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Wednesday, June 24, 2026

Success is A Very Relative Term

सफलता, के मायने अलग-अलग हैं 

अलग-अलग जगह पर 

और अलग-अलग लोगों के लिए।  


आप प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होते हुए भी 

असफल हो सकते हैं,

बहुत सी नज़रों में 

सिर्फ असफ़ल ही नहीं 

बल्की, सत्यानाशी तक हो सकते हैं। 


किन्हीं नज़रों में 

हत्यारे और अपराधी हो सकते हैं 

तानाशाह हो सकते हैं 

जो कुर्सी पर ना होने से भी 

कहीं बड़े असफ़लता के मायने हैं।  


मगर कहीं खूनी भी, 

अगर एक उम्र के बाद 

जैसे-तैसे जुगाड़ से 

एक अदना-सी नौकरी तक पा जाए 

तो सफल हो सकता है 

शायद, किन्हीं नजरों में?  


कहीं, जैसे तैसे शादी होना 

और फिर बच्चे पैदा कर देना ही 

सफलता की निशानी हो सकता है 

चाहे उन्हें खाने-पिलाने तक के लाले पड़े हों 

तन ढकने तक को ढंग के कपडे 

या सिर पर छत तक ना हो। 

 

जुबान,

उन सफलता की निशानियों को 

कितनी ही भद्दी जुबान में, 

कितने ही गुस्से में 

पेश आती हो 

चाहे उनकी मार पिटाई तक होती हो 

मगर, फिर भी वो मर्द (?) सफल हैं  

कम से कम, उस तबके के समाज में।  


फिर कहीं शायद ऐसे मर्दों की 

मर्दानगी पर ही प्रश्नचिन्ह लगते हों   

जिन्हें लगता हो 

बच्चे तो गली के कुत्ते भी पैदा कर लेते हैं 

कीड़े-मकोड़े भी इस काबिल होते हैं 

फिर इंसान होकर भी 

ये कौन-सी और कैसी मर्दानगी?


जिसे अपनी ही सफलता की कहानियों को

ढंग से रखना तक नहीं आता हो

बोलना तक नहीं आता हो 

जिसका अपनी जुबान तक पर वश नहीं 

जो अपने से कमजोरों की रक्षा की बजाय 

उन पर हाथ, पैर या जुबान चलाए

कहीं कहीं तो डंडा तक उठाए नज़र आए  

और फिर भी मर्द कहलाए?

थू ऐसी मर्दानगी पर। 


कहीं सफलता शायद 

व्यवसाय नाम के धंधे को 

जैसे-तैसे बढ़ाना भी हो सकता है 

फिर चाहे अपने ही बहन भाहियों 

या चाचे ताऊवों की ज़मीन या प्रॉपर्टी 

धोखे या गुंडागर्दी तक से हड़पना क्यों हो 

गरीबों को उनके छोटे मोटे हक़ तक से 

वंचित करना ही क्यों ना हो?


कहीं कहीं तो बहन भाईयों के 

खासकर, बहन बेटियों के हस्ताक्षर तक ना हों 

या शायद ऐसों के खिलाफ तक लिखकर दे रखा हो 

माँ की मौत के बाद, बेटी शायद नाबालिक ही हो  

तो क्या हुआ?  

धंधें तो अक्सर शायद, ऐसे ही फूलते फलते हैं?

 

कुछ तो इससे भी थोड़ा आगे बढ़ 

घर में किसी मौत तक पर, 

या कमजोर पड़े किसी वक़्त तक का इन्तजार 

गिद्ध सी नज़र से ताकते हों 

और मौका पड़ते ही 

जो और जितना हड़प सकें

बिना किसी हिचक या झिझक के  

अढ़कार जाते हों

आखिर धँधा तो धँधा है? 


फिर, वो धँधा चाहे 

समाज सेवा के नाम पर बने 

किसी ट्रस्ट के नाम पर ही क्यों ना हो

और ट्रस्ट भी शिक्षा के नाम पर? 

मगर, फिर भी शायद 

ऐसे लोग तक, 

किन्हीं नजरों में  सफल कहला सकते हैं? 


एक वो तबका भी है 

जहाँ सबकुछ बैलेंस-सा होता है 

पढ़ाई लिखाई, शादी बच्चे, नौकरी रिश्ते 

घर गाडी और बैंक बैलेंस भी 

 मगर, फिर भी 

अपनी ज़िंदगी का,

कोई भी फैसला उनका अपना नहीं होता 

शादी या बच्चे पैदा करना तक। 

 

कहीं कहीं तो 

तन्खा तक अपनी नहीं होती 

सिर्फ़ किसी नौकर की तरह 

कहा गया 

या सौंपा गया काम करना ही अपना होता है 

 तन्खा घर के किसी बड़े ठेकेदार के पास जाती है 

और वो ठेकेदार, उसमें से थोड़ा बहुत 

बच्चों के जैसे, जेब खर्ची सा थमा देता है 

और अक्सर उस पर भी वाद विवाद होते हैं 

तन्खा पर नहीं, अपनी ही कमाई पर नहीं 

बल्की, बच्चों के जैसी सी जेब खर्ची पर। 

वाह रे नए युग तक में गुलाम रखने वाले सफ़ल ठेकेदार?  

 

क्यूँकि, इस तबके में इंसान को  

खासकर औरत को,

कभी भी बड़ा नहीं होने दिया जाता 

पैसों और प्रॉपर्टी के नाम पर तो कभी नहीं 

बाकी कामों और कर्त्तव्यों के नाम पर 

इस तबके का ये वर्ग 

कुछ ज्यादा ही जल्दी बड़ा कर दिया जाता है 

जैसे ही शरीर से बड़ा दिखने लगे। 

 

क्यूँकि, इस समाज के अनुसार 

इस वर्ग के पास सिर्फ़ शरीर ही होता है 

दिमाग नहीं, 

इसलिए, शरीर भी किसी और की ही प्रॉपर्टी होता है 

जिसे वो जैसे चाहें और जहाँ चाहें प्रयोग करें।   

फिर क्या ऑफिस और क्या घर 

सब जैसे किसी बड़े ठेकेदार के हवाले। 


और 

ऐसे ऐसे इंसान के रुप में,

चलते फिरते सिर्फ और सिर्फ, 

शरीर मात्र?

लोग भी शायद सफ़ल कहला सकते हैं 

खासकर, उन ठेकेदारों की निगाहों में।   

हालाँकि,

आपको या हम जैसों को 

वो कोई भद्दी और घटिया जेल नज़र आ सकती है।  


और भी कितने ही तरह के तबके है, समाज हैं 

इस दुनियाँ में, 

आपके आसपास भी होंगे 

जानिए उनके सफलता के पैमानों को। 

कुछ मेरे बताए गए केसों से भी बुरे हो सकते हैं

शायद?  

जैसे?

एडिक्ट केस?

या शायद कुछ एक बुजर्गों के हाल?  

 

फिर, कुछ बेहतर भी हो सकते हैं

शायद?

जैसे, पढ़े लिखे समाज का

सही मायने में पढ़ा लिखा तबका या समाज? 

या शायद, कम पढ़े लिखे होकर भी 

बहुत अच्छी जगहों पर ना होकर भी 

शाँति और एक दूसरे को सम्मान देता हुआ 

इंसान को इंसान समझता हुआ 

आगे बढ़ता समाज का तबका?

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