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Academic Journey?

Current Position Media Culture Lab (Independent Research and Writing),  June 2021 - Continue Experiential Learning, Research and Communicati...

Thursday, July 30, 2026

Semiotic Lab Culture 1

इशारों ही इशारों में? 

बात बन जाती है? 

और बात बनते बनते? 

बात टल भी जाती है?

या बिगड़ भी जाती है? 


होते देखा है ऐसे भी कहीं?

गुप्तगू में?

मुस्कराहट में?

आंशुओं में?

मुँह फुलाने में?

तीखी नज़र में?

कड़वी नजर में?

घूरने में?

नजर घुमाने में?

आँखों की तिल्ली घुमाने में?


एक, दो या तीन?

या कितनी ऊँगली दिखाने में?

अंगूँठा दिखाने में?

एक ऊँगली आगे पीछे कर 

कड़वी नज़र दिखाने में?

किसी की तरफ ऊँगली करने में?

अंगूँठा और एक ऊँगली से 

जीरो बनाने में?


ऐसे ही 

Good? 

Bad? 

OK? 

OK? OK? 

Best of Luck?

Heart Shape?


और भी ना जाने कितने ही संकेत?

इशारों इशारों में ही? 

कर जाते होंगे?

जाने कहाँ कहाँ?

और किस किस किसको?

और कब कब?

या किसलिए?


ऐसे भी बातें होती हैं?

अब सिर्फ बातें होती हैं?

या उससे आगे भी कुछ होता है?

ये तो निर्भर करता है?

कितने सारे फैक्टर्स पर?

जैसे?

सँस्कारों पर?

संस्कृति पर?

विचारों पर?

प्रगति पर?


वक़्त के हिसाब किताब पर?

तारीखों, महीनों या सालों के 

नंबरो या कोडों पर?

और?

किसी भी जगह की राजनीती पर?


इशारों और संकेतों के इस जहाँ को 

या कोडों या कोढों को?

थोड़ा सा और उधेड़ें?

थोड़ा सा और इसका दायरा बढ़ाएँ?   

उससे हम ना सिर्फ़ खुद को बेहतर समझ पाते हैं 

बल्की,

अपने घर और आसपास को भी 

खुद के सिस्टम को भी 

और 

अपने घर और आसपास के सिस्टम को भी। 

 

मतलब?

ख़ामियों  को भी 

और 

ख़ास शक्तियों को भी 

जो हर एक इंसान के पास हैं 

क्यूँकि 

हर इंसान अनोखा है 

ख़ास है 

आपके जैसा ना कोई हुआ 

और ना होगा 

इसलिए खुद को पहचानों 

और डम्मी या मोहरे बनने से बचो। 


बस अपनी कमियों और शक्तियों को पहचानों  

कमियों को चलता करो 

और शक्तियों को निखारो

जो आपको अपना मोहरा बनाते हैं 

वो आपकी दुखती रगो को पकड़ते हैं 

और पकड़े ही रहते हैं 

उन्हें बढ़ाते चढ़ाते हैं 

और बढ़ाते चढ़ाते ही रहते हैं 

आपको उसके उल्टा करना है 


अपनी खासियतों को पकड़ना है 

और पकड़े रखना है 

उन्हें बढ़ाना चढ़ाना है 

खामियों को वक़्त ही नहीं देना। 

फिर आप एक ताकत हैं 

ना सिर्फ़ अपनी 

बल्की 

अपने घर की 

आसपास की और समाज की भी। 


Semiotic Lab Culture 

यही पढ़ाती और सिखाती है 

और 

वो हर कल्चर और जगह पर है 

हर जीव और निर्जीव में है। 

देखना, पढ़ना और समझना शुरु करें उसे?  


Semiotic?

साँकेतिक?

जो संकेतों से आगे भी  

बहुत कुछ बताता, समझाता है? 

ये तो जैसे ABCD हैं 

कोड या कोढों के जहाँ को 

और उनके मतलबों को समझने के लिए 

जैसे?  


