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Media and education technology by profession. Writing is drug. Minute observer, believe in instinct, curious, science communicator, agnostic, lil-bit adventurous, lil-bit rebel, nature lover, sometimes feel like to read and travel. Love my people and my pets and love to be surrounded by them.

Friday, March 28, 2025

Media, Culture, Politics and Impact on Life

 कुछ तो गड़बड़ है, मगर क्या? से शुरु हुआ ये सफर जो बन गया suffer? भुगत?

इनके बालों के साथ दिक़्क़त है, मगर क्या?

जब पैदा हुई तो इस गुड़िया के बाल सीधे और सिल्की और उस गुड़िया के बाल घुँघराले थे? फिर 2-4 साल में ही ये क्या हो रहा है?

कुछ तो गड़बड़ है, मगर क्या? इस 16 का, उस 16 से और उस 16 का, उस 16 से क्या लेना-देना है? कहीं मौत है और कहीं शादी?

कुछ तो गड़बड़ है, मगर क्या? ये एलर्जी यहाँ और वो एलर्जी वहाँ, कहीं कुछ कह रहीं हैं जैसे? इनका किसी पिग्मेंट से कोई लेना-देना है? मगर कैसे? क्लिंटन और ओबामा जैसे? या कमला और ट्रम्प जैसे?

कुछ तो गड़बड़ है, मगर क्या? वन्दे मातरम और माता का कुछ तो लेना-देना है? जैसे चिंटियों और मकड़ियों का? मगर कैसे? झाड़ी पे माता धोकना जैसे?

कुछ तो गड़बड़ है, मगर क्या? इस सवाल ने न जाने क्या-क्या तो दिखा दिया। कहीं बिमारियों के जाले, तो कहीं मौतों के अँधेरे? कहीं कहानियाँ शादियों की, तो कहीं रिश्तों की दरारें और फिर कहीं उन रिश्तों के जैसे अजीबोगरीब से फैसले? कहीं पंचायती कहानियों में, तो कहीं कोर्टों के फैसलों में?      

ऐसे ही जैसे घर खीर, तो बाहर खीर? घर रोटी, तो बाहर रोटी? घर सुरक्षा, तो बाहर सुरक्षा? शायद हाँ? शायद ना? क्यूँकि, जहाँ सुरक्षा होती है, वहाँ सबके लिए होती है। और जहाँ नहीं होती, वहाँ कम से कम, आम आदमी के लिए तो नहीं होती? ऐसा ही ज़िंदगी के हर पहलू के साथ है। और इन सबका सीधा-सा सम्बन्ध, जहाँ कहीं आप रह रहे हैं, वहाँ के Media Cultue से है।  किन्हीं भी परिस्तिथियों में, ज़िंदगी या किसी भी समाज को सही दिशा देने के लिए, इस टॉक्सिक या बिमार मीडिया कल्चर को बदलना बहुत जरुरी है। या तो उसे बदलो या अगर आप उसे बदलने में सक्षम नहीं हैं, तो कहीं ऐसी जगह जाकर रहो, जहाँ वो आपके लिए सही हो। 

क्या है ये Media Culture? बायोलॉजी का Media Culture ही ज़िंदगी का या किसी भी सिस्टम या इकोसिस्टम का मीडिया कल्चर है। जैसे पक्षियों को उड़ते देख जहाज बने होंगे, वैसे ही Cell Culture और Media Culture के नियम, कायदे किसी भी समाज के सिस्टम या इकोसिस्टम के लिए अहम हैं।             

ABCDs of Views and Counterviews? 65

 Make America great again?

Or fix it?

Or maybe, "Make America Go Away" 

To Delhi?
Or Mumbai?


फेंकम-फेंक? 

ABCDs of Views and Counterviews? 64

क्या चल रहा है?

