


कोई भी राजनितिक पार्टी जब Reverse Gear लेती है 

और ऐसा कोई नंबर उसके लिए अहम हो 

तो उस कोड वाली जगह भी शांती कम रहती है 

या हादसे ज्यादा होते हैं 

या मारपिटाई ज्यादा ही रहती है 

ख़ासकर, 

जब वो पार्टी उस नंबर पर भारी हो 

या ऐसी किसी कोड वाली जगह। 


किसी वक़्त पर, किसी पार्टी के लिए 

कोई खास नंबर ज्यादा ही अहम हो?

तो वो वहाँ का सिस्टम बदलने लगते हैं  

अपने नंबर लाने के लिए, 

फाइलों के द्वारा, पॉलिसी के नाम पर 

या गुप्त तरीकों से 

या जबरदस्ती, गुंडागर्दी के जरिए। 

या साम, दाम, दंड, भेद कुछ भी करके 


ऐसे में उस सिस्टम के वो सब कोड 

सीधे-सीधे या गुप्त रुप से मार झेलते हैं। 

जिसके पास जितने कम सँसाधन होते हैं 

वो उतनी ही ज़्यादा झेलते हैं। 

और अगर आप थोड़े बहुत सँसाधन वाले हैं 

उस पार्टी की नजरों में 

तो मार ज्यादातर उन संसाधनों पर ही होती है। 

ताकी आपको काबू किया जा सके।     

 

इसे राजनीती की गुप्त भाषा में  

Time Travel कहते हैं

और, विज्ञान की भाषा में?

Reverse Engineering?

इसलिए, जहाँ आप रह रहे हैं 

कम से कम वहाँ के, 

राजनितिक सिस्टम को जानना बहुत जरुरी है।


मुझे इतने सालों बाद वापस गाँव धकाने के प्लान में  

यही Reverse Engineering थी 

Reverse Engineering में हर नंबर, हर नाम 

हर तारीख़, महीना और साल अहम होता है। 

जैसे किसी भी process या methodology में हर step 

हर chemical, organism, inoculation, और वक़्त वगैरह होता है 

या कहो की हर तरह का ingredient और उसकी मात्रा होती है। 


ख़ास तारीखों को, खास तरह के ड्रामे  

खास तरह के नामों या कोढ़ों का प्रयोग या दुरुपयोग 

ख़ास तरह के जीवों का प्रयोग या दुरुपयोग 

जो, जो मुझे हो रहा था या किया जा रहा था 

उसका बढ़ा, चढ़ा या बिगड़ा रुप, 

आसपास कुछ दिखा रहा था। 


कौन पार्टी किस तरह के बढे-चढ़े 

या बिगड़े, उस रुप के पीछे थी या है? 

ये कहीं-कहीं साफ़ नजर आ रहा था 

और कहीं-कहीं सब गोलमाल जैसे। 


इनमें कहीं Stone Diseases थी 

तो कहीं चौराहे पै पाहं आ ग्या?

कहीं लकवे थे, तो कहीं कैंसर 

कहीं शुगर, तो कहीं BP problems 

अब इतना कुछ,

किसी एक इंसान से जुड़ा तो हो नहीं सकता 

फिर?


Data और Code और System के ताने-बाने 

कई पार्टियाँ हैं, तो सबके अपने-अपने, ताने-बाने 

और लड़ाई कुर्सियों की। 

जैसे साँड़ों की लड़ाई में झाड़ों का खो 

जिसे बड़े लोग, 

Collateral damage मात्र कह कर टाल जाते हैं 


मतलब?

Data, Code और System?

Programming जैसे कोई? 

कहीं फाइल्स में अप्लाई हुई 

या कंप्यूटर या फ़ोन पर 

और?

समाज के उस आख़िरी हिस्से तक को असर गया? 


कुछ हद तक शायद?

जितना जहाँ-जहाँ सिस्टम automation पर है। 

बाकी? 

Enforced या धकाया हुआ या भकाया हुआ।

जबरदस्ती, डर, साइको और misinformation के तड़के। 


मतलब,

जन्म, मरण, पढ़ाई, नौकरी, शादी, बच्चे 

बीमारी, ईलाज या मौत या so-called पुनर्जन्म 

कहीं के भी सिस्टम कोड से पढ़े जा सकते हैं 

और पढ़ाए भी जा सकते हैं?