Media Lab Culture 

और इसके Ingredients को समझने के लिए 

बहुत जरुरी है ये लैब 

Media Lab Culture का ही 

एक छोटा सा 

मगर अहम हिस्सा जैसे। 

Universal Media Culture Lab 4

सत्ता और पत्ता की कहानी? 
कहानी या लड़ाई? 

सत्ता और सट्टा 
दोनों एक ही बात हैं क्या?
ऐसे ही 
जैसे पत्ता और प्रशनचिंह?  

सत्ता एक फिल्म आई थी?
या पत्ता?
तास के पत्ते जैसे?
इक्की, दुग्गी, तीगी वैगरह?    

तास खेलते हैं आप ?
कौन से वाला खेल?
बच्चोँ वाले?
या थोड़े बड़ों वाले?

सिर्फ़ शीशा दिखाना है?
इक्की 
मेरी भी इक्की 
दुग्गी 
मेरी भी दुग्गी?
कुछ कुछ ऐसे ही?

या आपके खेल में 
इनसे आगे भी बहुत कुछ है?
आप सिर्फ़ इक्की, दुग्गी नहीं मिलाते?
उससे आगे भी रँग रुप है?
गुण अवगुण हैं? 
तासीर हैं, तेवर हैं?
अपने पराये हैं? 
और भी ना जाने 
कैसी कैसी ऊँच नीच हैं?
   
जैसे?
आप राजे महाराजों वाली 
सत्ताओं के खेल खेलते हैं?
वहाँ ऊप्पर 
OFFICERS वाली दुनियाँ में 
वही खेल खेले जाते हैं। 

जो कोई,  
कँधे से ऊप्पर जितना मजबुत होता है  
वो जीत जाता है?
बाकी?
या तो हार जाते हैं?
या उनकी रक्षा में लगे होते हैं?

राजा रानी की रक्षा?
राजमहलोँ की रक्षा?
कितने स्तर की है?
4 - 5?
6 - 7?
10 - 11?

और आप?
इसके कौन से स्तर पर हैं?
वो समाज में आपकी हैसियत, 
औकात, पिछड़ापन या आगे बढ़ते 
दायरों और समुहों को बताता है। 
आपकी या आपके अपनों की 
घर की या आसपास की 
सुरक्षा का दायरा क्या है?   

राजा रानी को बचाना है?
राजमहल को बचाना है?
ये तो कल की बातें हैं ना?
आज?
ऐसे से ही कुछ ख़ास 
औहदों को बचाना है?
कोढ़ों या कोडों  को बचाना है?

वो कोड आपके अपने 
या आपके अपनों के हैं?
या आप किन्हीं और के मोहरे 
या डम्मी मात्र हैं?
कैसे जानेंगे ये?
अगर आपको आज के समाज के 
कोड या कोढों का ही पता नहीं तो?    

कौन हैं आज के वो ख़ास?
राजा रानी?
ओहदे?
या कोड?

वो कोड
आपके लिए 
या आपके घर के लिए?
या आपके समाज के लिए?
कितने भले हैं?
या बुरे हैं? 

क्या आज भी आप 
कोई राम ढूँढ रहे हैं?
आज की सीता भी 
ज़मीन में समाती है?
सिर्फ़ किसी सिरफ़िरे के 
कुछ कहने भर से?

या जँगल भेझ दी जाती है?
किसी केकैयी द्वारा?
ऐसी सी ही कोई कहानी 
आज की कुन्ती की भी है?
कितने पति थे उसके?
कितने बच्चे?
और कैसे?

आज भी कोई करण है?
और दुर्योधन और दुशाषन भी?
आज भी कोई दशरथ है?
केकैयी और धृतराष्ट्र भी?

आज भी कोई कंस है?
और 
गाँधारी और द्रौपदी भी?
आज भी कोई औरत 
बिना उससे पूछे 
उसकी मर्जी के बिना 
4 -5 में बाँट दी जाती है?
कहीं ऐसा कुछ 
आपके बच्चों के साथ भी 
शुरु तो नहीं हो चुका? 

ये सब राजघराने हैं?
या लीचड़ों के अड्डे?  
आज भी कोई भीष्म पितामह है?
जो काँटो की सेज़ पर सोता है?    
वो सब जो आपने 
पुराने जमाने की किताबों में पढ़ा है?
बड़ा ही अजीबोग़रीब 
और ऊटपटाँग सा?
क्या वो सब आज भी होता है?  