थोड़ा सिर दर्द? थोड़ा? खास तारीखों, महीनों और सालों को कुछ खास होता है? या कहो की किया जाता है? और आपको लगता है की कहानी खत्म? नहीं? या फिर से कहीं, किसी को उठाएँगे? या शायद बच गए? बिमारियों और मौतों की कहानियाँ, कहीं और। क्यूँकि, वो सच में किसी पागलपन के दौरे की तरह हैं। खासकर, जब आप उस वक़्त को झेल रहे होते हैं और यहाँ-वहाँ जाने क्या कुछ पढ़, सुन, देख या समझ रहे होते हैं।   काफी वक़्त बाद, शायद सालों बाद? राजनीती और मीडिया को कई दिनों तक, थोड़ा कम देखा और सुना? खैर।

Eurovision Music? क्या चल रहा है वहाँ? पता नहीं। मैं तो इस AI के जालों और चालों को समझने की कोशिश में हूँ, शायद? Moon walk? Or Shuffle Dance?                 

या Shuffle-Reshuffle?   

ऐसे?


ऐसे ?


ऐसे?


ऐसे?


नहीं?

खामखाँ। कुछ भी। है ना?   

Sunday, March 16, 2025

ABCDs of Views and Counterviews? 62

व्यवहारिक दाता मंदिर: आपकी समस्याओं का समाधान केंद्र और संस्थान 

खाना-पानी समाधान विभाग 

स्वास्थ्य लाभ विभाग

आवास विभाग 

रोजगार विभाग 

साफ़-सफाई विभाग 

बस इतनी-सी समस्याएँ हैं, दुनियाँ में? और हमारे पास इनके समाधान नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है? सर्च करो, किसी भी तरह के समाधान की प्रोजेक्ट की फंडिंग के लिए, और ढेरों समाधान मिलेंगे। मतलब, विकल्प तो हैं। अब इतने सारे विक्लप हैं, तो समाधान भी होंगे? इसका मतलब, हमने और हमारे नेताओं ने सारा ध्यान समस्या पर केंद्रित किया हुआ है? समाधान पर नहीं? समाधान पर ध्यान केंद्रित करो और समाधान मिलता जाएगा। समस्या पर ध्यान दो और समस्या बढ़ती जाएगी? बस, इतनी-सी बात?  

व्यवहारिक दाता मंदिर, क्या नाम है ना? आपका डाटा ही आपका दाता है। इसी दाता पर दुनियाँ भर में सबसे ज्यादा खर्च हो रहा है। क्यों? क्यूँकि, यही दाता राजनीतिक गुप्ताओं के काम आता है, आपको कंट्रोल करने के लिए। मानव रोबॉट बनाने के लिए। 

और ये कोई आज के युग की बात नहीं है। आज और कल में, बस इतना-सा फर्क आ गया है, की आज ज्यादातर लोगों को पता चल रहा है, की दुनियाँ कैसे चल रही है। इंटरनेट और कनेक्टिविटी का उसमें अहम स्थान है। आस्था कभी से अचूक माध्यम रहा है, इंसान को अपने वश में करने का। जितना किसी को भी आपके दाता के बारे में पता है, उतना ही आप पर कंट्रोल बढ़ता जाता है। तो क्या हिन्दू, इस तरह के कंट्रोल में ज्यादा माहिर हैं? या ज्यादा तिकड़मबाज? ज्यादा जुगाड़ू? क्यूँकि, हिन्दुओं के उतने ही भगवान होते हैं, जितनी जनसंख्याँ? मतलब, कंट्रोल व्यक्तिगत स्तर पर करने की कोशिशें? ना की जनसंख्याँ के स्तर पर? मतलब, जितनी तरह के इंसान, उतनी ही तरह के भगवान? मतलब, उतना ही गोटियों की तरह ईधर-उधर करना आसान? जैसे shuffle, reshuffle.   

या शायद भगवान तो एक ही है, ये प्रकृति? बाकी भगवानों को इंसानों ने घड़ दिया है? जरुरत और सुविधानुसार?  बताओ समस्या क्या है? और उसी अनुरुप, भगवान आपके सामने प्रस्तुत होंगे? भगवान आपके सामने प्रस्तुत होंगे? सच में? होते तो हैं? कैसे?