कहीं की भी ज़्यादातर समस्याएँ

ज़्यादातर,

वहाँ के सिस्टम या इकोसिस्टम की देन हैं 


इस सिस्टम के मीडिया कल्चर को 

वहाँ की राजनितिक पार्टियाँ 

अपनी-अपनी सुविधानुसार 

भले या बुरे के तड़के लगाती रहती हैं।  

और इन तड़कों में 

भावनाएँ, आस्था, विश्वास, भगवान 

वहाँ की कल्चर के साथ मिलकर 

और भी न जाने क्या-क्या रचते हैं? 

जैसे, Cult Politics?  

Monday, July 13, 2026

सिस्टम और कोड 7

Demo cracies and demo graphies?

De limitations and constituency creations?


मान लो, घर के दो हिस्से हों 

Lower House और Upper House 

Lower house मतलब Ground Floor ?

Upper House मतलब First  Floor? 

या Second Floor?


निर्भर करता है, कोड कहाँ का है?

अमेरिकन है या ब्रिटिश?

Uni T ED  States (US) या King D OM (UK)?

President या PM प्रधान Parliamentary House?

AM Vs PM?


रहते कहाँ हैं ये?

Official Residence ID?

White House या 10 Downing Street?

ऐसे ही और भी देश हैं 

और भी Parliament और House 

और

कितनी ही तरह के तरीके उन्हें बनाने और चलाने के।   


अब आपके घर का या आपका इन सबसे क्या लेना देना?

इनके बनने या हंग हो जाने से क्या रिस्ता?

इनके बनने या बनाने के तौर तरीकों से क्या हानी या लाभ?

इनके Floor Test या Cross Test का आपके घर से कैसा नाता?


इनके झगड़े आपके या आपके झगड़े इनके?

इनके झगड़े कहीं आपकी बिमारियाँ तो नहीं?

इनका De limitation का तरीका 

नए constituency या state या district 

या किसी भी तरह की division या divide का 

आपके रिश्ते नातों या बिमारियों से क्या लेना देना?

या शायद मौत तक से?


जो ऊप्पर हो रहा है, वही नीचे हो रहा है?

ऊप्पर सबसे पहले फाइल्स में चलता है 

वही चल फिरकर आप तक आता है 

ठीक उसी वक़्त जब वहाँ चल रहा होता है 

ठीक उसी वक़्त शादी होती हैं या कोर्ट केस 


ठीक उसी वक़्त, बच्चे conceive होते हैं 

या बच्चे व्यस्क अवस्था की तरफ

ठीक उसी वक़्त, बच्चों के puberty के sign आते हैं 

ठीक उनकी तारीख, महीने और साल के अनुसार 

लड़कियों के period शुरु होते हैं 

या कहीं बच्चे गिरते हैं, बिना पैदा हुए 


ठीक उसी वक़्त, 

बीमारी का कोई लक्षण दिखता है 

या आगे बढ़ता है 

ठीक उसी वक़्त, एक्सीडेंट होते हैं 

हाथ, पैर टूटते हैं 

कहीं सीधे-सीधे जुड़ते हैं 

और कहीं?

उल्टे-सीधे?

ये सब होने वालों के नाम, जन्मदिन 

ये सब होने की जगह, 

डॉक्टर, हॉस्पिटल का नाम 

उस हॉस्पिटल का एड्रेस 

और दवाईयों के नाम तक 

या ऑपरेशन के तरीक़े 

और तारीख़ और समय तक 

सब आपके राजनितिक सिस्टम के अनुसार होता है। 


थोड़ा ज्यादा ही लग रहा है ना?

ये कम है 

अभी इससे आगे भी बहुत कुछ है 

Reverse और Future Engineering 

Synthesis और Synthetic Engineering 

Built in और Artificial Engineering 

और भी          

सिस्टम और कोड 6

आप जो कर रहे हैं, क्या वो सब खुद ही कर रहे हैं?

या आपका सिस्टम (राजनितिक) इतना आगे जा चुका है 

की वो आपको एक रॉबोट से ज्यादा कुछ नहीं समझता? 

और उस रॉबोट का कंट्रोल अपने पास रखता है? 


अगर हाँ, तो उस कंट्रोल को वापस कैसे लिया जाए?

रॉबोट को वापस इंसान कैसे बना जाए?

रॉबोट को तो मालूम ही नहीं होता की वो रॉबोट है  

सबसे पहले तो उस रॉबोट बने इंसान को जगाया जाया 

उसे बताया जाए 

की इंसान, रॉबोट कैसे बनते हैं या बनाए जाते हैं 


ये कुछ कुछ ऐसे है 

जैसे दो रोसोईये रोटी बना रहे हैं एक जैसी 

सामान एक जैसा, 

तरीका एक जैसा और रोटी भी एक जैसी-सी 

दिखने में भी और खाने में भी  

कौन सी असली है और कौन सी कॉपी, 

पता ये करना है 

मगर ये पता क्यों करना है?


क्यूँकि, 

ऐसा सा ही कुछ वो आपके स्वास्थ्य के साथ कर रहे हैं 

ऐसे ही आपके रिश्तों के साथ खेल रहे हैं 

आपके घर बाहर के सामान के साथ कर रहे हैं 

नौकरी, पैसा, ज़मीन जायदाद के साथ कर रहे हैं 


उन्होंने हर जीव-निर्जीव को एक टैग दे दिया है 

एक कोड सा कोढ़ दे दिया है 

उस कोड के खेल आपके जन्म से भी पहले से चल रहे हैं

आपका जन्म,

उसी सिस्टम के कोड की जरुरत के अनुसार हुआ है 


अहम है ये जानना 

की आपका जन्म जहाँ कहीं आप पैदा हुए हैं 

उस सिस्टम की जरुरत के अनुसार हुआ है 

मगर, उस सिस्टम में कई और सिस्टम हैं 

और पार्टियाँ हैं 

जरुरी नहीं आप उनके सिस्टम की भी जरुरत हों 


और 

ये भी हो सकता है 

की बाकी पार्टियों के सिस्टम का रोड़ा हों 

उनकी कुर्सियों के टिके रहने में अहम रुकावट हों?

तो वो रुकावट के लिए खेद है, खेलने लगते हैं। 

ऐसे ही, जैसे कोई Herald House?


हर घर की तो नहीं, 

मगर बहुत से घरों की ऐसी सी कहानियाँ हो सकती हैं

इसलिए,

वहाँ वाद विवाद और लड़ाई झगडे भी थोड़े जयादा ही होते हैं। 


हालाँकि, उन्हें कम और ख़त्म करने के तरीके भी हैं

वो क्या हैं?

वो है, ऐसे  सिस्टमस को समझना 

या ऐसे सिस्टम से दूर रहना। 


संभव है क्या?

जानने की कोशिश करते हैं आगे 

Saturday, July 11, 2026

सिस्टम और कोड 5

सामान्तर घड़ाईयाँ 

क्या होती हैं?

और कैसे घड़ती हैं ये राजनितिक पार्टियाँ?  


Experiment 

सामान्तर घड़ाई,

Example 

दो चुल्हों पर अलग-अलग रसोईयों द्वारा एक जैसी सी रोटी बनाना   

बनाने वाले रसोईये अलग हैं 

सामान भी उनका अपना है 

मगर, एक जैसा-सा है 

एक जैसा-सा है 

एक ही नहीं है। 


Ingredients 

जैसे आटा, पानी, चुल्हा 


Process, Method या बनाने का तरीका?

वो भी एक जैसा सा है 

जैसे आटा गूँथना 

उसकी लोई बनाना 

उसको चकले बेलन से 

गोल गोल आकार देना   

फिर,

तवे पर रखना 

एक तरफ से सेकना 

फिर दूसरी तरफ से 

और फिर 

आग पर फूलाना  

एक ही वक़्त में

ईधर ये रसोईया 

और उधर वो 

जैसे एक को कॉपी करता हुआ। 


रसोईयों के नाम?

मान लो A और B 

या ये भी A और वो भी A?

या ये A और वो A + या A -

या ये A और वो AA?

या कुछ और भी हो सकते हैं। 


क्या फ़र्क पड़ जाएगा?

नाम ऐसे एक होने से?

या बदल देने से?

पद का फर्क 

जाती का फर्क 

धर्म का फर्क

अमीरी गरीबी का फर्क 

और भी कितनी ही तरह के अंतर। 

 

और

कितने ही तरह के कोढ़ 

Conflict create करने के 

या शांती?

बीमारी पैदा करने के 

या ठीक?

बीमारी आगे बढ़ाने के?