या?
आज उससे भी ज्यादा कुछ है?
भला भी और बुरा भी?  
जैसे Conflict of Interest की राजनीती 
कल थी, आज भी है 
और आगे भी रहेगी 
आप उसमें किसी के मोहरे ना रहें 
डम्मी मात्र बनकर ना रह जाएँ 
उसके लिए भी 
इस खेल को जानना बहुत जरुरी है। 

क्यूँकि 
आज कन्धों से ऊप्पर का हिस्सा 
थोड़ा ज़्यादा ही चलता है 
और सिर्फ़ गिने चुने लोगों का ही नहीं 
जितने ज़्यादा, जितना ज्यादा 
पढ़ना लिखना और सोचना सीख जाएँ 
उतना ही। 

तो आप भी पढ़ते, लिखते हैं?
पढ़ना लिखना सिर्फ़ डिग्री वाला नहीं?
सिर्फ़ कुर्सियों या औहदों के लिए?
कुछ पन्ने 
या सर्टिफिकेट या पॉइंट्स मात्र? 
इकट्ठे करते जाने वाला नहीं 
सच का जानने समझने वाला 
या योगदान करने वाला ज्ञान?
पढ़े हुए भी और कढ़े हुए भी?
या कम डिग्री, सर्टिफिकेट होते हुए भी 
कहीं ज्यादा कढ़े हुए?     

तो तासों से आगे 
और कौन से खेल खेलते हैं आप?
क्या आज के खेलों का 
अंदाजा तक है आपको?
ख़ासकर उनका 
जो आदमी को रोबोट बनाते हैं?

कोई भी नहीं?
तो भी, समझना तो जरुरी है 
क्यूँकि 
आदमी के रोबोट बनने में 
या आदमी बने रहने में 
बस इतनी सी जानकारी 
या अज्ञानता की दूरी है।   

Tuesday, July 28, 2026

Universal Media Culture Lab 3

 सोच और खोज?


मगर उससे पहले 

Conflict of Interest की राजनीती को समझना बहुत जरुरी है। 


Conflict of Interest की राजनीती

सिर्फ़ रिश्तों में दरार पैदा नहीं करती 

वो रिश्ते ही खा जाती है 

रिश्तों का बिगाड़ इस स्तर तक कर देती है 

की कोई स्तर ही ना बचे 

उनकी "माँ बहन" करने लगे। 


अपमानकर्त्ताओं की इस मानसिक गिरावट को 

आप सिर्फ़ राजनितिक रैलियों या भाषणों में ही नहीं 

बल्की, 

आम बोलचाल के शब्दों 

पहनाओं, वस्त्रों  

खाने पीने की वस्तुओं 

हवा, पानी की गुणवत्ता 

पढ़ने लिखने के संसाधनों 

खेलने, वर्ज़िश करने 

या स्वास्थ्य के संसाधनों 

आवागमन-यातायात, खेत-खलिहानों 

अपने मकानों या दुकानों के नामो 

या पतों से लेकर   

गली मौहल्ले की पहचानों 

रीती रिवाज़ों के तौर तरीकों 

या यूँ कहो की 

जो कुछ भी आप 

देख, सुन, समझ और सोच सकते हैं 

उन सबमें घुला मिला हुआ देख सकते हैं। 


और 

ये सब आपका और आपके घर का 

आसपास का और गली मौहल्ले का 

गाँव, शहर, राज्य या देश का स्तर बताते हैं।   

इन्हे सुधारा भी जा सकता है 

और ज्यादा बिगाड़ा भी। 

सब आप पर और आपके आसपास पर, 

समाज पर निर्भर करता है। 


और इस सबको, 

Conflict of Interest की राजनीती ने 

मकड़ी के जाले-सा गूँथा हुआ है। 

उधेड़ने की कोशिश करें 

उस मकड़ी के जाले को?