जैसे, Prayers go up, and, blessing come down? आपका दिमाग ही वो ब्रम्हांड है, जिसमें जो कुछ आता है, या प्रोग्रामिंग होती है या की जाती है, उसी अनुसार काम होते जाते हैं? अगर ऐसा हो, तो आसपास और संगत के असर को क्यों रोते रहते हैं लोग? क्यूँकि, दिमाग में बहुत कुछ आसपास से ही जाता है। जैसे जैसा हवा, पानी, खाना, और वैसा ही स्वास्थ्य। तभी तो कहते हैं शायद, की खाना औषधि की तरह लो और स्वस्थ वातावरण में रहो, तो डॉक्टर के पास जाने की या दवाई लेने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।                                 

व्यवहारिक दाता मंदिर, दुनियाँ का सबसे बड़ा मंदिर? जिसमें व्यक्तिगत स्तर पर समाधान संभव है?

ABCDs of Views and Counterviews? 61

कितना बड़ा काम है नौकरी ईजाद करना?

कौन कर सकता है? सिर्फ सरकार? या हर कोई? शायद हर कोई? हाँ। उसका स्तर अलग-अलग हो सकता है। जैसे, कोई भी अस्थाई-सी नौकरी तो किसी न किसी को दे ही सकता है। अगर हम गाँव से ही शुरु करें, तो घर या खेत के काम के लिए, सहायक या मजदूर तो चाहिए ही होते हैं। किसी को हमेशा, तो किसी को कभी-कभी। वो किसी न किसी को नौकरी देना ही है। मगर अस्थाई।  ऐसी नौकरी देनी के लिए, आपको कोई अलग से संसाधन नहीं लगाने पड़ते। या कोई खास अलग तरह की जानकारी नहीं चाहिए होती। आपको क्या और कैसे करवाना है, आपको पता होता है। मगर, ऐसे अस्थाई काम करने वाले की नौकरी सुरक्षित नहीं होती। और उसी हिसाब से पैसे और बाकी सुविधाएँ भी। 

सुरक्षित और बाकी सुविधाओं वाली नौकरियों पे बाद में आएँगे। आज कुछ ऐसी-सी ही अस्थाई सी नौकरी ईजाद करें? 

साफ़-सफाई 

अगर मैं अपने ही गाँव से शुरु करूँ, तो मेरे यहाँ साफ़-सफाई की बहुत समस्या है। जो शायद ज्यादातर गाँवों की होती है, खासकर हमारे जैसे देशों में। कोई हर रोज साफ़-सफाई के लिए आना तो दूर, ईधर-उधर पड़ा कूड़ा ही उठाने वाला कोई नहीं होता। खासकर, जो घर खाली पड़े होते हैं, उनके सामने। अब इतने सारे आसपास मकान खाली पड़े हों, तो मुश्किल और ज्यादा होती है। और यहाँ-वहाँ खाली पड़े प्लॉट, अलग से समस्या बनते हैं। क्या समाधान है? शायद बहुत बड़ी बात नहीं है, सफाई के लिए किसी को लगा लो? मगर बहुत बार सफाई करने वाले किसी भी कारण से, अगर लम्बे समय तक ना आ पाएँ तो? गाँवों में सरपँच और मेम्बर, शायद इसी लिए बनाए जाते हैं, की गाँव की गाँव में ऐसी छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान कर सकें? हमारे यहाँ सरपँच ठीक-ठाक है शायद। और कूड़ा इकठ्ठा करने के लिए गाडी भी लगाई हुई है। मगर वो बड़ी गाडी है, छोटी गलियों में नहीं आ सकती। कोई बड़ी बात नहीं, दो कदम बड़ी गली की साइड जाकर कूड़ा डाल आओ। यहाँ तक तो सही है। मगर, क्या कोई सफाई कर्मी भी, हर रोज बाहर सफाई के लिए नहीं लगाए जा सकते? जिससे जिन घरों में कोई नहीं रहता, वहाँ भी कूड़े के ढेर ना लगें? शायद तो लगाए जा सकते हैं? ये तो कोई बड़ी बात नहीं? हो सकता है, किन्हीं गाँवों के केसों में सरपँच कहे की उनके पास पैसे नहीं हैं, ये सब करवाने के लिए। क्यूँकि, सरकार दूसरी पार्टी वाले सरपंचों को पैसा नहीं देती।         

