Featured Post

Academic Journey?

Current Position June 2021-Continue,  Media Culture Lab (Independent Research and Writing) Experiential Learning, Research and Communication...

Sunday, July 19, 2026

सिस्टम और कोड 10

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 


भाषा 

बहुत बड़ा जरिया है 

ज़िंदगी बनाने और बिगाड़ने का 

ये जितना इन कुछ सालों में समझ आया 

ऐसा, पहले कभी नहीं 


भला ऐसा भी क्या? 

एक माँ बाप या भाई बहन 

अपने लायक 

बेटा बेटी या भाई बहन को बोलता है 

तुम तो बहुत नालायक हो 

तुम तो ये हो, वो हो 

तुमने ज़िंदगी में भला किया ही क्या?


और कौन बोलता है ये?

वो जो खुद नालायक़ है?

या शायद 

उनका ज़िंदगी को देखने और समझने का ज़रिया 

बहुत ही संकुचित और कुएँ के मेंढक-सा है?


क्यूँकि, 

वो किसी कुएँ के मेढंक से सर्कल में रहते हैं।  

ऐसे इंसान अक्सर खुद भी डूबते हैं 

और साथ वाले को भी ले डूबते हैं   

अगर 

आप उनकी उस समझ से थोड़ा परे नहीं रहे तो 


एक टाइप ये भी है 

अपने महानालायक बच्चों को भी 

या भाई बहन को भी ऐसे बोलते हैं 

जैसे वो तो पता नहीं कितने महान हैं 

चाहे वो खुनी ही क्यों ना हों ?

चाहे उन्होंने खुद को 

ऐसे किसी केस से बचने के लिए 

घर रिस्वत के यहाँ ही क्यों न ढो दिया हो?


और परिणाम?

नालायक भी उभरने  हैं 

और लायक भी डूबने? 

कितना सच है इसमें और ऐसा कैसे?  


आपकी जुबान एक कोड है 

आप जैसा बोलते हैं 

आपके आसपास का सिस्टम 

वैसे ही रिस्पांस करता है 

या बेहतर है की उनकी सुने 

जो कहते हैं 

"हम सिस्टम बनाते हैं, 

ऐसे सिस्टम, जो हमारे लिए काम करें" 

 

वो जब कहते हैं 

"आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठती है

जो भी बोलो, सोच समझ कर ही बोलो 

कहीं सच ना हो जाए 

वो उसी, उनके द्वारा बनाए गए 

सिस्टम के कोड की तरफ ईशारा होता है 


ऐसे ऐसे से कितने ही कोडों के इशारे 

अक्सर ऐसे ही छुपे बैठे होते हैं 

एक तो साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है 

और दूसरा?

गुप्त सिस्टम हर बात को, हर इशारे को 

अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग या दुरुपयोग करता है।  

जिस किसी में, जिस किसी पार्टी का भला होता है 

वो उन्हीं बातों या कामों को 

बढ़ाचढ़ा कर या घुमाफिरा कर पेश करते हैं।

चाहे वो सच हो या ना हो 

चाहे वो सच के एकदम विपरीत ही क्यों ना हो 

जिसके ढेरों उदाहरण एक निगाह दौड़ाने पर 

आपके अपने आसपास भरे पड़े मिलेंगे   


एक बोलता है 

मेरे बेटा बेटी का या भाई बहन का 

अपना घर होगा 

जहाँ उसका अपना राज पाट होगा 

और अक्सर ऐसा ही होता है। 

क्यूँकि,

वो ऐसे सिर्फ़ बोल नहीं रहे होते 

बल्की, 

हक़ीक़त को उस तरफ धकेल रहे होते हैं

खुद अपने बेटा या बेटी की सहायता कर रहे होते हैं 

जितनी और जहाँ तक कर सकें।  


दूसरा बोलता है 

अब तू पराई हुई 

तेरा घर, तेरे पति का घर ही है 

जो तेरा है, वो सब उनका है 

थोड़ी बहुत खटपट हुई 

और अपनी लड़की को कुछ वक़्त घर बिठा 

वापस भेझ देते हैं 

उसी जुबान और विचार के साथ 

सिर्फ और सिर्फ ठेकेदारी का काम। 


सहायता के नाम पर?