जैसे जैसे 

उस Conflict of Interest की राजनीती से निकलोगे 

वैसे वैसे, बहुत कुछ अपने आप सुधरता जाएगा 

जितना अपने अपने के चक्कर में उसमें घुसते जाओगे 

उतना ही ना सिर्फ खुद ज्यादा उलझते जाओगे 

बल्की,

अपनी आगे की पीढ़ियों को भी उलझाते जाओगे।   

Universal Media Culture Lab 2

एक निग़ाह उस तरफ 


स्वस्थ, हट्टा-कट्टा शरीर?

हँसता-खेलता आँगन?  

आगे बढ़ते लोग? 

पीछे रहते लोग? 

तरक़्क़ी या पिछड़ापन?

अमीरी या गरीबी? 


या कुछ भी जो आप पाना चाहते हैं 

बस एक निग़ाह उस तरफ 

जो आप पाना चाहते हैं 

और एक निगाह उनकी तरफ 

जिनके पास वो सब है 

या जो वो सब पा चुके हैं 


बस इतने से में ही 

फर्क समझ आ जाएगा 

और ये भी 

की आप वो पा सकते हैं या नहीं?

कितने वक़्त में? 

या कितना पा सकते हैं?

और कितना नहीं?

और क्यों?


हो सकता है 

आपकी और उनकी सोच में फर्क हो? 

जो वो करते हैं 

वो आप नहीं करना चाहते?

आपके interest ही अलग हैं?  

या वो आप नहीं कर सकते?

शायद सोच का फ़र्क? 


या शायद कोशिश ही नहीं की कभी?

या ऐसे तो कभी सोचा ही नहीं?

ऐसे भी संभव है?

या शायद उनसे अलग तरीक़े अपनाकर भी?

हो सकता है वो उनसे भी बेहतर हो? 


Universal Media Culture Lab

Universal तो है 

और तरीक़े किसी भी काम को करने के? 

या कोई भी परिणाम लाने के हज़ारों?

तो ये जानना तो जरुरी है 

की सामने वाले ने क्या तरीका अपनाया है?

क्या वो आपके हिसाब-किताब से सही है?  

या आप कोई और अपना सकते हैं?  


कई बार हो सकता है 

सामने वाले का तरीका बेहतर हो 

मगर 

आपके Media Culture के Ingredients 

हो सकता है उस पर फिट ना बैठ रहे हों?

और उन Ingredients में ज्यादा हेरफेर,

आप कर नहीं सकते?

ऐसा करने पर शायद नुकसान ज्यादा हो?

और भी कितने ही कारण हो सकते हैं 

खासकर, 

बात जब इंसानो की ज़िंदगियों की हो?     


या शायद, 

बहुत ही थोड़े से हेरफेर से ही वो सँभव हो?

मगर, 

आपको अभी तक वो तरीका पता ना हो?   

Universal Media Culture Lab 1

Prevention is Better Than Cure


कितनी ही बार सुना होगा ये सब तो?

और जाने कहाँ कहाँ?

और कैसे कैसे विषयों पर?   


ईलाज से रोकथाम बेहतर?

ये तकरीबन हर विषय पर लागू होता है 

और हमेशा बेहतर

और हर सिस्टम पर लागू 


वो सिस्टम आपका कोई एक अंग हो 

या शरीर ही 

वो आपके घर का कोई एक कमरा 

या घर ही 


ये शरीर के सिस्टम पर लागू होता है 

और घर के सिस्टम पर भी

किसी एक रिश्ते पर लागू होता है 

और बाकी सब रिश्तों पर भी 


ये जैसे घर पर लागू होता है 

ऐसे ही आसपड़ोस पर भी 

गली मौहल्ले पर भी 

गाँव, शहर राज्य और देश पर भी 

और देशों के आपसी रिश्तों पर भी 


ये जैसे शरीर नाम की मशीन पर लागू होता है 

ऐसे ही बाकी सब मशीनों पर भी। 


ये उस बाग़ की तरह है 

उस लॉन या पार्क की तरह है 

उस खेत खलिहान की तरह है 

जिस पर एक नज़र डालते ही 

पता चल जाता है 

उस पर कितनी मेहनत हुई है 

कितना दिमाग लगा है 

या कितनी ही तरह के और संसांधन। 


किसी भी सिस्टम में मोटे तौर पर 

कोई अलग जंतर मंतर काम नहीं करता

कोई अलग सिद्धांत या जादू काम नहीं करता 

Universal Media Culture Lab के जैसे। 

Friday, July 24, 2026

सिस्टम और कोड 16

उफ़ इत्ते रोड़े !