या ऑपरेशन कर कुछ काट पिट के?

या दुनिया से ही उठा देने के?  

या फिर तरक्की की तरफ ले जाने के?


सच में इतना कुछ बदल जाता है क्या?

सिर्फ नाम के ही थोड़े से हेरफेर से?       

आपका नाम, सिर्फ एक नाम नहीं है 

वो आपकी खास पहचान है 

खास ID, हर पहचान पत्र में, हर जगह 

उसमें एक शब्द का भी हेरफेर 

ज़िंदगी और मौत का फर्क बन सकता है 

तरक्की या बदहाली का फर्क हो सकता है। 


सोचो फिर,

उस नाम की पहचान पर 

किसी और से उसके जैसे से 

या उससे अलग से कुछ प्रतिबिम्ब घड़वाना  

क्या कुछ कर सकता है?  

या उस नाम के कोढ़ से 

ऐसे प्रतिबिम्ब घड़वाने से?


जैसे एक रसोईया A रोटी बना रहा है 

दूसरा रसोईया A, वो भी रोटी बना रहा है 

या कहो की पहले वाले A को कॉपी कर रहा है 

जैसे आपके किसी सर्टिफिकेट की कॉपी?

और सोचो, अगर वो इतना निपुण हो 

की यही ना पता चल पाए 

की असली रोटी कौन सी है और नकली कौन सी?  

तो क्या कहेंगे उसे?

Process  Copy?

Method Copy?

Result Copy?

या आपके पास कोई बेहतर शब्द है?

अगर हाँ तो बताओ?


ऐसी ऐसी सी कॉपियों 

या इनसे बेहतर कॉपियों 

या प्रतिबिम्बों 

या थोड़ा और आगे, बहरुबियों  

या Reverse, Forward Designs and Engineering 

या? Time Machine, Time Travel पढें?


आपके आसपास से ही?

या खुद आपकी अपनी ज़िंदगियों से?

देखें तो, 

की आप जो कर रहे हैं, वो सब खुद ही कर रहे हैं?

या आपका सिस्टम (राजनितिक) इतना आगे जा चुका है 

की वो आपको एक रॉबोट से ज्यादा कुछ नहीं समझता? 

और उस रॉबोट का कंट्रोल अपने पास रखता है? 

Friday, July 10, 2026

सिस्टम और कोड 4

घर खीर तो बाहर खीर?

जितना और जैसा किसी भी इंसान को 

घर से मिल रहा है, 

उतना ही और वैसा सा ही बाहर से?  


भला कितना सच है इसमें? 

कोड और सामान्तर केस स्टडी 

कुछ-कुछ, ऐसा-सा ही कह रहे हैं?

जानकार क्या कहते हैं?


घर दुलार, तो बाहर दुलार? 

घर तकरार, तो बाहर तकरार?

घर शांती, तो बाहर शांती?

घर दाना-पानी, तो बाहर दाना-पानी?


घर ईज्जत, तो बाहर ईज्जत?

घर मार-धाड़, तो बाहर मार-धाड़?  

घर संपन्न, तो बाहर सम्पन्नता?

घर गरीबी, तो बाहर गरीबी?


घर, घर, तो बाहर भी अपना घर? 

घर ही बेघर, तो बाहर भी कैसा घर?  

जो घर में छाया, तो बाहर भी छाया ही छाया?

जो घर में सिर पर साया, तो बाहर भी आशीर्वाद?  


घर द्वेष तो बाहर भी द्वेष?

घर क्लेश तो बाहर क्लेश?

जो लूटे घर में, वो लूटे बाहर भी?

घर मिले माया, तो मिले बाहर माया?


घर मंदिर, तो जग मंदिर, 

क्या जाना फिर कहीं कोई मंदिर?

घर ही बुचड़खाना, तो बाहर भी बुचड़खाना?

जैसी घर से आस, वैसी बाहर से, क्यों कम या ज्यादा?

सिस्टम और कोड 3

बीमारु राजनीती?


"अगर वो दिल्ली में डेंगू फैलाएँगे 

तो हम भी फोगिंग करेंगे?" 

अरविंद केजरीवाल 


क्या आम आदमी जानता है 

की राजनितिक पार्टियाँ 

बीमारी-बीमारी खेलती हैं? 

जैसे Dengue और Fogging 

दोनों ही कोड हैं 

अब कोड हैं या कोढ़ हैं?

