वो सितारे कोई और थे
ये सिंघाड़े कोई और हैं।
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Current Position June 2021-Continue, Media Culture Lab (Independent Research and Writing) Experiential Learning, Research and Communication...
सामान्तर घड़ाईयाँ
क्या होती हैं?
और कैसे घड़ती हैं ये राजनितिक पार्टियाँ?
Experiment
सामान्तर घड़ाई,
Example
दो चुल्हों पर अलग-अलग रसोईयों द्वारा एक जैसी सी रोटी बनाना
बनाने वाले रसोईये अलग हैं
सामान भी उनका अपना है
मगर, एक जैसा-सा है
एक जैसा-सा है
एक ही नहीं है।
Ingredients
जैसे आटा, पानी, चुल्हा
Process, Method या बनाने का तरीका?
वो भी एक जैसा सा है
जैसे आटा गूँथना
उसकी लोई बनाना
उसको चकले बेलन से
गोल गोल आकार देना
फिर,
तवे पर रखना
एक तरफ से सेकना
फिर दूसरी तरफ से
और फिर
आग पर फूलाना
एक ही वक़्त में
ईधर ये रसोईया
और उधर वो
जैसे एक को कॉपी करता हुआ।
रसोईयों के नाम?
मान लो A और B
या ये भी A और वो भी A?
या ये A और वो A + या A -
या ये A और वो AA?
या कुछ और भी हो सकते हैं।
क्या फ़र्क पड़ जाएगा?
नाम ऐसे एक होने से?
या बदल देने से?
पद का फर्क
जाती का फर्क
धर्म का फर्क
अमीरी गरीबी का फर्क
और भी कितनी ही तरह के अंतर।
और
कितने ही तरह के कोढ़
Conflict create करने के
या शांती?
बीमारी पैदा करने के
या ठीक?
बीमारी आगे बढ़ाने के?
या ऑपरेशन कर कुछ काट पिट के?
या दुनिया से ही उठा देने के?
या फिर तरक्की की तरफ ले जाने के?
सच में इतना कुछ बदल जाता है क्या?
सिर्फ नाम के ही थोड़े से हेरफेर से?
आपका नाम, सिर्फ एक नाम नहीं है
वो आपकी खास पहचान है
खास ID, हर पहचान पत्र में, हर जगह
उसमें एक शब्द का भी हेरफेर
ज़िंदगी और मौत का फर्क बन सकता है
तरक्की या बदहाली का फर्क हो सकता है।
सोचो फिर,
उस नाम की पहचान पर
किसी और से उसके जैसे से
या उससे अलग से कुछ प्रतिबिम्ब घड़वाना
क्या कुछ कर सकता है?
या उस नाम के कोढ़ से
ऐसे प्रतिबिम्ब घड़वाने से?
जैसे एक रसोईया A रोटी बना रहा है
दूसरा रसोईया A, वो भी रोटी बना रहा है
या कहो की पहले वाले A को कॉपी कर रहा है
जैसे आपके किसी सर्टिफिकेट की कॉपी?
और सोचो, अगर वो इतना निपुण हो
की यही ना पता चल पाए
की असली रोटी कौन सी है और नकली कौन सी?
तो क्या कहेंगे उसे?
Process Copy?
Method Copy?
Result Copy?
या आपके पास कोई बेहतर शब्द है?
अगर हाँ तो बताओ?
ऐसी ऐसी सी कॉपियों
या इनसे बेहतर कॉपियों
या प्रतिबिम्बों
या थोड़ा और आगे, बहरुबियों
या Reverse, Forward Designs and Engineering
या? Time Machine, Time Travel पढें?
आपके आसपास से ही?
या खुद आपकी अपनी ज़िंदगियों से?
देखें तो,
की आप जो कर रहे हैं, वो सब खुद ही कर रहे हैं?
या आपका सिस्टम (राजनितिक) इतना आगे जा चुका है
की वो आपको एक रॉबोट से ज्यादा कुछ नहीं समझता?
और उस रॉबोट का कंट्रोल अपने पास रखता है?
घर खीर तो बाहर खीर?
