सारा खेल डाटा में है?
डाटा को पढ़े लिखे और कढ़े लोगों ने
हथियार बना लिया है?
कैसा हथियार भला?
डाटा अगर भले लोगों के पास है?
तो वो भलाई करेंगे?
और बुरे लोगों के पास है?
तो?
लग गई नज़र समझो?
मान लो कोई लड़की
किसी को अपने भाई के लिए पसँद है?
और?
किसी को अपने दोस्त के लिए?
क्या होगा?
क्या लड़की को उनमें से कोई पसँद है?
क्या हो वो उनमें से ही किसी एक को
या किसी और को ही पसँद करती हो?
क्या वो शादी होने देंगे उसकी ?
ये भी हो सकता है
की वो लड़के किसी और को पसँद हों?
तो क्या होगा?
ऐसा ही लड़कों के केस में भी हो सकता है?
डाटा हथियार बन गया की नहीं?
कौन किस को पसँद करता है?
और कौन किस को नहीं?
यही डाटा ज्यादा पढ़े लिखे और कढ़े
बदल भी सकते हैं?
उसमें हेरफेर या गोलमाल भी कर सकते हैं?
और हो सकता है
आपको इसकी खबर तक ना हो?
कुछ कुछ ऐसे
जैसे वो हॉस्पिटल में कई बार बच्चे बदल देते हैं?
सुनी होंगी ऐसी सी कहानियाँ?
या हो सकता है
आपके आसपास ऐसा कोई केस भी हो?
या ऐसे ही किसी बच्ची को उठा दिया हो?
उसे हॉस्पिटल पहुँचाकर, दुनियाँ से ही?
क्या हुआ था उसे?
समझ ही नहीं आया?
ये भी उस वक़्त के डाटा में कोढ़ सा छिपा है?
इशारों सा, संकेतों सा?
पेपरों में?
Projects में?
Professors के उस वक़्त के प्रोफाइल में?
और infrastructure में भी?
ऐसे ही जैसे
मान लो आपने कोई पेपर दिया हो?
आपने ऑनलाइन देखा
आपका और आपकी दोस्त दोनों का हो गया?
लेकिन शायद किसी को वो सही नहीं लगा?
और पता चलता है
प्रिंट में किसी और का ही हुआ?
वापस ऑनलाइन जाकर देखो?
शायद वेबसाइट ही नहीं खुल रही?
या कुछ गड़बड़ है?
वहाँ ईमेल करो
कोई ज़वाब मिला?
नहीं?
तो मान के चलें की गड़बड़ घौटाला हुआ है?
ऐसे ही मान लो
आपने अपनी डिग्री पर काफी मेहनत की है
मगर सुपरवाइजर की कहीं ईगो आड़े आ गई?
साथ वाले जिन्हें कोई कुर्सी चाहिए
उसका बवाल बना
मामला ही कुछ और बना देते हैं?
जैसे तैसे आप उसे निपटा आगे चलते हैं।
मगर
सालों बाद?
10 -15 साल बाद?
या उससे भी ज्यादा सालों बाद पता चलता है?
आपका कोई डाटा बदल दिया गया था ?
और आपको समझ ही नहीं आया?
किसने और क्यों?
वो सब इशारों सा, संकेतों सा
उस थिसिस में ही रखा हुआ हो?
मगर
तब आपको वो सब समझ आना तो दूर
पता ही नहीं चला हो की हुआ क्या था?
और क्यों?
क्या हो अगर वही सब
आपके रिसर्च पेपर्स में भी आड़े आने लगे?
दुशमन शायद काफी हैं आपके?
गुप्त और छुपे रुप से?
वो ना आपके पेपर पब्लिश होने देंगे?
और
आपको कहीं और ही घुमा देंगे?
आप भी ऐसा कुछ होने के बाद
पेपर पब्लिशिंग के लिए भेजना ही छोड़ देते हैं?
चाहिएँ ही नहीं ऐसे पेपर और ऐसे जर्नल?
मगर ऐसे में वो बाहर हवा क्या देंगे?
ये तो ऐसी है?
ये तो वैसी है?
ज़िंदगी कहाँ जाते जाते,
ये कहाँ चलने लगी?
ऐसे में आपकी मेहनत
और आपकी रुचि का क्या होगा?
सबसे बड़ी बात
इसका असर सिर्फ आप पर ही नहीं होता
आपका आसपास भी भुगतता है ?
क्यों?
राजनितिक पार्टियाँ सच ना बताकर
गुप्त गुप्त और कोड कोढ़ खेलती हैं
बढे चढ़े या घुमा फ़िराकर,
अपनी अपनी तरह के
सामान्तर केस घड़ती हैं।
ये सामान्तर घढ़ाईयाँ ही Human Robotics हैं।
यही लोगों को कंट्रोल करने के तरीके हैं
और
यही Conflict of Interest Politics है।
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