घर खीर तो बाहर खीर?
जितना और जैसा किसी भी इंसान को
घर से मिल रहा है,
उतना ही और वैसा सा ही बाहर से?
भला कितना सच है इसमें?
कोड और सामान्तर केस स्टडी
कुछ-कुछ, ऐसा-सा ही कह रहे हैं?
जानकार क्या कहते हैं?
घर दुलार, तो बाहर दुलार?
घर तकरार, तो बाहर तकरार?
घर शांती, तो बाहर शांती?
घर दाना-पानी, तो बाहर दाना-पानी?
घर ईज्जत, तो बाहर ईज्जत?
घर मार-धाड़, तो बाहर मार-धाड़?
घर संपन्न, तो बाहर सम्पन्नता?
घर गरीबी, तो बाहर गरीबी?
घर, घर, तो बाहर भी अपना घर?
घर ही बेघर, तो बाहर भी कैसा घर?
जो घर में छाया, तो बाहर भी छाया ही छाया?
जो घर में सिर पर साया, तो बाहर भी आशीर्वाद?
घर द्वेष तो बाहर भी द्वेष?
घर क्लेश तो बाहर क्लेश?
जो लूटे घर में, वो लूटे बाहर भी?
घर मिले माया, तो मिले बाहर माया?
घर मंदिर, तो जग मंदिर,
क्या जाना फिर कहीं कोई मंदिर?
घर ही बुचड़खाना, तो बाहर भी बुचड़खाना?
जैसी घर से आस, वैसी बाहर से, क्यों कम या ज्यादा?
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