जितना और जैसा किसी भी इंसान को
घर से मिल रहा है,
उतना ही और वैसा सा ही बाहर से?
भला कितना सच है इसमें?
कोड और सामान्तर केस स्टडी
कुछ-कुछ, ऐसा-सा ही कह रहे हैं?
जानकार क्या कहते हैं?
घर दुलार, तो बाहर दुलार?
घर तकरार, तो बाहर तकरार?
घर शांती, तो बाहर शांती?
घर दाना-पानी, तो बाहर दाना-पानी?
घर ईज्जत, तो बाहर ईज्जत?
घर मार-धाड़, तो बाहर मार-धाड़?
घर संपन्न, तो बाहर सम्पन्नता?
घर गरीबी, तो बाहर गरीबी?
घर, घर, तो बाहर भी अपना घर?
घर ही बेघर, तो बाहर भी कैसा घर?
जो घर में छाया, तो बाहर भी छाया ही छाया?
जो घर में सिर पर साया, तो बाहर भी आशीर्वाद?
घर द्वेष तो बाहर भी द्वेष?
घर क्लेश तो बाहर क्लेश?
जो लूटे घर में, वो लूटे बाहर भी?
घर मिले माया, तो मिले बाहर माया?
घर मंदिर, तो जग मंदिर,
क्या जाना फिर कहीं कोई मंदिर?
घर ही बुचड़खाना, तो बाहर भी बुचड़खाना?
जैसी घर से आस, वैसी बाहर से, क्यों कम या ज्यादा?
बीमारु राजनीती?
"अगर वो दिल्ली में डेंगू फैलाएँगे
तो हम भी फोगिंग करेंगे?"
अरविंद केजरीवाल
क्या आम आदमी जानता है
की राजनितिक पार्टियाँ
बीमारी-बीमारी खेलती हैं?
जैसे Dengue और Fogging
दोनों ही कोड हैं
अब कोड हैं या कोढ़ हैं?
ये आम आदमी तय करे।
ऐसे ही हर बीमारी एक कोड है
कोड है या कोढ़ है?
और अगर किसी को ये सब
नया-नया पता चले,
और वो जनता को आगाह करने की
कोशिश भर भी करे तो?
वो देशद्रोही है?
जैसे देशद्रोह भी एक कोड है।
वो कब, किसको और क्यों चाहिए?
सब राजनीती की जरुरतों के
हिसाब-किताब की राजनीती है।
जैसे
"तुमने हमें लकवा किया,
हमने तुम्हें कर दिया"
और आप हैरान
ये क्या कह या समझा रहे हैं?
मुझे एक दिन कुछ ऐसा सा हुआ था
और फिर उसके लक्षण
कई महीनों या कहो
की 2-3 साल भुगते।
थोड़े बहुत अब भी,
कई बार दिख जाते हैं
या कहो की दिखा दिए जाते हैं
अगर, कुछ सावधानियाँ ना रखूँ तो।
अब ये सब कहने
या राजनितिक ड्रामे के द्वारा
बताने-समझाने वाले कौन थे या हैं?
किसी आम आदमी को ये कहना
की तुमने हमें लकवा किया?
जिसे यही नहीं मालूम हो,
की किसी को लकवा भी
किआ जा सकता है?
और पता चले
की लकवा ही नहीं
बल्की,
बाकी सब बिमारियाँ भी
की जा सकती नहीं, बल्की
की जा रही हैं।
मगर कैसे?
Knowledge and Resources Abuse
गाँव आई, तो पता चला
यहाँ इसे लकवा
वहाँ उसे लकवा
और?
खास नाम (कोड)
खास तारीख
और स्थान
और?
खास तरह के तौर-तऱीके
और?
फिर उनका खास जगह ईलाज
और ख़ास वक़्त पर ठीक होने के लक्षण
पूरा ठीक होना
या आधा अधूरा?
या दुनियाँ से ही विदा हो जाना?
या कर दिया जाना?
जैसे रितु?
और वो कहते हैं, चुप।
नहीं तो?
तुम देशद्रोही हो?
ऐसे ही होते हैं देशद्रोही?
