उन्हें ना बच्चोँ की कोई फिक्र होती है और ना ही बुजर्गों की। फिर युवाओँ की तो होगी कहाँ?
Automated System?
Along with
Enforced?
Media Ingredients?
And Social Simulations?
ठीक ऐसे ही
कहीं का सिलेबस बदलता है
किताबें बदलती हैं
कोर्स बदलते हैं
ऐसे ही बच्चों के पेपर होते हैं
और ऐसे ही परिणाम आते हैं।
ऐसे ही शादी होती हैं
या रिश्तों में दरार
ऐसे ही बच्चे पैदा होते हैं
या नहीं होते
या होने से पहले ही
काम तमाम कर दिए जाते हैं।
ठीक ऐसे ही जुर्म होते हैं
कोर्ट में केस चलते हैं
और उनके फैसले भी ऐसे ही होते हैं।
और जरुरी नहीं,
समाज में आम लोगों को
ऐसा कुछ अंदाजा तक हो
की उनकी ज़िंदगियाँ
राजनितिक पार्टियॉं की
Social Simulation जैसी सी
कहानियाँ
या Experiment भर हैं।
ऐसे से ही कुछ और उदाहरण लेते हैं आगे की कैसे कैसे Template, Social Simulations के लिए तैयार होते हैं? और कैसे उनमें से कोई एक ख़ास घड़ाई के काम आता है? या यूँ कहें की अलग अलग पार्टियाँ, अपनी ही तरह की अलग अलग Templates पर एक साथ काम कर रही होती हैं।

