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Thursday, July 16, 2026

सिस्टम और कोड 9

आप कहाँ है?

और आपका सिस्टम कहाँ?

कितना आसपास और कितना दूर?

उस सिस्टम को चलाने वाली पार्टियाँ 

उनके द्वारा चलाया जा रहा सिस्टम 

या कहो की कोड 

कितने आपके अपने सिस्टम से मिलते जुलते हैं?

और कितने नहीं?

पता करें?


अपने से ही शुरु करूँ?

मान लो,

आप 12-13 साल की यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़कर 

वापस अपने गाँव आकर रहने लगे 

जो एक छोटा सा ब्रेक भर था 

मगर, वो थोड़ा लम्बा हो गया 

या कहो की इस या उस पार्टी ने कर दिया 

या वहाँ के हालातों ने कर दिया 

आप वहाँ कुछ अपनों को ऐसे में अकेले नहीं छोड़ना चाहते 


इससे पहले आप वहाँ दशवीं तक रहे। 

एमएससी तक छुटियों में भी 

मगर, पीएचडी में ना के बराबर 

जैसा अक्सर लाइफ साइंस वालों के साथ होता है 

उन्हें 12 में से 13 महीने हॉस्टल चाहिए होता है 


नौकरी के बाद तो जैसे गाँव छूट ही गया था। 

नौकरी के बाद वापस आना खास परिस्थितियोँ में हुआ 

और ये भी तय हुआ 

की ये मेरी बड़ी लैब का एक छोटा सा हिस्सा है 

अब मेरी लैब किसी के कब्ज़े में नहीं   

तो सीधी-सी बात 

अपना लिखने-पढ़ने का उस हिसाब से एक स्पेस भी चाहिए 


Media Culture Lab का उदय 

नौकरी छोड़ने का बड़ा कारण भी रहा 

ये शुरु तो 2018 में ही हो गई थी 

VC Office की एक खास मिटिंग के बाद 

जिसके बाद दिल्ली में जजों की कोई खास कांफ्रेंस हुई 

और फिर तो रोज-रोज ऐसे से Code Decode होने लगे थे। 


तो आपको क्या लगता है, की मैं कहाँ हूँ?

Code Decode वाली Media Culture Lab में? 

उसका Head? Brain? Writer? Author? 

Science Communicator? या?


अभी तक 10th pass?  

12th Pass? 

BSc? MSc.? PhD?

या अभी तक Assistant Professor in Biotech?


या शायद निर्भर करता है?

जिससे बात हो रही है 

वो सिस्टम कहाँ है?

उसका खुद का सिस्टम किस स्तर का है?  

या उसे आपसे क्या चाहिए? 

आप सामने वाले से,

उसके सिस्टम के हिसाब से बात करोगे? 

या उससे ऊप्पर या नीचे फ़ेंकोगे?

तो कितनी बात बनेगी?  

यही हर किसी पर लागू होता है।  


आप खुद एक छोटा सा सिस्टम हैं 

और आपके सामने अनेकों सिस्टम, इकोसिस्टम 

 छोटे, बड़े, और बड़े, और बहुत बड़े  

पास, दूर, और दूर, और बहुत दूर  

उनसे जितना आपके अपने सिस्टम की बनेगी 

ख़ासकर, पास वाले सिस्टम्स से 

उतना ही आपका ये सिस्टम सही चलेगा 

वहाँ बीमारियाँ, दुख तकलीफें ना के बराबर होंगी 

और ज़िंदगी खुशहाली की तरफ़ बढ़ेगी 


मगर, 

जितना ज़्यादा इन सिस्टम्स से टकराव रहेगा 

उतना ही ज़्यादा 

बीमारियाँ, झगड़े और बदहाली रहेगी।   

तो पहली बात तो है 

ऐसे सिस्टम में रहना

या कम से कम अपने घर 

आसपास का ऐसा सिस्टम बनाना 

जहाँ टकराव कम से कम हो।  

कितना मुस्किल है?

ज़िंदगी भी उतनी ही मुस्किल या आसान है। 

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