या नहीं तो
इसको या उसको उठा दिया जाएगा?
दुनियाँ से ही?
क्या इन आम लोगों को मालूम है?
की इनको लकवा हुआ नहीं
बल्की, किया गया है?
मगर,
किसने और कैसे?
और सबसे अहम
क्यों?
क्या दोष इन अंजान लोगों का?
Politics of Conflict of Interests
जिसकी सबसे ज्यादा मार
अंजान, कम पढ़ा लिखा
और ज़्यादातर समाज का
सबसे नीचे वाला तबका भुगतता है।
क्यों?
क्यूँकि,
उस समाज की राजनीती
और वहाँ का सिस्टम सही नहीं है।
ऐसा भी नहीं है की पढ़े लिखे या
समाज का उप्परी तबका नहीं भुगतता
भुगतता वो भी है
मगर, उसके पास संसाधन और ज्ञान
थोड़ा-सा ज्यादा होता है
तो जल्दी उभर जाता है
मौत को टाल पाता है
और ज्यादातर,
लम्बी और बेहतर उम्र पाता है।
जिस दिन बीजेपी आई
उस दिन कांग्रेस के किसी खास को
लकवा हुआ था।
इसलिए उन्होंने मुझे लकवा किया?
समझ ही नहीं आया
मैं तो बीजेपी से नफ़रत करती थी
और कांग्रेस के प्रति कहीं न कहीं
फिर भी झुकाव था
तो ये क्या था?
अब तो एक और प्रश्न था
आख़िर ये राजनितिक पार्टियाँ हैं कौन?
पता चला,
या कहो की जितना मुझे समझ आया
कोई नहीं, कोड मात्र?
किसी भी कोड की, कभी भी
किसी को भी जरुरत हो सकती है
और वो ईधर से उधर हो सकते हैं
इसीलिए, ये इसकी A टीम
वो उसकी B टीम वगैरह हैं
कब कौन, किसकी A, B है?
सब जरुरत के हिसाब-किताब से हैं।
तो, आपको कब कौन-सी बीमारी होती है?
ये जहाँ कहीं आप रह रहे हैं
वहाँ का राजनितिक ताना-बाना बताता है
इसलिए बहुत-सी बिमारियाँ
उस ताने-बाने से थोड़ा बाहर होने से ही
या तो ठीक हो जाती हैं
या होने लगती हैं।
वैसे इस ताने-बाने के तार
सारे संसार में ही ऐसे हैं
जैसे लोकल से हों
क्यूँकि,
टेक्नोलॉजी ने दुनियाँ को
बहुत ही सिमित कर दिया है।
सिस्टम का कौन सा कोड
आपके भले में है या बुरे में
ये कैसे पता चले?
क्यूँकि,
आपको तो राजनितिक सिस्टम के कोड ही नहीं पता?
पता हैं ना,
कैसे?
सिस्टम के कोड बड़े ही सीधे से हैं, साफ़ से हैं
किसी अच्छे वाले शीशे में दिखते प्रतिबिम्ब से हैं
सामाजिक से हैं, पारम्परिक हैं, भोले से हैं
उनमें छल नहीं है, कपट नहीं है
वो जैसे सामाजिक स्तर पर हैं, बस वैसे ही हैं
जैसे आपका भाई आपका भाई है और बहन, बहन
माँ, माँ है और बाप, बाप, बेटा बेटी, बेटा बेटी ही हैं।
उन्हें अगर उल्टे-पुल्टे, देखने-समझने या सुनने भी लगोगे
तो गड़बड़ है
नहीं तो चोरी छुपे गड़बड़ करने वालों को भी दिक्कत होगी
काफी वक़्त लगेगा, उनके बिगाड़ में और दरार में
और बिमारियों की पैदाईश में भी।
मौत तो फिर ज्यादातर, उस सबके बाद ही है।
मगर, शीशे भी सब एक जैसे कहाँ हैं?
