एक निग़ाह उस तरफ
स्वस्थ, हट्टा-कट्टा शरीर?
हँसता-खेलता आँगन?
आगे बढ़ते लोग?
पीछे रहते लोग?
तरक़्क़ी या पिछड़ापन?
अमीरी या गरीबी?
या कुछ भी जो आप पाना चाहते हैं
बस एक निग़ाह उस तरफ
जो आप पाना चाहते हैं
और एक निगाह उनकी तरफ
जिनके पास वो सब है
या जो वो सब पा चुके हैं
बस इतने से में ही
फर्क समझ आ जाएगा
और ये भी
की आप वो पा सकते हैं या नहीं?
कितने वक़्त में?
या कितना पा सकते हैं?
और कितना नहीं?
और क्यों?
हो सकता है
आपकी और उनकी सोच में फर्क हो?
जो वो करते हैं
वो आप नहीं करना चाहते?
आपके interest ही अलग हैं?
या वो आप नहीं कर सकते?
शायद सोच का फ़र्क?
या शायद कोशिश ही नहीं की कभी?
या ऐसे तो कभी सोचा ही नहीं?
ऐसे भी संभव है?
या शायद उनसे अलग तरीक़े अपनाकर भी?
हो सकता है वो उनसे भी बेहतर हो?
Universal Media Culture Lab
Universal तो है
और तरीक़े किसी भी काम को करने के?
या कोई भी परिणाम लाने के हज़ारों?
तो ये जानना तो जरुरी है
की सामने वाले ने क्या तरीका अपनाया है?
क्या वो आपके हिसाब-किताब से सही है?
या आप कोई और अपना सकते हैं?
कई बार हो सकता है
सामने वाले का तरीका बेहतर हो
मगर
आपके Media Culture के Ingredients
हो सकता है उस पर फिट ना बैठ रहे हों?
और उन Ingredients में ज्यादा हेरफेर,
आप कर नहीं सकते?
ऐसा करने पर शायद नुकसान ज्यादा हो?
और भी कितने ही कारण हो सकते हैं
खासकर,
बात जब इंसानो की ज़िंदगियों की हो?
या शायद,
बहुत ही थोड़े से हेरफेर से ही वो सँभव हो?
मगर,
आपको अभी तक वो तरीका पता ना हो?
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