क्या किया इतने रोड़ों का?


थोड़ा स्क्रिबल 

थोड़ा रैंट वेंट 

थोड़ा कंस्ट्रक्ट 

थोड़ा स्ट्रक्चर 

थोड़ा आर्किटेक्चर 

थोड़ा डिज़ाइन 

थोड़ा पेंट 

थोड़ा प्रोसेस  


काफी सारी फाइल्स 

काफी सारे केस स्टडी 

काफी सारे लिंक्स 

ये ईधर, वो उधर 

ये वाला इधर 

वो वाला उधर 

उफ़ Too Much 

Too भेजा फ्राई 

और आवाज़ आई 

और फाइल्स 

और 

केस स्टडी चाहिएँ?


नहीं 

अब मैं दिए गए 

या किए गए 

प्र्शन के जाल में नहीं  उलझती 

वो ऐसे लगते हैं 

जैसे मीडिया कल्चर के हेरफेर 


जैसे मीडिया का प्रोपगैंडा 

इस पार्टी का या उस पार्टी का 

जैसे हकीकत को गोलमाल कर 

सामने वाले के सवालों को 

मुद्दों को दरकिनार कर 


सामने वाले की जरुरतों को 

हक़ीक़तों को धुँधलकार 

अपने ही जाले बिछाना जैसे 

इसलिए 

अब मैं हर ऐसे प्र्शन पर 

प्रशनचिन्ह लगाती हूँ 

हर ऐसे प्रोपगैंडा को 

अपने तर्क वितर्क की कसौटी पर रखती हूँ 


हर न्यूज़ के पीछे छिपे 

या छिपाने की कोशिश करते 

सवालों 

या मुद्दों को देखती समझती हूँ 

उनमें मेरा अपना 

या मेरे अपनों का 

या आम आदमी का 

कितना भला या बुरा है? 

उस तथ्य को दिमाग़ में रख 

उसे न्यूज़ या एब्यूज?  

केटेगरी के हवाले कर देती हूँ 


और उसके लिए मेरी अपनी 

Culture Media Lab है।   

सिस्टम और कोड 15

Oversurveilled and Overpaying?

Why?

Social Simulations? Or Emulations?

And Human Robotics?


A Designed and Engineered World

Not the natural one 

Oversurveilled and Overpaying?

आम या साधारण कैमरों की कहानी नहीं है 

ये आम लोगों की समझ से बहुत  दूर 

आज की टेक्नोलॉजी  के प्रयोग और दुरुपयोग की कहानी है। 


ये  इंसान को रोबोट बना लेने की कहानी है 

ये इंसान को एक्सपेरिमेंटल प्राणी समझ 

उसपर उसकी जानकारी और पर्मिशन के बिना 

भद्दे और घटिया एक्सपेरिमेंट्स की कहानी है 

जानकारी के बाद विरोध करने  पर 

ख़त्म करने पर तूल जाने की कहानी है। 


ये इंसान को उसके अपने संसाधनों से 

खदेड़ने की  कहानी है 

ये Infodemics, Misinformation 

Selected Information 

और Information Block की कहानी है 

ये सिंथेसिस और सिंथेटिक जहाँ की कहानी है। 

जहाँ हर तरह का साम, दाम, दंड, भेद  जायज़ है?   


ये किसी एक इंसान की नहीं 

संसार में जाने कितने ही लोगों की यही कहानी है। 

इसलिए आदमी का बच्चा आदमी तो बनेगा 

मगर  ऐसे जहाँ में 

वो कैसा आदमी बनेगा

ये वो जानने की कहानी है।  


ये कुछ कुछ ऐसे है 

जैसे इन्होंने मांगे को उठा दिया 

और उन्होंने माँगे की बहु को 

मगर 

ये कुछ कुछ ऐसा है 

जैसे अश्व्थामा मारा गया। 


ये मांगे कोई और था 

कहीं और 

वो माँगे की बहु 

किसी और माँगे की बहु

कहीं और 


क्या हो अगर ये 

एक दूसरे को कहने लगें 

तुमने हमारा आदमी मारा? 