कुछ शीशे प्रतिबिम्ब वैसा नहीं दिखाते, जैसा है
उससे काफी ईधर-उधर भी दिखा सकते हैं
उसके पीछे विज्ञान है, जिसे हर कोई नहीं समझ पाता
ख़ासकर, जब तक वो गुप्त रखने की कोशिशें होती हैं।
और उस गुप्त ज्ञान-विज्ञान के अनुसार?
आपका भाई, भाई नहीं, बहन, बहन नहीं
माँ-बाप, माँ-बाप नहीं, बेटा-बेटी, बेटा-बेटी नहीं
बल्की, अल्फ़ा हैं, बीटा हैं, गामा हैं, थीटा हैं
और भी पता ही नहीं क्या-क्या हैं?
वहाँ रेडियो है, तो?
Radio waves के प्रयोग और दुरूपयोग भी
इंटरनेट है?
तो?
Sattellite से या तार से या तरंगो के सहारे भी
WiFi है और Hotspot भी?
Proximate है और
Blue Tooth है और Infra Red भी
Quick Share है और Q R कोड भी
Screen Cast है और Mira Cast भी।
L ED है और Holo G Ram भी
Lidar है और Ladar भी
Radar है और
Sensors हैं और Simulators भी
Immesion है और Proxy और Proximity भी।
3D है तो Fish Tech भी
Data है तो Mining भी
Fin Tech है तो?
बीमारी भी हैं और उनके ईलाज भी
साथ में हम और आप जैसों का ईलाज भी
"चाचा जाण ना देणी यो,
आज इसका पुरा ईलाज बाँधागे"
जैसे-जैसे भाँड़ और भंडोले भी।
अब ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे, भाँड-भाँडोले हैं
तो युद्ध भी
और होते देखा दुनिया को Lock Down भी
Lock Down ने ही समझाया
बिमारियों और मौतों के कोढों का सँसार भी
Reverse Engineering और Built-in Systems भी
Human Made और Artificial Engineering भी
Synthesis और Synthetic Engineering भी
पानी फेरना और चूना लगाना भी।
कुछ समझ आया?
थोड़ा बहुत?
चलो, बाकी आगे
एक-एक करके।
आप और मैं, एक कोड हैं
हम सब एक कोड हैं
आप और हम
जो कुछ देख, सुन और अनुभव कर सकते हैं
वो सब एक कोड है।
मगर,
हर एक कोड अलग है
कोई न किसी की कॉपी
और ना ही बिलकुल एक जैसा
मगर फिर भी, जुड़वाँ हो सकता है
जैसे twin technology
और ऐसे से कितने ही और
ऐसे-ऐसे से ही औजार (Tools)
जो ये सब घड़ने के काम आते हैं।
ठीक ऐसे,
जैसे, खाती किसी घर को घड़ता है
उसके लिए जमीन चाहिए
एक नक्शा चाहिए
और बनाने में प्रयोग होने वाला सामान।
आप घर को जहाँ जिस जमीन पर चाहिए
वहाँ भी बना सकते हैं
और कहीं और बनाकर
वहाँ पर assemble भी कर सकते हैं
या कहीं से बना बनाया भी
ट्रांसपोर्ट करवा सकते हैं।
ठीक एक जैसे से, कितने ही घर हो सकते हैं
मगर, सबको जमीन अलग-अलग चाहिए
पुरानी जमीन पर नया भी बना सकते हैं
और नई जमीन पर पुराना भी
ट्रांसपोर्ट करवा सकते हैं
या पुराने को उधेड़
उसी जमीन पर नया बना सकते हैं।
ठीक ऐसे ही,
जैसे आप अपने BMI (Body Mass Index) को
किसी पुराने BMI पर भी ला सकते हैं
और कोई नया BMI भी घड़ सकते हैं।
मगर, जमीन की तरह
आपका दिमाग एक ही है और शरीर भी
जैसे शरीर को नया या पुराना कर सकते हैं
वैसे ही दिमाग को भी।
जैसे आपका शरीर एक सिस्टम है
एक मशीन है
वैसे ही इन कोडों का सारा खेल
इस सिस्टम और मशीन पर भी
राजनितिक सिस्टम और मशीन के जैसा-सा ही है।
सिस्टम का कौन सा कोड
आपके भले में है या बुरे में
ये कैसे पता चले?