क्या सच में ऐसा है, की सरपंचों को इतने छोटे-छोटे से काम करवाने तक के लिए पैसा नहीं मिलता? चलो कितना पैसा कहाँ से मिलता है या कहाँ से लिया जा सकता है, इस पर कोई और पोस्ट। ऐसे-ऐसे कामों के लिए पैसा, जिनके यहाँ ये कर्मचारी सफाई के लिए जाएँगे, उन्हीं से लिया जा सकता है। क्यूँकि, शहरों की कई कॉलोनियों में ऐसा होता है। जैसे रोहतक सैक्टर-14 में एक छोटा-सा रिक्से वाला आता था, कूड़ा घर-घर से लेने। और उसे उस वक़्त, सिर्फ 25 या 50 रुपये हर एक घर से मिलते थे। ये 2009 और 2010 की बात है। ऐसे ही कई कॉलोनियों में मैंने देखा था, साफ़-सफाई वाले आते थे और महीने में घर-घर से नाम मात्र पैसे लेते थे। कितना मुश्किल है, गाँवों में ये सब करना? ऐसे कुछ लोगों को तो काम बिना पैसे सरकार से लिए भी दिया जा सकता है। सिर्फ नियत का सवाल है?

ऐसी ही और भी कितनी सारी छोटी-मोटी नौकरियाँ, गाँवों में ही ईजाद की जा सकती हैं, शहरों की तरह। कई बार तो आसपास काम करने वाले ही नहीं मिलते। तो ऐसे लोगों के नंबर, किसी एक जगह से मिल जाएँ, शायद ऐसा कोई हेल्पलाइन नंबर होना चाहिए। जहाँ से जरुरत पड़ने पर, छोटी-मोटी जानकारी या ऐसी सहायता कोई भी ले सकें। हो सकता है, ऐसा कोई सहायता नंबर हो और मेरे जैसों की जानकारी में ना हो। तो ऐसे नंबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए, उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिए।                      

Friday, March 14, 2025

ABCDs of Views and Counterviews? 60

यूनिवर्सिटी के स्तर पर, सीधा प्रॉजेक्ट या कंपनियों के सहयोग से Collaborative Research या सिर्फ उस कोर्स की अनुमति हो, जिसमें यूनिवर्सिटी के स्तर पर नौकरी के लिए ट्रैनिंग शुरु हो और यूनिवर्सिटी से निकलते ही नौकरी।  कुछ-कुछ ऐसे, जैसे बस या किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के व्हीकल में, सिर्फ उतने ही आदमी चढ़ पाएँ, जितनी सीट हों। उसके बाद वो व्हीकल, किसी स्टॉप पे नहीं रुकेगा। या उसका दरवाज़ा ही नहीं खुलेगा। जैसे, ज्यादातर विकसित जगहों पर होता है। सीट ना होने के बावजूद, किसी भी व्हीकल पर जितनी ज्यादा भीड़, मतलब उतना ही ज्यादा अविकसित होने की निशानी? डिग्री देने की काबिलियत होने के बावजूद, उन डिग्री धारकों को नौकरी देने की काबिलियत नहीं होना, मतलब? अच्छे संस्थानों से सीखें, की वहाँ क्या अलग है? जो सिर्फ डिग्री बाँटने वाले संस्थानो में है या नहीं है?

इस सबको सही करने के लिए क्या कदम हो सकते हैं? कुछ शायद मैं सुझा पाऊँ? क्यूँकि, मैं खुद नौकरी लेने की दौड़ में नहीं, शायद देने वालों की कैटेगरी में आने की कोशिश में हूँ।   

नौकरियोँ का भी इन घरों जैसा-सा ही है। कितनी ही पोस्ट तकरीबन हर डिपार्टमेंट में खाली पड़ी रहेंगी, सालों साल, दशकों दशक। मगर?

मगर, उनकी पोस्ट कभी निकलेंगी ही नहीं। कहीं ज्यादा ही सिर फूटने लग जाएगा, तो एडहॉक या कॉन्ट्रैक्ट जैसी शोषण वाली पोस्ट घड़ दी जाएँगी। उससे बेहतर शायद यही मानव संसाधन कहीं और अच्छा कर सकते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ ऐसा करके कई तरह के फायदे ऐंठती हैं। मगर वो फायदे, कहीं न कहीं उसी जनता को इन पार्टियों के खिलाफ भी कर जाते हैं। कोरोना के दौरान और उसके बाद उपजे, आसपास के माहौल ने इसे ज्यादा अच्छे से समझाया। 

डिपार्टमेंट और आसपास, कई बार कुछ ऐसी बातें या किस्से घटित हुए की जिनको समझकर लगे, की जो लोग इतनी शिद्दत से काम करते हैं और इतना वक़्त से उस यूनिवर्सिटी या इंस्टिट्यूट से जुड़े हैं और वहाँ पोस्ट भी खाली हैं, फिर ऐसा क्या है, जो ये सरकारें उन्हें भरती नहीं? कैसी राजनीती है ये?

घर आने के बाद अपना घर ना होने की वज़ह से या ससुराल से परेशान कुछ किस्से-कहानी सुनकर फिर से ऐसे ही? ऐसा क्या है, जो ये लोग अपना खुद का अलग से घर नहीं लेते या बनाते? किन्हीं पे आश्रित ही क्यों रहते हैं? या ऐसी उम्मीद ही क्यों, ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे लोगों से? कुछ केसों में, दूसरे पर निर्भरता एक कारण हो सकता है। मगर, कुछ तो ऐसे उदाहरण की सारा ससुराल वालों को पूज देते हैं और खुद ठन-ठन गोपाल जैसे। या अजीबोगरीब सँस्कार या संस्कृति? ये क्या करेंगे, अलग से अपने मकान का? क्या अजीब प्राणी हैं? नहीं? हर जीव अपनी संतानों को इतना-सा तो सीखा ही देते हैं, की वो आत्मनिर्भर हो सकें। खुद का खाना और रहने लायक घर बना सकें। 

इंसान के पास तो दिमाग थोड़ा उससे आगे सोचने-समझने के लिए, पढ़ने-लिखने या कुछ करने के लिए भी है। मगर हमारे समाज का ताना-बाना कुछ ऐसा है, की समाज का कितना बड़ा हिस्सा ऐसी-ऐसी, आम-सी जरुरतों के लिए ही संघर्ष करता नज़र आता है? शायद, अच्छी शिक्षा ही उसका एकमात्र ईलाज है। 

पेपर टाइगर?

चलो, पेपर टाइगर को पढ़ने का भी आपके पास वक़्त तो है? और सुझाव भी? धन्यवाद, इतने अच्छे टाइटल के लिए। ये तो फिर भी थोड़ा बहुत मिलता होगा। कहीं तो कुछ ज्यादा ही फेंक दिया था, Writing Machine. वैसे धन्यवाद उनका भी। 

बड़े-बड़े लोगों को पढ़कर थोड़ा बहुत तो फेंकना आ ही जाता है शायद :)  

ABCDs of Views and Counterviews? 59

 Interesting Saga, of not so interesting stories?

Real?

Unreal?

State?

Estate?

or Fraud?


कहानियाँ? 

इधर-उधर की?

 जाने किधर-किधर की? 

कुछ दूर के?

या शायद कुछ पास के?

रिस्ते जैसे?

या? 

कहानियाँ किन्हीं के घरों के, 

ना मिलने की?

यूँ सालों-साल?

या दशकों शायद?

कैसे गुँथती हैं, ये राजनीतिक पार्टियाँ? 

ऐसे-ऐसे से किस्से-कहानीयाँ?

और ऐसी, ऐसी-सी?

या कैसी कैसी-सी?

यूँ, ज़िंदगियों की बर्बादियां?

World of Illigal Human Experimentation?

Or much more than that?   

हमारी राजनीती एक ऐसा Ecosystem कैसे develop करती है, की जिसमें MLA, MP वगैरह को, ऐसे-ऐसे प्लॉट या ज़मीनें या बने-बनाए घर और फ्लैट तक मुफ़्त में या गिफ़्ट में मिलते हैं?

सच है क्या ये?

और आम आदमी? वो बेचारा पता नहीं, ज़िंदगी भर कहाँ उलझा रहता है?

आपको मालूम है क्या, कुछ ऐसे नेताओं या राजनीती वालों के नाम जिनको ऐसे-ऐसे गिफ़्ट मिले हुए हैं? काफी सालों पहले रोहतक के ही कई ऐसे नेताओं के नाम सामने आए थे। कभी कुछ होता देखा है, उन लोगों के खिलाफ कुछ? और आम लोग अपनी ज़िंदगी भर की पूँजी दाँव पर लगा देता है? बदले में मिलता क्या है?

ये? 


या शायद पिछे कोई बुलडोज़र बाबा का विडियो देख रही थी, जिसमें था "कोई सामने ही नहीं आया माँगने, हमने तो बोला था की जिनका गया है, उन्हें वापस देंगे"? ऐसा ही कुछ?

पता नहीं इन नेताओं या बाबाओं को कितना पता है की कितने ही बने-बनाए घर, छोटे-बड़े, बँगले और बहुमंजिला इमारतें तक सालों खाली पड़ी रहती हैं। सिर्फ कोढों के हेरफेर में? जिनपे थोड़े-से पैसे लगाकर, कितने ही बेघर लोगों को दिया जा सकता है। मगर, शायद ऐसा करने से राजनीती के कोढों का खेल तो नहीं बिगड़ जाएगा? या किसी तरह के अहम या अहँकार की मूछें उतर जाएँगी? शायद?  

Thursday, March 13, 2025

ABCDs of Views and Counterviews? 58

चलो थोड़ा नौकरी और निक्कमों को थोड़ा बहुत लायक बनाने से पहले, अपने नेताओं पर थोड़ा हँस लें? थोड़ा ज्यादा फेंक दिया? कोई ना, जहाँ-जहाँ ऐसा लगे, वहाँ-वहाँ लपेटते रहा करो। कई सारे इधर-उधर के सोशल प्रोफाइल्स हैं, जिन्हें अक्सर मैं पढ़ लेती हूँ। कोई इस पार्टी से सम्बंधित, तो कोई उस पार्टी से सम्बंधित। कुछ ऐसे लोग जिनसे मैं कभी नहीं मिली, मगर, वहाँ पे कई बार जानकारी बड़ी ही रौचक होती है। 

कभी-कभी, कुछ-कुछ ऐसी भी शायद, जैसे बच्चे आपस में बात कर रहे हों 

"Korean Khalse Mere

Korean Queen"

जैसे ये विडियो 


और ऐसे ही कितने ही विडियो आपको ऑनलाइन मिल जाएँगे। 

या फिर, ये Presentation जैसे?


दुनियाँ भर की राजनीती ऐसे ही चल रही है?
और सब राजनितिक ऐसी-सी ही नौटंकियोँ का हिस्सा हैं?

ये कैसी दुनियाँ में हैं हम? सोचो, अगर अच्छे-खासे जर्नल्स में पब्लिश रिसर्च पेपर्स को भी ऐसे ही दिखाना हो तो? मैंने कई देखे थे, कोरोना के वक़्त शायद? वो भी अच्छे-खासे जर्नल्स के। राजनीती में विज्ञान है। इसीलिए, उसका नाम शायद राजनीतिक विज्ञान है। और विज्ञान में राजनीती? मगर, उसके साथ राजनीती तो नहीं लगा हुआ। नहीं तो ऐसे होना चाहिए था 
Biology Politics 
Chemistry Politics 
Physics Politics
Psychology Politics 
Defence Politics 
Civil Engineering Politics वैगरैह?

सौरभ भारद्वाज का विडियो, शायद, ऐसा-सा ही कुछ है?
ऐसा-सा ही एक विडियो, UK Parliament का भी कहीं देखा था शायद? या कहना चाहिए, की कितना कुछ ऐसा हम रोज देखते या सुनते हैं? इसमें भी भला क्या खास है?  

ABCDs of Views and Counterviews? 57

 ये पोस्ट खास हमारे बेरोजगार नेता या नेताओं के लिए 

क्या आप वो नेता हैं, जो कहते हैं की नौकरियाँ नहीं हैं?

क्या वो आप हैं जो युवाओं को ही नहीं, बल्की, आमजन को ऐसे गुमराह करते हैं, की इसकी नौकरी जाएगी, तो उसे या उन्हें मिलेगी? क्या आपके पास, ऐसी हेराफेरियों और लोगों को आपस में ही भड़काने के सिवाय, कोई और समाधान नहीं है? 

क्या आप वो नेता हैं, जिन्हें लगता है, की नई टेक्नोलॉजी या एप्लायंसेज का प्रयोग करने से नौकरियाँ कम हो जाएँगी? आपको क्यों नहीं लगता, या क्यों नहीं सोच पाते, की इससे ना सिर्फ लोगों की ज़िंदगियाँ आसान होंगी, बल्की, ज्यादा लोगों को नौकरियाँ मिलेंगी? वैसे, ये ज्यादा या कम क्या है? सबको क्यों नहीं? इसका मतलब, हमारी शिक्षा व्यवस्था में कमी है, जिसे सुधारने की जरुरत है?

कॉलेज से ही हर विद्यार्थी के लिए Learn and Earn जैसे प्रोग्राम शुरु होने चाहिएँ। और स्कूल के स्तर पर बच्चों को इतना-सा तो आना चाहिए, की वो अपनी ज़िंदगी इंडिपेंडेंट जीना सीख पाएँ। जरुरत पड़ने पर, कम से कम अपने लायक तो कमाने लायक हो पाएँ। कमाने लायक ना सही, कम से कम अपने काम तो कर पाएँ। ज्यादातर लड़कियाँ तो हमारे यहाँ सीख जाती हैं, मगर लड़के? लड़के होने के फलस्वरूप, हमारा समाज उन्हें जैसे अपाहिज बना देता है? या शायद, लड़का होने की जैसे सजा देता है या इनाम? ये काम लड़कियों के हैं, और ये काम लड़कों के हैं सीखाकर। स्कूल इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं, की अगर आपको भी लड़कियों की तरह भूख लगती है, और खाना खाते हैं, तो खाना बनाना सीखना जरुरी है। उसे किसी तरह के अहम से ना जोड़ें। अगर लड़कियों की तरह, आपको भी कपड़े पहनने की जरुरत होती है, या साफ़-सफाई अच्छी लगती है, तो कपड़े धोने, बर्तन साफ़ करने या आम साफ़-सफाई करनी आनी चाहिए। या ऐसे अप्लायंस को प्रयोग करना। फिर चाहे इन सब कामों के लिए, आपके यहाँ माँ, बहन, बीवी, बुआ, बेटी, भतीजी, या ये सब काम करने वाली आया, जैसी सुविधाएँ ही उपलब्ध क्यों ना हों। जरुरत पड़ने पर, ये सब कर पाना और बिना जरुरत पड़े, अपने घर के ऐसे कामों में सहायता करना, आपका गुण है, अवगुण नहीं। ऐसे-ऐसे कामों को करने वालों को, औरत या औरतों के गुलाम बताने वालों से, जितनी जल्दी दूरी बना लें, आपकी अपनी और आसपास की ज़िंदगी उतनी ही बेहतर होगी। ये सब करना विकसित होने की निशानी है, ना की गुलामी की, विकसित समाजों में। शायद गुलाम या अविकसित समाजों में नहीं?              

यूनिवर्सिटी के स्तर पर, सीधा प्रॉजेक्ट या कंपनियों के सहयोग से Collaborative Research या सिर्फ उस कोर्स की अनुमति हो, जिसमें यूनिवर्सिटी के स्तर पर नौकरी के लिए ट्रैनिंग शुरु हो और यूनिवर्सिटी से निकलते ही नौकरी।  कुछ-कुछ ऐसे, जैसे बस या किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के व्हीकल में, सिर्फ उतने ही आदमी चढ़ पाएँ, जितनी सीट हों। उसके बाद वो व्हीकल, किसी स्टॉप पे नहीं रुकेगा। या उसका दरवाज़ा ही नहीं खुलेगा। जैसे, ज्यादातर विकसित जगहों पर होता है। सीट ना होने के बावजूद, किसी भी व्हीकल पर जितनी ज्यादा भीड़, मतलब उतना ही ज्यादा अविकसित होने की निशानी? डिग्री देने की काबिलियत होने के बावजूद, उन डिग्री धारकों को नौकरी देने की काबिलियत नहीं होना, मतलब? अच्छे संस्थानों से सीखें, की वहाँ क्या अलग है? जो सिर्फ डिग्री बाँटने वाले संस्थानो में है या नहीं है?

इस सबको सही करने के लिए क्या कदम हो सकते हैं? कुछ शायद मैं सुझा पाऊँ? क्यूँकि, मैं खुद नौकरी लेने की दौड़ में नहीं, शायद देने वालों की कैटेगरी में आने की कोशिश में हूँ।    

ABCDs of Views and Counterviews? 55

दुनियाँ उतनी छोटी या दकियानुशी या दिमागी गरीब नहीं है, जितना आपका दिमाग जानता है। ये खासकर उनके लिए, जो नाली, गली, लेबर बंद करने, पानी बंद करने या खाने या पानी में अपद्रव्य या जहर डालने या हवा को जानबूझकर प्रदूषित करने, लोगों को उनके रहने या काम करने के स्थानों खदेड़ने या ऐसे ही और लोगों की ज़िंदगियों में रोड़े अटकाने या लोगों को जानबूझकर मारने का काम करते हैं या करवाते हैं। दुनियाँ, इस सोच से कहीं ज्यादा बड़ी है। दुनियाँ का बहुत छोटा हिस्सा है, जो ये सब करवाता है। और उससे थोड़ा बड़ा, जो ये सब करता है।  

मगर उससे कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा, अपनी और अपने आसपास की ज़िंदगियों को सँवारने में व्यस्त है। इन लोगों के पास इतना वक़्त ही नहीं है की ये अपना कीमती वक़्त किसी का बुरा सोचने में भी लगाएँ। फिर करने वाले तो यूँ लगता है, ज़िंदगी का कितना बड़ा हिस्सा, इसी में लगा देते हैं?

फिर दुनियाँ का एक हिस्सा वो भी है, जो अपने और अपने आसपास से थोड़ा दूर भी भला करने में लगा है। उसमें सिर्फ कुछ लोग जो अलग-थलग रहकर काम करते हैं, वही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्की, काफी सारी संस्थाएँ भी ऐसा करती हैं। कहीं के भी शिक्षा के संस्थान, उसमें अहम भुमिका निभाते हैं। मगर बहुत बार, उन संस्थानों में कुछ राजनितिक ताकतें, शायद ज्यादा प्रभावी हो जाती हैं। और ऐसे वक़्त में, उन ताकतों पर निर्भर करता है की वो वहाँ के समाज को कहाँ लेकर जाएँगी? 

या शायद, कहीं का भी समाज आज उतना स्थानीय (Local) नहीं है, जितना कभी होता था। और दुनियाँ भर की राजनीती, दुनियाँ के हर कोने को किसी न किसी रुप में प्रभावित करती है। और ऐसा ही कोई समाज का हिस्सा, कहीं न कहीं, किसी भी अति या दुष्प्रभाव वाली ताकत या ताकतों को रोकने का काम भी करता है? कोरोना काल में शायद ऐसा ही कुछ देखने को मिला? आप कहीं भी कुछ कर रहे हैं, तो मान के चलो की आपको देखने, सुनने और फिर उस पर अपने सुझाव या प्रतिकिर्या देने वाले दुनियाँ के हर कोने में हैं। और उस सुझाव या प्रतिकिर्या का असर ना सिर्फ उनके अपने समाज में होता है, बल्की किसी न किसी रुप में दुनियाँ भर में होता है। शायद ऐसे ही बहुत से लोगों ने कोरोना के दौरान, कितने ही लोगों को मरने से बचाने में सहायता की। और उसके बाद, कितने ही लोगों ने ये दिखाने या समझाने में, की दुनियाँ भर का सिस्टम काम कैसे कर रहा है? मैं इसी सब को समझने या लोगों को समझाने में व्यस्त हूँ। शायद, इसलिए मुझे अपने विषय से दूर जाने की जरुरत नहीं पड़ी। बल्की, वो तो इस सब में अहम कड़ी बनकर उभरा है। 

दुनियाँ में कहीं भी, किसी वक़्त क्या चल रहा है, वो दुनियाँ के किसी दूसरे कोने में बैठे लोगों को भी प्रभावित कर रहा है क्या? शायद हाँ, शायद ना? जानने की कोशिश करें, ऐसे ही, कहीं के भी Random से, कुछ लेखों से?