ये कुछ कुछ बॉन्ड्स की कहानी है 

मगर कौन से और कैसे बॉन्ड्स की?

Wednesday, July 22, 2026

सिस्टम और कोड 14

 बॉन्ड्स की कहानी, बॉन्ड्स की ही जुबानी? 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 


कैसे कैसे बॉन्ड हैं?

ऐसे वैसे बॉन्ड हैं?

जीव की उत्पत्ति 

बॉन्ड्स की कहानी?

जीव का जीवन 

बॉन्ड्स की कहानी?


सिस्टम की उत्पत्ति?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का सरल या जटिल होना?

बॉन्ड्स की कहानी?

सिस्टम का संतुलित या असंतुलित होना?

सिस्टम के जीवों का संतुलित या असंतुलित होना?

 

जीव के बॉन्ड्स का संतुलन?

अच्छे जीवन की कहानी?

जीव के बॉन्ड्स का असंतुलन?

उतार चढ़ावों की रवानी?

जैसे घर या मौहल्ले का 

संतुलित या असंतुलित होना?

वहाँ के जीवों के 

संतुलित या असंतुलित होने की कहानी?


ऐसे ही शरीर का है 

वो जैसी जैसी किस्मों के सिस्टम में रहता है 

वैसा वैसा सा ही उसका स्वास्थ्य होता है  

एकदम कॉपी करता सा जैसे?


कुछ कुछ ऐसे, जैसे?

किसान का बच्चा, किसान?

बनिए का बच्चा, बनिया?

अध्यापक का बच्चा, अध्यापक?

टीचर का बच्चा, टीचर?

और फ़टीचर का बच्चा, फ़टीचर?


वकील का बच्चा, वकील?

डॉक्टर का बच्चा, डॉक्टर?

राजनेता का बच्चा, राजनेता?

एक्टर का बच्चा, एक्टर?

वैध का बच्चा, वैध?

 झाड़फूँक वाले का बच्चा, झाड़फूँक वाला?


ठेकेदार का बच्चा, ठेकेदार?

ऐसे तो?

राम का बच्चा, राम?

रावण का बच्चा, रावण?

शरीफ़ का बच्चा, शरीफ़?

कबाड़ी का बच्चा, कबाड़ी?


गरीब का बच्चा, गरीब?

अमीर का बच्चा, अमीर?

नौकर का बच्चा, नौकर?

साहब का बच्चा, साहब?


कुत्ते का बच्चा, कुत्ता?

भैस का बच्चा, भैंस?

गाय का बच्चा, गाएं

चिड़िया का बच्चा, चिड़िया 

साँप का बच्चा, साँप 

सूअर का बच्चा, सूअर

गधे का बच्चा, गधा 

घोड़े का बच्चा, घोड़ा 

हाथी का बच्चा, हाथी        

तो आदमी का बच्चा?

क्या होगा?     


इस आखिरी वाले पैराग्राफ 

और ऊप्पर वालों में थोड़ा फर्क है?

बुझो तो जाने?

आगे पोस्ट में 

सिस्टम और कोड 13

A Small Global Hub? Oversurveilled and Overpaying? 


गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?   


और इसे थोड़ा और जानो समझोगे तो पता चलेगा 

ये Oversurveilled तो सारा जहाँ है 

जहाँ कदम कदम पर कैमरे हैं 

कदम कदम पर रिकॉर्डिंग है 

हर कदम पर डाटा है 

और हर कदम की कहानी है 

जो यहाँ या वहाँ के विष्लेषण की ज़ुबानी है 


कितनी ही तरह के बॉन्ड हैं 

कितनी ही तरह की फोर्सेज हैं 

कुछ ईधर घसीटते हैं 

तो कुछ उधर घसीटते हैं 


कभी कभी तो लगता है यूँ 

जैसे दुनियाँ ही सारी 

सिर्फ और सिर्फ 

बॉन्ड्स की ही कहानी है 

और बॉन्ड्स की ही जुबानी है? 