क्यूँकि,
आपको तो राजनितिक सिस्टम के कोड ही नहीं पता?
पता हैं ना,
कैसे?
आप सोचो, आते हैं उस पर भी।
Curiosity takes us, where we should not go? Forbidden zone?
Curiosity takes us, what we should not know? Again Forbidden zone?
Curiosity puts us in danger?
As it shows something, one cannot reveal? ELSE?
Files deletions and files corruption? It's continue at least since PhD. But never watched that happening this way earlier.
कुछ बिमारियों की कहानी?
कुछ मौतों की कहानी?
या?
हमारे जन्म से लेकर मरण तक की कहानी?
और फिर जैसे किसी पुर्नजन्म की कहानी?
Can I know please, what is the problem with such files? If any? Along with many social tales? Rather such social tales?
कोई नहीं, I can write them again. They are not PhD thesis or some students dissertations or any such documents which require lab and same kind of time and efforts again in that particular zone. These tales need just some memory and they will be alive again in some documents. Right?
I wonder, who could have problem with such social tales documentation, if any?
And why? That documentation could be the solution to so many diseases.
चलो एक कहानी सुनाती हूँ।
धर्म? शाला? अपमानजनक (Pejorative)? या धर्मशाला?
राजनीती, धर्म, आस्था, विश्वास, रीति-रिवाज़, लोकलाज आदि को बड़े ही शातिर तरीके से खेलती है। आम आदमी इन्हें राजनीती के चाल चरित्र और चेहरों के अनुसार पढ़ ही नहीं पाता। पढ़ेगा भी कैसे? उसे यही खबर नहीं है की ये सब घड़ता कौन है?
इंसान भगवान ने बनाया है?
या भगवान को ही इंसान ने घड़ा हुआ है?
रीती-रिवाज़ बनाता और फिर उनमें वक़्त के अनुसार बदलाव करता कौन है?
शिव 16 नंबरी ही क्यों?
और हनुमान चालीसा (40) क्यों?
ऐसे ही हर भगवान या भगवानी की कोई न कोई पहचान या ख़ासियत मिलेगी। कभी जानने की कोशिश की उनकी वही पहचान क्यों है? और वो पहचान राजनीती के काम कैसे आती है? उनके मंदिर जहाँ पर हैं, वहीँ क्यों हैं? कहीं और क्यों नहीं? Geolocation Matters
उनकी पूजा जिस दिन होती है, उसी दिन क्यों होती है? किसी और दिन क्यों नहीं? उनका पहनावा या खान पान जो है, वही क्यों है? कुछ और क्यों नहीं? Codes Matter and changes happen as per political parties needs.
क्या हो अगर
हनुमान हो जाए 16 नंबरी और शिव चालीसा (40) पढ़ी जाने लगे?
संतोषी हो जाए काली और काली शीतला माता?
सूरज को पानी दें स्याम को या रात को और चाँद को दिन में निहारें?
रेगिस्तान के देवता पूजे जाएँ मैदानों या पहाड़ों पर?
और मैदानों या पहाड़ों के रेगिस्तान में?
लड़कियों को समझने लगें लड़का और लड़के को लड़की?
थोड़ा ज्यादा हो रहा है ना? कैसा हो, अगर आपको पता चले की राजनीती आपके अपने घर में, खुद आपसे या आपके अपनों से ऐसा कुछ ही करवा रही हो, मगर चोरी छुपे, आपको अँधेरे में रख?
धर्म? शाला? अपमानजनक (Pejorative)? या धर्मशाला?
या राजनीती के कोढ़ के अनुसार दोनों एक ही बात हैं?
चलो, कुछ आपके हमारे आसपास से ही जानने की कोशिश करते हैं।
दारु पीने वाले, ड्रग्स लेने वाले अक्सर घर से बाहर कर दिए जाते हैं? अक्सर, खाने की कमी या देखभाल की कमी की वज़ह से जल्दी ही दुनियाँ छोड़ जाते हैं? हाँ? मगर कहाँ? ज़्यादातर गरीब तबकों में?