ये आम आदमी तय करे। 


ऐसे ही हर बीमारी एक कोड है 

कोड है या कोढ़ है?

और अगर किसी को ये सब

 नया-नया पता चले, 

और वो जनता को आगाह करने की 

कोशिश भर भी करे तो?

वो देशद्रोही है? 

जैसे देशद्रोह भी एक कोड है। 

वो कब, किसको और क्यों चाहिए?

सब राजनीती की जरुरतों के 

हिसाब-किताब की राजनीती है। 


जैसे 

"तुमने हमें लकवा किया, 

हमने तुम्हें कर दिया"  

और आप हैरान 

ये क्या कह या समझा रहे हैं? 

मुझे एक दिन कुछ ऐसा सा हुआ था 

और फिर उसके लक्षण 

कई महीनों या कहो 

की 2-3 साल भुगते। 

थोड़े बहुत अब भी,  

कई बार दिख जाते हैं

या कहो की दिखा दिए जाते हैं  

अगर, कुछ सावधानियाँ ना रखूँ तो। 

 अब ये सब कहने 

या राजनितिक ड्रामे के द्वारा 

बताने-समझाने वाले कौन थे या हैं?


किसी आम आदमी को ये कहना 

की तुमने हमें लकवा किया?

जिसे यही नहीं मालूम हो, 

की किसी को लकवा भी 

किआ जा सकता है?


और पता चले 

की लकवा ही नहीं 

बल्की, 

बाकी सब बिमारियाँ भी 

की जा सकती नहीं, बल्की 

की जा रही हैं।   

मगर कैसे?

Knowledge and Resources Abuse 


गाँव आई, तो पता चला 

यहाँ इसे लकवा 

वहाँ उसे लकवा 

और?

खास नाम (कोड)

खास तारीख 

और स्थान 

और?

खास तरह के तौर-तऱीके 


और?

फिर उनका खास जगह ईलाज 

और ख़ास वक़्त पर ठीक होने के लक्षण 

पूरा ठीक होना 

या आधा अधूरा?

या दुनियाँ से ही विदा हो जाना?

या कर दिया जाना?

जैसे रितु?

और वो कहते हैं, चुप। 


नहीं तो?    

तुम देशद्रोही हो?

ऐसे ही होते हैं देशद्रोही?

या नहीं तो    

इसको या उसको उठा दिया जाएगा?

दुनियाँ से ही?  


क्या इन आम लोगों को मालूम है?

की इनको लकवा हुआ नहीं 

बल्की, किया गया है?

मगर, 

किसने और कैसे?

और सबसे अहम 

क्यों?

क्या दोष इन अंजान लोगों का?


Politics of Conflict of Interests   

जिसकी सबसे ज्यादा मार 

अंजान, कम पढ़ा लिखा 

और ज़्यादातर समाज का 

सबसे नीचे वाला तबका भुगतता है। 

क्यों?

क्यूँकि,

उस समाज की राजनीती 

और वहाँ का सिस्टम सही नहीं है। 

ऐसा भी नहीं है की पढ़े लिखे या 

समाज का उप्परी तबका नहीं भुगतता 

भुगतता वो भी है 

मगर, उसके पास संसाधन और ज्ञान 

थोड़ा-सा ज्यादा होता है 

तो जल्दी उभर जाता है 

मौत को टाल पाता है 

और ज्यादातर, 

लम्बी और बेहतर उम्र पाता है।   


जिस दिन बीजेपी आई 

उस दिन कांग्रेस के किसी खास को 

लकवा हुआ था। 

इसलिए उन्होंने मुझे लकवा किया?

समझ ही नहीं आया 

मैं तो बीजेपी से नफ़रत करती थी 

और कांग्रेस के प्रति कहीं न कहीं 

फिर भी झुकाव था 

तो ये क्या था?

अब तो एक और प्रश्न था 

आख़िर ये राजनितिक पार्टियाँ हैं कौन? 


पता चला, 

या कहो की जितना मुझे समझ आया 

कोई नहीं, कोड मात्र?  

किसी भी कोड की, कभी भी 

किसी को भी जरुरत हो सकती है 

और वो ईधर से उधर हो सकते हैं 

इसीलिए, ये इसकी A टीम 

वो उसकी B टीम वगैरह हैं 

कब कौन, किसकी A, B है?  