उनके पास ना अपना दिमाग और ना धेला 

अक्सर जो लड़की के पास होता है 

वो भी ऐसे ऐसे लोगों को दान करवा देते हैं 

या खुद ही कर देते हैं 

आखिर वो सब उसका ही तो है?  


उनके दिमाग में ये दूर दूर तक नहीं 

की उसका अपना घर होगा तो

रोज रोज के लड़ाई झगड़ों से मुक्ती भी 

थोड़ा दूर दूर रहने पर 

छोटी मोटी खामखाँ सी टकराहटें 

अपने आप ख़त्म हो जाती हैं 

वो रोज रोज की चिक चिक ख़त्म 

तो रिश्ते भी थोड़े बेहतर होने लगते हैं 

पास रहकर कड़वा रहने या लड़ने झगड़ने से 

दूर रहकर थोड़ा मीठा होना बेहतर। 


पर नहीं, 

आख़िर वो घर तुम्हारा ही है 

क्या हुआ अगर कहने भर को?

जैसे वो कहावत है ना 

"बहु सब तेरा है,

बस दबा-ढका मत छेड़िये"  

ऐसे घरों में अक्सर 

हर बात पे बक बक और 

हर बात पर कंट्रोल की कोशिश रहती हैं। 


और ऐसे माहौल में ज़िंदगियाँ?

दुनियाँदारी के दिखावे के लिए सब सही? 

मगर हकीकत?

घुट घुट, कुढ़ कुढ़ जीती ज़िंदगियाँ?


और इन कुछ सालों में ही समझ आया 

की ये सिर्फ़ ससुराल पे ही लागू नहीं होता 

ऐसे लोगों के यहाँ 

अगर उनकी अपनी लड़की भी घर बैठ जाए 

तो उसके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है 

घर तुम्हारा अपना है 

मगर?

ये अगर-मगर क्या होता है?


अपना तो अपना ही होता है 

वहाँ अगर मगर नहीं होता। 

ऐसे लोग, अपने बच्चों को कभी बड़ा नहीं होने देते। 

अक्सर उनका अपने बच्चों की ही ज़िंदगियों में 

सकारात्मक की बजाय, नकारात्मक असर होता है। 


कई जगह तो लगता है 

ऐसे लोग अपनी लड़कियों को 

ना इधर का छोड़ते और ना उधर का 

अकड़ में घर भी बिठा लेंगे 

और फिर ज़ीना भी हराम कर देंगे। 


ऐसे लोगों के यहाँ अक्सर 

ऐसी लड़कियों के फैसले भी यही ठेकेदार लेते हैं 

क्यूँकि, लड़कियों को तो समझ नहीं होती 

चाहे वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो जाएँ 

चाहे ऐसा कहने या समझने वालों को 

खुद धेला अकल ना हो 


क्यूँकि, 

ऐसे लोगों ने अक्सर खुद अपनी कमाई से 

अपने घर नहीं बनाए होते   

उन्होंने या तो पुरखों के घर में 

खुद ऐसी कीच कीच वाली ज़िंदगी गुजारी होती है 

या जैसे तैसे पुरखों की ही ज़मीन 

या घर के रोड़ों को ईधर उधर कर घर बनाए होते हैं 

जैसा देखा, सुना और समझा, वैसा ही किया 


इससे बाहर ना दुनिया देखी, ना सुनी और ना समझी 

देखते, सुनते या समझते, तो ऐसा होता ही नहीं 

ऐसे लोग खुद अपने बच्चों की भी नहीं सुनते 

वक़्त ही नहीं होता उनकी बकवास सुनने का 

तो वो बच्चे भी, ऐसे ऐसे अपनों से नफरत करने लगते हैं 

और उन्हें अक्सर ऐसे ऐसे अपनों को रोते सुना जा सकता है 

खुद कुछ किया नहीं, हमें करने नहीं देंगे 

खुद भड़ भड़ कर ज़िंदगी निकाल दी 

ये हमें क्या देंगे?


या तो खुद शंकर बनेंगे? 