खाते पीते घरों में या शायद कहना चाहिए देखभाल करने वाले घरों में नहीं? क्यूँकि, जहाँ कहीं देखभाल सही से होती है, वहाँ पहली बात तो ऐसे केस ही नहीं होते। और हों भी, तो उनकी ज़िंदगी कम देखभाल वालों से ज्यादा ही लम्बी होती है। और ये सिर्फ दारु या ड्रग्स वाले केसों में नहीं होता, बल्की, हर तरह की बिमारी पर लागू होता है। अक्सर देखा है की देखभाल वाले घरों में ज़िंदगी अक्सर लम्बी, सेहत वाली और खुशहाल होती है। मगर जहाँ कहीं देखभाल कम हो, किसी भी तरह की, वहीँ ज़िंदगी छोटी और बदहाल हो जाती है। मतलब, पैसा अहमियत रखता है, मगर, एक हद तक ही। देखभाल उससे कहीं ज्यादा अहमियत रखती है।
अब इसका धर्म से या धर्म शाला से भला क्या लेना देना? सोचो। आते हैं इस पर भी।
सफलता, के मायने अलग-अलग हैं
अलग-अलग जगह पर
और अलग-अलग लोगों के लिए।
आप प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होते हुए भी
असफल हो सकते हैं,
बहुत सी नज़रों में
सिर्फ असफ़ल ही नहीं
बल्की, सत्यानाशी तक हो सकते हैं।
किन्हीं नज़रों में
हत्यारे और अपराधी हो सकते हैं
तानाशाह हो सकते हैं
जो कुर्सी पर ना होने से भी
कहीं बड़े असफ़लता के मायने हैं।
मगर कहीं खूनी भी,
अगर एक उम्र के बाद
जैसे-तैसे जुगाड़ से
एक अदना-सी नौकरी तक पा जाए
तो सफल हो सकता है
शायद, किन्हीं नजरों में?
कहीं, जैसे तैसे शादी होना
और फिर बच्चे पैदा कर देना ही
सफलता की निशानी हो सकता है
चाहे उन्हें खाने-पिलाने तक के लाले पड़े हों
तन ढकने तक को ढंग के कपडे
या सिर पर छत तक ना हो।
जुबान,
उन सफलता की निशानियों को
कितनी ही भद्दी जुबान में,
कितने ही गुस्से में
पेश आती हो
चाहे उनकी मार पिटाई तक होती हो
मगर, फिर भी वो मर्द (?) सफल हैं
कम से कम, उस तबके के समाज में।
फिर कहीं शायद ऐसे मर्दों की
मर्दानगी पर ही प्रश्नचिन्ह लगते हों
जिन्हें लगता हो
बच्चे तो गली के कुत्ते भी पैदा कर लेते हैं
कीड़े-मकोड़े भी इस काबिल होते हैं
फिर इंसान होकर भी
ये कौन-सी और कैसी मर्दानगी?
जिसे अपनी ही सफलता की कहानियों को
ढंग से रखना तक नहीं आता हो
बोलना तक नहीं आता हो
जिसका अपनी जुबान तक पर वश नहीं
जो अपने से कमजोरों की रक्षा की बजाय
उन पर हाथ, पैर या जुबान चलाए
कहीं कहीं तो डंडा तक उठाए नज़र आए
और फिर भी मर्द कहलाए?
थू ऐसी मर्दानगी पर।
कहीं सफलता शायद
व्यवसाय नाम के धंधे को
जैसे-तैसे बढ़ाना भी हो सकता है
फिर चाहे अपने ही बहन भाहियों
या चाचे ताऊवों की ज़मीन या प्रॉपर्टी
धोखे या गुंडागर्दी तक से हड़पना क्यों हो
गरीबों को उनके छोटे मोटे हक़ तक से
वंचित करना ही क्यों ना हो?
कहीं कहीं तो बहन भाईयों के
खासकर, बहन बेटियों के हस्ताक्षर तक ना हों
या शायद ऐसों के खिलाफ तक लिखकर दे रखा हो
माँ की मौत के बाद, बेटी शायद नाबालिक ही हो
तो क्या हुआ?