सिस्टम और कोड 12

सिस्टम और  Conflict of Interest की राजनीती

आम आदमी से कैसे खेलती है?

और कैसे उसे अपना रोबॉट या गुलाम बनाती है?


ऑफिस से उदहारण लें या घर और आसपास से?

दोनों से लेते हैं एक एक करके  


ऑफिस 

9-10 सालों में कोई शिकायत नहीं 

मगर?

2014 में BJP के आते ही 

इस कमिटी से निकाला और उस कमिटी से 

तकरीबन अचानक 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।    

क्लॉस में रोड़े, लैब्स में रोड़े 

घर पर रोड़े, रोड़ पर रोड़े 

मगर 

आपको धीरे धीरे, कुछ वक़्त बाद समझ आता है।   


और आप यहाँ वहाँ शिकायत करने लगते हैं 

मगर 

ये शिकायतों का दौर तो 2012 में ही नहीं शुरु हो गया था?

BJP उसके बाद ही आई है, 2014 में 

क्लॉस और लैब्स के रोड़ों से आप पहले ही तंग नहीं हो चुके थे?

सेक्रेटरी का इलेक्शन उसके बाद ही लड़ा था 

की चलो यहाँ कुछ नहीं हो रहा 

तो एडमिंस्ट्रेशन का रास्ता ही सही 

वरना, 

बचपन से ही राजनीती से नफरत करने वाला इंसान 

और राजनीती में एंट्री?


शायद ये सोचकर 

की Higher Education System है 

यहाँ तो ऐसा क्या होता होगा? 

ये भूलकर,

लैब्स और क्लासेज में क्या हो रहा था?

और क्यों?

वो पता ही नहीं था। 


Reflection का सबसे बड़ा फ़ायदा?

उसने यही बताया है 

कोई भी समस्या, 

शायद ही कभी अचानक आती है 

उसके सब लक्षण पहले से धरे होते हैं 

हमारे आसपास ही। 

मगर 

हम अपनी भागदौड़ की ज़िंदगी में 

उनकी तरफ देखते ही नहीं 

उन पर सोचना समझना 

या आत्म विष्लेषण करना तो कहाँ?


भागदौड़ की ज़िंदगी वालों को 

शायद इसीलिए सुकुन नहीं होता?

क्यूँकि, 

वो अक्सर ज़िंदगी को ढो रहे होते हैं 

ज़्यादा, ज़्यादा और ज़्यादा की चाह?

इंसान को गधा बना देती है?

अगर 

2017 तक की कहानी ढंग से समझी होती 

तो यूनिवर्सिटी के बुलाने पर वापस शायद ही जाती। 


पर सुना है 

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं 

उस दौबारा जॉइनिंग के बाद जो फाइल्स मिली 

अगर वो ना मिलती?

तो Campus Crime Series कहाँ लिखी होती?


और 2022 में अगर वापस गाँव न आती?   

कोशिश तो बहुत की, 

मगर राजनीती वालों ने चलने दी क्या?

ये भी इसी दौरान समझ आया 

यूनिवर्सिटी एक नहीं है 

कई धड़े हैं, कई पार्टियाँ हैं 

और उनमें आपस में खिंचतान

और राजनितिक कुर्सियों की मारामारी। 


सबसे बड़ी बात 

आप कहीं भी रहो 

कहीं भी जाओ 

ये समझकर कभी मत जाना 

वहाँ सब सही मिलेगा 

हो सकता है, 

वहाँ, यहाँ वाली समस्या ना हो 

या कम हों 

मगर 

वहाँ की अपनी ही तरह की समस्या होँगी 

यही राजनीती सारे  सँसार में है। 

 

गाँव ने सँसार को समझाया? 

ऐसे जैसे 

A Small Global Hub?

Oversurveilled and Overpaying? 

गाँव की राजनीती ने 

Social Simulations और Human Robotics समझाया?

अजब गज़ब दुनियाँ?