सब जरुरत के हिसाब-किताब से हैं। 


तो, आपको कब कौन-सी बीमारी होती है?

ये जहाँ कहीं आप रह रहे हैं 

वहाँ का राजनितिक ताना-बाना बताता है 

इसलिए बहुत-सी बिमारियाँ 

उस ताने-बाने से थोड़ा बाहर होने से ही 

या तो ठीक हो जाती हैं 

या होने लगती हैं। 

वैसे इस ताने-बाने के तार 

सारे संसार में ही ऐसे हैं 

जैसे लोकल से हों 

क्यूँकि,

टेक्नोलॉजी ने दुनियाँ को 

बहुत ही सिमित कर दिया है। 

Sunday, July 5, 2026

सिस्टम और कोड 2

सिस्टम का कौन सा कोड 

आपके भले में है या बुरे में 

ये कैसे पता चले?

क्यूँकि, 

आपको तो राजनितिक सिस्टम के कोड ही नहीं पता?


पता हैं ना,

कैसे?

सिस्टम के कोड बड़े ही सीधे से हैं, साफ़ से हैं 

किसी अच्छे वाले शीशे में दिखते प्रतिबिम्ब से हैं 

सामाजिक से हैं, पारम्परिक  हैं, भोले से हैं 

उनमें छल नहीं है, कपट नहीं है 

वो जैसे सामाजिक स्तर पर हैं, बस वैसे ही हैं 

जैसे आपका भाई आपका भाई है और बहन, बहन 

माँ, माँ है और बाप, बाप, बेटा बेटी, बेटा बेटी ही हैं। 


उन्हें अगर उल्टे-पुल्टे, देखने-समझने या सुनने भी लगोगे 

तो गड़बड़ है 

नहीं तो चोरी छुपे गड़बड़ करने वालों को भी दिक्कत होगी 

काफी वक़्त लगेगा, उनके बिगाड़ में और दरार में 

और बिमारियों की पैदाईश में भी। 

मौत तो फिर ज्यादातर, उस सबके बाद ही है।   


मगर, शीशे भी सब एक जैसे कहाँ हैं?

कुछ शीशे प्रतिबिम्ब वैसा नहीं दिखाते, जैसा है 

उससे काफी ईधर-उधर भी दिखा सकते हैं 

उसके पीछे विज्ञान है, जिसे हर कोई नहीं समझ पाता 

ख़ासकर, जब तक वो गुप्त रखने की कोशिशें होती हैं। 


और उस गुप्त ज्ञान-विज्ञान के अनुसार?

आपका भाई, भाई नहीं, बहन, बहन नहीं 

माँ-बाप, माँ-बाप नहीं, बेटा-बेटी, बेटा-बेटी नहीं 

बल्की, अल्फ़ा हैं, बीटा हैं, गामा हैं, थीटा हैं 

और भी पता ही नहीं क्या-क्या हैं? 


वहाँ रेडियो है, तो?

Radio waves के प्रयोग और दुरूपयोग भी 

इंटरनेट है?

तो? 

Sattellite से या तार से या तरंगो के सहारे भी 

Wi Fi है और Hot Spot भी?

 Proximate है और 

Blue Tooth है और Infra Red भी 

Quick Share है और Q R कोड भी 

Screen Cast है और Mira Cast भी। 


L ED है और Holo G Ram भी 

Lidar है और Ladar भी 

Radar है और 

Sensors हैं और Simulators भी 

Immesion है और Proxy और Proximity भी। 


3D है तो Fish Tech भी 

Data है तो Mining भी 

Fin Tech है तो?

बीमारी भी हैं और उनके ईलाज भी 

साथ में हम और आप जैसों का ईलाज भी 

"चाचा जाण ना देणी यो, 

आज इसका पुरा ईलाज बाँधागे"

जैसे-जैसे भाँड़ और भंडोले भी।  


अब ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे, भाँड-भाँडोले हैं 

तो युद्ध भी 

और होते देखा दुनिया को Lock Down भी 

Lock Down ने ही समझाया 

बिमारियों और मौतों के कोढों का सँसार भी 

Reverse Engineering और Built-in Systems भी 

Human Made और Artificial Engineering भी  

Synthesis और Synthetic Engineering भी 

पानी फेरना और चूना लगाना भी। 


कुछ समझ आया?

थोड़ा बहुत?

चलो, बाकी आगे 

एक-एक करके।