धंधें तो अक्सर शायद, ऐसे ही फूलते फलते हैं?
कुछ तो इससे भी थोड़ा आगे बढ़
घर में किसी मौत तक पर,
या कमजोर पड़े किसी वक़्त तक का इन्तजार
गिद्ध सी नज़र से ताकते हों
और मौका पड़ते ही
जो और जितना हड़प सकें
बिना किसी हिचक या झिझक के
अढ़कार जाते हों
आखिर धँधा तो धँधा है?
फिर, वो धँधा चाहे
समाज सेवा के नाम पर बने
किसी ट्रस्ट के नाम पर ही क्यों ना हो
और ट्रस्ट भी शिक्षा के नाम पर?
मगर, फिर भी शायद
ऐसे लोग तक,
किन्हीं नजरों में सफल कहला सकते हैं?
एक वो तबका भी है
जहाँ सबकुछ बैलेंस-सा होता है
पढ़ाई लिखाई, शादी बच्चे, नौकरी रिश्ते
घर गाडी और बैंक बैलेंस भी
मगर, फिर भी
अपनी ज़िंदगी का,
कोई भी फैसला उनका अपना नहीं होता
शादी या बच्चे पैदा करना तक।
कहीं कहीं तो
तन्खा तक अपनी नहीं होती
सिर्फ़ किसी नौकर की तरह
कहा गया
या सौंपा गया काम करना ही अपना होता है
तन्खा घर के किसी बड़े ठेकेदार के पास जाती है
और वो ठेकेदार, उसमें से थोड़ा बहुत
बच्चों के जैसे, जेब खर्ची सा थमा देता है
और अक्सर उस पर भी वाद विवाद होते हैं
तन्खा पर नहीं, अपनी ही कमाई पर नहीं
बल्की, बच्चों के जैसी सी जेब खर्ची पर।
वाह रे नए युग तक में गुलाम रखने वाले सफ़ल ठेकेदार?
क्यूँकि, इस तबके में इंसान को
खासकर औरत को,
कभी भी बड़ा नहीं होने दिया जाता
पैसों और प्रॉपर्टी के नाम पर तो कभी नहीं
बाकी कामों और कर्त्तव्यों के नाम पर
इस तबके का ये वर्ग
कुछ ज्यादा ही जल्दी बड़ा कर दिया जाता है
जैसे ही शरीर से बड़ा दिखने लगे।
क्यूँकि, इस समाज के अनुसार
इस वर्ग के पास सिर्फ़ शरीर ही होता है
दिमाग नहीं,
इसलिए, शरीर भी किसी और की ही प्रॉपर्टी होता है
जिसे वो जैसे चाहें और जहाँ चाहें प्रयोग करें।
फिर क्या ऑफिस और क्या घर
सब जैसे किसी बड़े ठेकेदार के हवाले।
और
ऐसे ऐसे इंसान के रुप में,
चलते फिरते सिर्फ और सिर्फ,
शरीर मात्र?
लोग भी शायद सफ़ल कहला सकते हैं
खासकर, उन ठेकेदारों की निगाहों में।
हालाँकि,
आपको या हम जैसों को
वो कोई भद्दी और घटिया जेल नज़र आ सकती है।
और भी कितने ही तरह के तबके है, समाज हैं
इस दुनियाँ में,
आपके आसपास भी होंगे
जानिए उनके सफलता के पैमानों को।
कुछ मेरे बताए गए केसों से भी बुरे हो सकते हैं
शायद?
जैसे?
एडिक्ट केस?
या शायद कुछ एक बुजर्गों के हाल?
फिर, कुछ बेहतर भी हो सकते हैं
शायद?
जैसे, पढ़े लिखे समाज का
सही मायने में पढ़ा लिखा तबका या समाज?
या शायद, कम पढ़े लिखे होकर भी
बहुत अच्छी जगहों पर ना होकर भी
शाँति और एक दूसरे को सम्मान देता हुआ
इंसान को इंसान समझता हुआ
आगे बढ़ता समाज का तबका?