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Friday, July 10, 2026

सिस्टम और कोड 3

बीमारु राजनीती?


"अगर वो दिल्ली में डेंगू फैलाएँगे 

तो हम भी फोगिंग करेंगे?" 

अरविंद केजरीवाल 


क्या आम आदमी जानता है 

की राजनितिक पार्टियाँ 

बीमारी-बीमारी खेलती हैं? 

जैसे Dengue और Fogging 

दोनों ही कोड हैं 

अब कोड हैं या कोढ़ हैं?

ये आम आदमी तय करे। 


ऐसे ही हर बीमारी एक कोड है 

कोड है या कोढ़ है?

और अगर किसी को ये सब

 नया-नया पता चले, 

और वो जनता को आगाह करने की 

कोशिश भर भी करे तो?

वो देशद्रोही है? 

जैसे देशद्रोह भी एक कोड है। 

वो कब, किसको और क्यों चाहिए?

सब राजनीती की जरुरतों के 

हिसाब-किताब की राजनीती है। 


जैसे 

"तुमने हमें लकवा किया, 

हमने तुम्हें कर दिया"  

और आप हैरान 

ये क्या कह या समझा रहे हैं? 

मुझे एक दिन कुछ ऐसा सा हुआ था 

और फिर उसके लक्षण 

कई महीनों या कहो 

की 2-3 साल भुगते। 

थोड़े बहुत अब भी,  

कई बार दिख जाते हैं

या कहो की दिखा दिए जाते हैं  

अगर, कुछ सावधानियाँ ना रखूँ तो। 

 अब ये सब कहने 

या राजनितिक ड्रामे के द्वारा 

बताने-समझाने वाले कौन थे या हैं?


किसी आम आदमी को ये कहना 

की तुमने हमें लकवा किया?

जिसे यही नहीं मालूम हो, 

की किसी को लकवा भी 

किआ जा सकता है?


और पता चले 

की लकवा ही नहीं 

बल्की, 

बाकी सब बिमारियाँ भी 

की जा सकती नहीं, बल्की 

की जा रही हैं।   

मगर कैसे?

Knowledge and Resources Abuse 


गाँव आई, तो पता चला 

यहाँ इसे लकवा 

वहाँ उसे लकवा 

और?

खास नाम (कोड)

खास तारीख 

और स्थान 

और?

खास तरह के तौर-तऱीके 


और?

फिर उनका खास जगह ईलाज 

और ख़ास वक़्त पर ठीक होने के लक्षण 

पूरा ठीक होना 

या आधा अधूरा?

या दुनियाँ से ही विदा हो जाना?

या कर दिया जाना?

जैसे रितु?

और वो कहते हैं, चुप। 


नहीं तो?    

तुम देशद्रोही हो?

ऐसे ही होते हैं देशद्रोही?

या नहीं तो    

इसको या उसको उठा दिया जाएगा?

दुनियाँ से ही?  


क्या इन आम लोगों को मालूम है?

की इनको लकवा हुआ नहीं 

बल्की, किया गया है?

मगर, 

किसने और कैसे?

और सबसे अहम 

क्यों?

क्या दोष इन अंजान लोगों का?


Politics of Conflict of Interests   

जिसकी सबसे ज्यादा मार 

अंजान, कम पढ़ा लिखा 

और ज़्यादातर समाज का 

सबसे नीचे वाला तबका भुगतता है। 

क्यों?

क्यूँकि,

उस समाज की राजनीती 

और वहाँ का सिस्टम सही नहीं है। 

ऐसा भी नहीं है की पढ़े लिखे या 

समाज का उप्परी तबका नहीं भुगतता 

भुगतता वो भी है 

मगर, उसके पास संसाधन और ज्ञान 

थोड़ा-सा ज्यादा होता है 

तो जल्दी उभर जाता है 

मौत को टाल पाता है 

और ज्यादातर, 

लम्बी और बेहतर उम्र पाता है।   


जिस दिन बीजेपी आई 

उस दिन कांग्रेस के किसी खास को 

लकवा हुआ था। 

इसलिए उन्होंने मुझे लकवा किया?

समझ ही नहीं आया 

मैं तो बीजेपी से नफ़रत करती थी 

और कांग्रेस के प्रति कहीं न कहीं 

फिर भी झुकाव था 

तो ये क्या था?

अब तो एक और प्रश्न था 

आख़िर ये राजनितिक पार्टियाँ हैं कौन? 


पता चला, 

या कहो की जितना मुझे समझ आया 

कोई नहीं, कोड मात्र?  

किसी भी कोड की, कभी भी 

किसी को भी जरुरत हो सकती है 

और वो ईधर से उधर हो सकते हैं 

इसीलिए, ये इसकी A टीम 

वो उसकी B टीम वगैरह हैं 

कब कौन, किसकी A, B है?  

सब जरुरत के हिसाब-किताब से हैं। 


तो, आपको कब कौन-सी बीमारी होती है?

ये जहाँ कहीं आप रह रहे हैं 

वहाँ का राजनितिक ताना-बाना बताता है 

इसलिए बहुत-सी बिमारियाँ 

उस ताने-बाने से थोड़ा बाहर होने से ही 

या तो ठीक हो जाती हैं 

या होने लगती हैं। 

वैसे इस ताने-बाने के तार 

सारे संसार में ही ऐसे हैं 

जैसे लोकल से हों 

क्यूँकि,

टेक्नोलॉजी ने दुनियाँ को 

बहुत ही सिमित कर दिया है। 

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