या किसी शंकर के हवाले करने की कोशिश करेंगे? 

माँ बाप शंकर को मानने वाले हैं 

और बच्चे?

ऐसे ऐसे शंकरों को तिरस्कार की नजर से देखते हैं 

शंकर? 

जो या तो खुद लड़की मारते हैं? 

या ऐसे-ऐसे शंकरों के घर या अड़ोस पड़ोस वाले?    

अब कैसे कैसे तो लोगों ने भगवान पाल रखे हैं? 

कैसे शांती रहेगी ऐसे घरों में?

कैसे आगे बढ़ेंगे ऐसे घर या ऐसे घरों के बच्चे?    


और भी रौचक तथ्य,

ये सिर्फ़ लड़कियों पर लागू नहीं होता 

बहुत बार किसी भी वजह से कमजोर पड़े 

लड़कों पर भी लागू होता है। 

ऐसे कमजोर लोगों को so-called अपने भी खाते हैं 

और बाहर वाले भी। 


और ये सिर्फ युवाओं पर ही लागू नहीं होता 

अक्सर, बुजर्गों के और भी बुरे हाल होते हैं 

कहीं उन्हें अपने ही घर में "लोग क्या कहेंगे" 

के चक्कर में अकेले नहीं रहने दिया जाता 

चाहे वहाँ उनका मन लगे या ना लगे 

चाहे वहाँ वो,

ज्यादा टेंशन में ही क्यों न रहने लग जाएँ ?


और कहीं? 

बेटे (?) बड़े होकर यही नहीं पूछते 

की माँ-बाप पड़े कहाँ हैं और कैसे हैं?

चाहे वो 70-80 की उम्र के ही क्यों ना हों? 

चलना-फिरना तक मुश्किल होता हो?

ऐसे लोगों के पास ऐसा करने के हज़ारों बहाने होते हैं। 

वो ये तक भूल जाते हैं 

की अगर तुम्हे ना पाला पोषा गया होता 

तो आज ज़िंदा तक ना होते 

बचपन और बुढ़ापा एक जैसा सा है 

दोनों को सहारा चाहिए 

 

ठीक वैसे ही कुछ ऐसे भी होते हैं 

जैसे कितना भी लड़ाई झगड़ा होने के बावज़ूद 

कुछ के पास अपने माँ बाप की सेवा के लिए 

कम से कम इस उम्र में तो, हज़ार बहाने निकल आते हैं। 

 

सुना है, यहाँ भी कोई कोड काम करता है? 

सिस्टम इन लोगों को ऐसे धकेलता है 

और उस सिस्टम के कोड 

हर जगह अपने होने की गवाही दे रहे होते हैं 

कह रहे हों जैसे 

खेल सब सिस्टम बनाने वालों के किए धरे हैं 

बाकी सब तो किसी रोबॉट से 

उनके इशारों पर नाच रहे हैं 

वो भी बगैर उनकी जानकारी के 

अब उसे कोड कहें या कोढ़?


वो जैसे सरस्वती को आपकी जुबानों पर बिठा देते हैं 

ऐसे ही शंकर, हनुमान, माता, शेरा वाली, काली 

और भी पता नहीं क्या क्या 

और ठीक ऐसे ही स्वास्थ्य या बीमारियाँ भी  

डिग्री और नौकरी भी 

धन दौलत और गरीबी भी 

शादी या बर्बादी भी 

बच्चे या सिर्फ एक बच्चा भी 

या कहीं कहीं एक भी नहीं 

सहायक, सहायता या लाचारी भी  

और बाकी वो सब भी 

जो कुछ आप देख, सुन, समझ या महसूस कर सकते हैं। 


तो ऐसे सिस्टम को 

आपके अपने सिस्टम को 

या अपने आसपास के सिस्टम को 

आपको समझना नहीं चाहिए?

 खुद अपनी भलाई के लिए 

और अपने आसपास की भलाई के लिए?


पढ़ते रहिए 

जानने की कोशिश करते हैं आगे उस सिस्टम को 

की कैसे बनाते हैं उसे ये पढ़े लिखे और कढ़े लोग? 

No comments: