Design?
और?
Time Travel?
सोचो क्या है ये?

Rhythms of Life is an evolving Media Culture. It evolved from molecular and synthetic media ingredients. Investigating the parallels between molecular, biological processes and macro social systems. Evolving focus areas are Designing and Engineering of Society and Human Robotics, Social Tales of Social Engineering.
Current Position Media Culture Lab ( June 2021 - Continue) Independent Research, Writing, Communication, and Experiential and Experi...
जब Don की गाड़ी
हाईवे पर दौड़ रही थी
तो दिमाग़?
आसमाँ में
जाने कैसे कैसे युद्ध लड़ता हुआ?
वो फाइल्स
वो हादसे
वो झूठ
वो केसों पर केस
समझ से बाहर जैसे
एक के बाद एक।
समझ से बाहर था सबकुछ
ये दोबारा बुलाकर
जॉइन करवाने का
आख़िर मतलब क्या था?
उस वक़्त मालूम नहीं था
कैसे कैसे कलाकार
दुनियाँ के किस किस
कोने में बैठकर
वो सब घड़ रहे थे?
ऐसे ही किसी कोने से शायद
कोई नाव उतरी थी स्क्रीन पर?
नहीं।
किन्हीं पुरानी डायरीयों से
निकले हुए पत्रों से चलकर
मीडिया पर चलती हुई जैसे?
और फिर कहाँ से कहाँ पहुँची वो?
अभी मुम्बई के किसी नेवी ऑफिस में
पन्ने खँगाल रही हो जैसे
किसी पापा के
उस वक़्त के
जिसके बारे में उसे बहुत कम पता है
बस, कहानियों सा सुना है
झूठी या सच्ची सी कहानियाँ?
Time Travel ऐसे भी होता है?
हाँ।
और भी बहुत तरह से होता है
कहो तो राम सिंह के दादा
और पड़ दादा के टाइम की
सैर पर भी चलें?
या इतने में ही गुजारा हो जाएगा?
Time Travel
या Time Machine
कितना अनोखा सा Concept है ना?
ऐसा कुछ अनुभव करना?
सिर्फ़ Immersive Media?
या इससे आगे भी बहुत कुछ?
Time Travel
आपको वहाँ ले जाता है
जिस दुनियाँ के बारे में
आपको कुछ ख़ास नहीं पता
जैसे मान लो
आज आप खुद 48 साल के हैं
और जब आप 5, 6 साल के होंगे
तब से ही नहीं मालूम
ये पापा क्या होता है?
आपको
दादा दादी का पता है
नाना नानी का पता है
माँ, भाई, चाचे, ताऊ
मामा मामी, फूफा बुआ
उनके बच्चे
और भी कितने ही रिस्तेदार
मगर
ये पापा क्या होता है?
शायद कहानियाँ
यहाँ वहाँ से सुनी हुई?
या ईधर उधर के
ताने बाने से पत्रों
या अजीबोग़रीब से
डॉक्युमेंट्स से उठाई हुई सी जैसे?
जो बचपन में सुनी पढ़ी
वो तो सच होती थी
या उनपर ऐसे
शक कहाँ होता था?
जैसे आज?
क्यों?
क्यूँकि
हम ख़तरनाक जहाँ में हैं।
जहाँ झूठ को सच
और सच को झूठ
बनाया जा सकता है।
घड़ा जा सकता है
ऐसे जैसे
कोई Time Travel जैसे?
और हम?
उस Time Travel में
कोई Time Machine जैसे?
ठीक ऐसे जैसे
Protein Simulations
हों Social Simulations?
और?
Genetic Engineering?
Social Engineering?
यहाँ आप
Protein घड़ लो
RNA, DNA घड लो
या?
घड़ लो
कितनी ही बीमारियाँ
या उन सबके ईलाज?
बस इंसान घड़े जाने बाकी हैं
बिना इंसानों के।
अरे कहीं और चले गए
विषय से थोड़ा परे?
नहीं वहीं हैं
गुजरे जमाने
जिनकी कहानियाँ
हम ना जाने?
तो कोशिश करें जानने की?
Drive को
Don बनाकर
MASTDON सा घुमा दें
बस, इति सी बात?
सुना है
Don Professor को भी बोलते हैं।
और ऐसी ऐसी घुमाईयाँ
उन्हीं की लैब्स में तराशी जाती हैं?
सिर्फ़ उन्हीं की?
नहीं,
जहाँ उनसे आगे भी है
जैसे?
Social Simulations
और
Protein Simulations में
कितना फ़र्क है?
क्या दोनों एक ही हैं?
जैसे किसी Highway पर लिखा हो
Drive Don't Fly
और
आप अकसर उस Highway पर
अपना Official Stress Disappear कर आते हों जैसे?
मान लो
आपने अपने ऑफिस के पास वाले Highway पर
अकेले ड्राइविंग का शौक पाल लिया हो
आप, आपकी छोटी सी कार
हाईवे और म्यूजिक
टोल तक जाओ
और वहाँ से U Turn कर आओ।
या थोड़ा बहुत और ड्राइव करना हो?
तो हाईवे के दूसरी साइड
अपने गाँव की तरफ़ ले लो
अगर वक़्त हो
जैसे छुट्टी वाले दिन।
आपका ऑफिस इन दोनों के बीच में हो कहीं।
कुछ दिन बाद
Drive, Don't Fly
Don Fly में बदल जाय?
कितने शब्दोँ का हेरफेर है?
कोई ख़ास नहीं?
मगर, मतलब ही कुछ और हो गया?
ऐसा सा ही कुछ
आपके साथ
आपके अपनों के साथ
आपके सामान के साथ
आपके घर, ऑफिस
या आसपास के Infrastructure के साथ हो रहा हो तो?
क्या का क्या बन सकता है?
और?
वो आपकी ज़िंदगी को कितना प्रभावित कर सकता है?
या बिलकुल ही बदल सकता है?
भले के लिए भी
और बुरे के लिए भी?
इसलिए सफाई बहुत जरुरी है
सिर्फ़ दिवाली से पहले ही नहीं
सारा साल
कुकुरमुत्ते से उगे यहाँ वहाँ
फालतू के शब्दों को
फ़ालतू के चिन्होँ को
फ़ालतू के इशारों को
फ़ालतू या टूटे फूटे
सामान को या तो ठीक करने के लिए।
या अगर दान करने लायक हो
तो किसी को देने के लिए
या कचरे की तरफ चलता करने के लिए।
उन्हें ना बच्चोँ की कोई फिक्र होती है और ना ही बुजर्गों की। फिर युवाओँ की तो होगी कहाँ?
Automated System?
Along with
Enforced?
Media Ingredients?
And Social Simulations?
ठीक ऐसे ही
कहीं का सिलेबस बदलता है
किताबें बदलती हैं
कोर्स बदलते हैं
ऐसे ही बच्चों के पेपर होते हैं
और ऐसे ही परिणाम आते हैं।
ऐसे ही शादी होती हैं
या रिश्तों में दरार
ऐसे ही बच्चे पैदा होते हैं
या नहीं होते
या होने से पहले ही
काम तमाम कर दिए जाते हैं।
ठीक ऐसे ही जुर्म होते हैं
कोर्ट में केस चलते हैं
और उनके फैसले भी ऐसे ही होते हैं।
और जरुरी नहीं,
समाज में आम लोगों को
ऐसा कुछ अंदाजा तक हो
की उनकी ज़िंदगियाँ
राजनितिक पार्टियॉं की
Social Simulation जैसी सी
कहानियाँ
या Experiment भर हैं।
ऐसे से ही कुछ और उदाहरण लेते हैं आगे की कैसे कैसे Template, Social Simulations के लिए तैयार होते हैं? और कैसे उनमें से कोई एक ख़ास घड़ाई के काम आता है? या यूँ कहें की अलग अलग पार्टियाँ, अपनी ही तरह की अलग अलग Templates पर एक साथ काम कर रही होती हैं।
हम एक ऐसे जहाँ में हैं
जहाँ हर इंसान कब्ज़े में है
कंट्रोल में है
जानते हैं किसके?
कहीं के भी सिस्टम के।
ये सिस्टम कौन बनाता है?
सैर पर चलें?
शायद आपको थोड़ा बहुत
समझ आए?
Nordic Countries की सैर कैसी रहेगी?
मान लो मैंने आज
किसी ऐसी सी यूनिवर्सिटी की सैर की।
शाम को स्कूल से आने के बाद भतीजी
बुआ,
मैं अमृतसर गोल्डन टैम्पल देखने जाउँगी।
अच्छा, किसके साथ?
हमारे स्कूल का ट्रिप जा रहा है।
4 - 5 दिन के लिए।
ना, नहीं जाना
बुआ ले जाएँगे तुझे, बड़े अमृतसर।
जा चुकी फिर तो
कब से उल्लू बना रहे हो।
बुआ ने
ऑनलाइन घुमाई की दिशा बदल दी।
अगले दिन
बुआ शायद हम अमृतसर नहीं जा रहे
जॉय गाँव जाएँगे।
फिर से जॉय गाँव?
वहाँ तो घुम चुके तुम
एक दो साल में क्या बदलता है?
आप जब रोहतक थे
तो हर बार तलियार पे ले जाते थे
वहाँ क्या बदलता था?
ओह! सच में
बच्चा बड़ा हो गया
मन ही मन सोचते हुए।
वो तो अपना शहर है
फिर बुआ वहीँ रहते थे
तो भतीजी बुआ के पास आएगी
तो वहाँ तो जा ही सकते हैं ना ?
दो दिन बाद
बुआ,
जॉय गाँव काफ़ी बदल चुका
अब वहाँ ये नया है
वो नया है
तो अब तो जॉय गाँव ही जाऊंगी
अमृतसर कैंसल।
बुआ ने ये कौन से जॉय गाँव के
किसी इंस्टिट्यूट या लैब की सैर की?
आसपास ही कहीं शायद?
ये भतीजी को नहीं मालूम।
ऐसे राजनितिक पार्टियाँ Social Simulations का ख़ाका तैयार करती हैं, वक़्त के साथ साथ। ये सब ना किसी स्कूल , कॉलेज या यूनिवर्सिटी जैसे Institute को पता होता और ना ही उन्हें, जिनपर ऐसी ऐसी और ना जाने कैसी कैसी घड़ाईयाँ, जहाँ कहीं घड़ी जा रही होती हैं। इनमें Deviations, Alterations, Manipulations, Hype और भी ना जाना क्या कुछ किया जा सकता है। निर्भर करता है, सामने वाली पार्टी को क्या चाहिए?
उन्हें ना बच्चोँ की कोई फिक्र होती है और ना ही बुजर्गों की। फिर युवाओँ की तो होगी कहाँ?
आगे ऐसे ऐसे और कैसे कैसे और उदाहरण लेंगे। आसपास से ही या दूर दराज़ से।
Built in Environments And Social Simulations : Today's World Realities
हर जीव
एक तरह के मीडिया में जन्म लेता है
माँ के मीडिया से निकलकर
(Amniotic Fluid)
इस दुनियाँ के
अलग अलग तरह के मीडिया में
पलता और बढ़ता है।
वो पलने बढ़ने वाला मीडिया
कितना सुरक्षित है?
कितना आगे बढ़ने के लिए
उपजाऊ तत्वों से भरा है?
या कितना असुरक्षित
और नुकसान दायक तत्वोँ से?
सुरक्षित और उपजाऊ मीडिया में
उसे बहुत कम मेहनत में भी
काफी कुछ मिलता है
और असुरक्षित
और नुकसानदायक मीडिया में?
या तो वक़्त से पहले ही
ख़त्म हो जाता है
या
बहुत ज्यादा मेहनत करने पर भी
बहुत कम पाता है।
हमारे समाज के
किसी भी हिस्से की कहानी
बस इतनी भर है।
फिर क्या दोषारोपण?
और क्या निर्दोष?
किसी इंसान पर?
जब सब कुछ किया धरा
किसी भी तरह के
मीडिया का हो?
और मीडिया
डिज़ाइन और इंजिनियर
किया जा रहा हो?
तो?
कृत्रिम रुप से तैयार किए गए
वातावरण में उगे जीवों पर
कैसा दोषारोपण?
और कैसी सज़ा?
ख़ासकर तब
जब उन्हें ऐसा कुछ पता तक ना हो।
जिन्होंने
वो मीडिया
डिज़ाइन और इंजिनियर
किया है
उनका क्या?
माना
आम आदमी को
ये कम पता है
या पता ही नहीं है
ख़ास लोगों को तो पता है?
Manufactured Consents
Manufactured Identities
Synthetic Media
And
Built in Environment Realities
कृत्रिम रुप से तैयार किए गए
वातावरण की सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ
कहो कितने उदाहरण दूँ?
अपने ही घर से शुरु करूँ?
या आसपड़ोस से?
या खुद आप से?
और आपके बच्चोँ से?
जैसा की पहले भी कई बार कहा
कोई भी चीज़
जो आप देख, सुन सकते हैं
महसूस कर सकते हैं
या समझ सकते हैं
एक कोड है ।
वो कोड एक पार्टी की नज़र में
कुछ हो सकता है
और
किसी और पार्टी की नज़र में कुछ और।
या
अलग अलग पार्टियों की नज़रों में
एक होते हुए भी
अलग अलग तरह से
प्रयोग या दुरुपयोग हो सकता है
अलग अलग वक़्त पर
उनकी अपनी जरुरत के अनुसार।
मान लो
8 नंबर पर वो बच्चे पैदा करवाते हैं
या ऐसा ही कुछ करते हैं
ये 8
अलग अलग पार्टी के अनुसार
अलग अलग नंबर के साथ मिल सकता है।
ऐसे ही
मान लो
9 नंबर पर
वो किसी की ऎसी तैसी करवाते हैं
या
अलग अलग तरह के बँधे लगवाते हैं
हिज़ड़े, नपुँसक आदि बनाते हैं
ठीक ठाक लड़के या लड़कियों को।
सोच के देखो
कहीं भी ,
किसी के यहाँ भी
बच्चे पैदा करवाना
या लोगों को हिज़ड़े बनाना
ये काम राजनितिक पार्टियों के हैं क्या?
वो आम लोगों की ज़िंदगियों में
कहाँ कहाँ घुसे हुए हैं?
या कहो कहाँ नहीं घुसे हुए हैं?
जन्म करवाने से लेकर, मौत तक?
जन्म से पहले conceive करवाने से लेकर
दाह सँस्कार के तौर तरीकों तक।
बच क्या गया?
अज़ीब सँसार में हैं ना हम?
अब हर चीज़ एक कोड है
और अलग अलग पार्टी के हिसाब से
उसके अलग अलग हिसाब किताब?
इतना कुछ ये पार्टियाँ कैसे कर लेती हैं?
और
आम आदमी को
इतना कुछ कैसे समझ आ सकता है?
राजनितिक पार्टियों के पास
दुनियाँ जहाँ के दिमाग हैं
जो या तो इनके लिए काम करते हैं
या इनके साथ मिलकर काम करते हैं
वो दिमाग़ इंटेलिजेंस विभाग से लेकर
डिफ़ेंस और सिविल ऑफिसर्स से लेकर
यूनिवर्सिटी, रिसर्च इंस्टिट्यूट में बैठे
प्रोफेसर, डॉक्टर और वैज्ञानिक सब हैं
और हाँ
कहीं की भी न्याय व्यवस्था भी
उनकी जानकारी के साथ
या बिना जानकारी के भी।
ओह हाँ!
मीडिया भी
मीडिया कल्चर के बिना तो
कुछ भी सोचा ही कहाँ जा सकता है?
जैसा मीडिया कल्चर, वैसा सा ही असर?
जैसी सँगत, वैसी रँगत?
ये सब मिलकर
कहीं का भी सिस्टम बनाते हैं।
किसी भी इंसान का भी
उसके घर का
उसके आसपास का
समाज, मौहल्ले
गाँव, शहर राज्य देश का भी।
आम आदमी के
इतना कुछ कैसे समझ आ सकता है?
कोशिश करते हैं
शब्दों से शुरु कर
नंबरों
और तरह तरह के designs
और सिस्टम तक जाने
और उसे समझने की।
नाक बड़ी?
या
आँख?
कान?
या
दिमाग?
नाक की मिमिक्री
कैसे कैसे की जा सकती है?
ऐसे ही
आँख, कान
या दिमाग की भी?
और ऐसे ही
शरीर के किसी भी अंग की?
इनके कितनी तरह के डिज़ाइन
कहाँ कहाँ उकेरे जा सकते हैं?
सुनाए जा सकते हैं?
दिखाए जा सकते है?
या बिना सुनाए या दिखाए भी
समझाए जा सकते हैं?
किसी कोड या कोढ़ से जैसे?
कितनी ही राजनितिक पार्टियाँ
और कितने ही कोड या कोढ़?
या डिज़ाइन?
या जितनी राजनितिक पार्टियाँ
जितने सिस्टम
उत्तों के उतने ही तरीक़े
और कोड या कोढ़?
और उतनी ही तरह के
भले या बुरे असर भी?
इन्हें
Echo and Mirror
या
ऐसे से ही किसी और
मॉडुल से समझ सकते हैं क्या?
और समझा भी सकते हैं?
ऐसे ही Cast Casting
और Mimicry भी?
भले के लिए भी
और बुरे के लिए भी?
सबसे बड़ी बात
आपको कुछ ख़ास इज्जाद नहीं करना
ये सब
आपकी अपनी ज़िंदगी में हो रहा है
आसपास की ज़िंदगियों में हो रहा है
आपके आसपास चारों तरफ
जिधर देखो, सुनो, समझो उधर ही
जैसे बिखरा पड़ा है।
अच्छे के लिए भी
और बुरे के लिए भी।
Constructive and Destructive Module जैसे
Current Position
Media Culture Lab (June 2021 - Continue)
Independent Research, Writing, Communication, and Experiential and Experimental Learning
Media Culture Lab, Designing and Engineering of Society and Human Robotics, Social Tales of Social Engineering
Vijay Dangi ORCID Profile ( But why is it known as OR CID? :)
Academic Experience
Assistant Professor Biotechnology,
Oct., 2008 - June, 2021 , UIET, MDU, Rohtak
2003 - 2008, PhD, ACBT, MDU, Rohtak
PhD Thesis Molecular characterization of oxalate oxidase purified from grain sorghum leaves.
May - June 2008, Visiting Fellow UF, Gainesville, FL, USA
Administrative Management and Governance
2020 - 2021, Coordinator (Head), Department of Biotechnology, UIET, MDU
2012 - 2015, Exams superintendent and deputy superintendent, UIET, MDU
2014 - 2015, Secretary, Maharshi Dayanand, University Teaching Association, MDU
Member of board of studies, MDU
Member of various departmental committees and events organization, curriculum modernization
2018- 2019, Minor Research Project, University Funded
Study of Y-chromosome haplogroups in local population.
2009 - 2019, Supervised M.Tech and B.Tech dissertations
2008 - 2021, Teaching and Laboratory, B.Tech, M.Tech and PhD level
Molecular Biology, Cell Biology, Genetics, Genomics and Proteomics, Diagnostic Techniques, Environmental Biology, Genetic Engineering, Basic Bioinformatics
Faculty Development Programs and Workshops
2010, High Impact Teaching Skills, Wipro, MDU, Rohtak, Haryana
2011, Orientation Course, PU, Chandigarh
2012, Refresher Course, University of North Bengal, Darjeeling, West Bengal
2019, E-Learning Technologies, E-Content Development and MOOCS. Faculty Development Centre, MDU, Rohtak, Haryana
Research, Intellectual Interests and Contributions (Code-Decode)
Investigating the parallels between molecular, biological processes and macro social systems.
Experienced media culture as a tool for social designing, engineering and human robotics, like some living lab. By making changes in this media culture, it can be used and abused for good or bad.
Surveillance agencies, big companies, corporations and governments are using and abusing this for power struggles and to take over resources, mostly from weaker sections of society. The same can be used to design better systems and create better conditions for humans by doing changes in media culture ingredients.
My interests are how these systems mirror processes, systems or ecosystems. How they amplify, manipulate or mutate something for good or bad like growth, regeneration, prosperity, education, information or vice versa.
Hobbies and Creative Interests
What happens, when research itself involves and mingles with hobbies and creativity and vice versa? Interesting interdisciplinary fusion? Better way to communicate science?
Reflection, poetry, satire writing in Hindi, English and Haryanvi